शीर्ष माओवादी नेता गणपति के आत्मसमर्पण पर अटकलें

  • सलमान रावी
  • बीबीसी संवाददाता
माओवादी

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क्या भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के शीर्ष नेता मुपल्ला लक्ष्मणा राव उर्फ़ गणपति ने आत्मसमर्पण कर दिया है? इस बात को लेकर अटकलें जारी हैं मगर आधिकारिक तौर पर किसी भी राज्य की पुलिस इसकी पुष्टि नहीं कर रही है.

पूर्व और मध्य भारत के कई राज्यों में माओवादियों का ख़ासा प्रभाव है. मसलन छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र में माओवादियों के छापामार दस्तों और सुरक्षा बलों के बीच समय समय पर मुठभेड़ भी होती रहती है.

पिछले कई दशकों से चल रही हिंसा की वजह से सुरक्षा बलों और माओवादियों के अलावा आम लोगों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी है. प्रधानमंत्री रहते मनमोहन सिंह ने माओवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया था और तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान तो माओवादियों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर कई राज्यों में अभियान भी चलाया गया जिसे 'आपरेशन ग्रीन हंट' के रूप में जाना जाता है.

ये बिलकुल स्पष्ट नहीं है कि क्या गणपति की तरफ़ से आत्मसमर्पण की कोई पेशकश भी की गयी लेकिन छत्तीसगढ़ और उससे लगे तेलंगाना और महाराष्ट्र के पुलिस अधिकारियों से बात करने के बाद भी किसी तरह की कोई पुष्टि नहीं हो सकी.

हालांकि पुलिस महकमे के सूत्र कहते हैं कि गुप्तचर विभाग की तरफ से कुछ फ़ोन कॉल को 'इंटरसेप्ट' किया गया था जिससे पता चल पाया कि कुछ बड़े माओवादी नेता आत्मसमर्पण करना चाहते हैं.

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गणपति की कितनी अहमियत?

लेकिन इससे ज़्यादा कोई पुलिस अधिकारी कुछ नहीं कहना चाहता. छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक राज कुमार विज ने ट्वीट कर कहा है कि अब गणपति का कोई महत्त्व नहीं रह गया है लेकिन फिर भी उनके आत्मसमर्पण से माओवादियों के बारे में और भी जानकारी मिल सकती है. ख़ास तौर पर दंडकारण्य के इलाके में जो छत्तीसगढ़ से होकर गुज़रता है.

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आरके विज का ट्वीट

जानकार मानते हैं कि गणपति का अभीतक भूमिगत रहना दरअसल भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए बहुत ही बड़ी चुनौती रही है. इसलिए भी क्योंकि उनसे सम्बंधित कोई जानकारी किसी राज्य पुलिस के पास नहीं है.

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यहाँ तक कि उनकी जो तस्वीर पुलिस के रिकॉर्ड में मौजूद है वो भी तब की है जब वो 35 साल के थे. उनका आखिरी साक्षात्कार भी एक दशक पहले छपा था.

अपने मुखपत्र में अमूमन उनके संदेश प्रकाशित होते रहे हैं. वो मेल के ज़रिये भी पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर दिया करते थे. मगर एक दशक से ये प्रक्रिया भी न के बराबर रह गयी जिसको लेकर ये कहा जाने लगा कि गणपति अस्वस्थ हैं.

लेकिन सुरक्षा एजेंसियों की गुप्तचर इकाइयां भी तब अचम्भे में आ गयीं जब अचानक पता चला कि गणपति ने अपने पद को त्याग दिया है और उनकी जगह वर्ष 2018 के नवंबर माह में केशव राव उर्फ़ बसवराज भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नए महासचिव बन गए.

हालांकि माओवादियों की केंद्रीय कमिटी ने कई महीनों के बाद बयान जारी कर कहा था कि गणपति अस्वस्थ रह रहे हैं इसलिए उन्होंने खुद ही पद को त्यागने की पेशकश की थी. लेकिन पुलिस के सूत्रों का कुछ और ही दावा रहा. पुलिस का कहना था कि गणपति का नेतृत्व कमज़ोर पड़ रहा था और उनपर पद को त्यागने का दबाव बहुत पहले से ही बनाया जा रहा था.

74 साल के गणपति माओवादियों के सबसे कद्दावर नेता तो हैं ही और इसपर पुलिस को भी कोई शक नहीं है. इसलिए अगर उनकी तरफ से आत्मसमर्पण किया भी जाता है तो माओवाद का कमज़ोर होना तो तय ही है साथ ही पुलिस को पूरे सांगठनिक ढांचे की भी जानकारी मिल पाएगी.

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जिन राज्यों में माओवादी गतिविधियां तेज़ हैं उन राज्यों की पुलिस के पास भी माओवादियों की पहली पंक्ति के नेताओं की पुख्ता जानकारी नहीं है. दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं के बारे में भी ज़्यादा जानकारी मौजूद नहीं है.

इन नेताओं को लेकर समय समय पर राज्यों की पुलिस जो जानकारियां साझा भी करती रहती हैं वो केवल 'अपुष्ट' ही होती हैं.

गणपति का माओवाद से जुड़ाव

गणपति, वर्ष 2004 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के महासचिव बने थे. तब 'माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर' यानी 'एमसीसी' और सीपीआई-एमएल (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) 'पीपल्स वॉर ग्रुप' यानी 'पीडब्लूजी' का विलय हुआ था.

अविभाजित आंध्र प्रदेश के करीमनगर ज़िले में पैदा हुए गणपति शिक्षक का काम छोड़ उच्च शिक्षा के लिए वारंगल चले गए. वारंगल में ही उनका संपर्क पीपल्स वॉर ग्रुप के कोंडापल्ली सीतारमैया से हुआ जो संगठन के महासचिव हुआ करते थे. बाद में गणपति भी पीडब्लूजी के महासचिव बन गए.

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नक्सल उन्मूलन अभियान से जुड़े रहे छत्तीसगढ़ पुलिस के एक अधिकारी का दावा है कि 2017 के मार्च महीने में माओवादियों की 'पार्टी कांग्रेस' हुई थी जिसमे गणपति ने पद त्यागने की पेशकश की थी.

आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की पुलिस का दावा है कि उन्होंने माओवादी छापामारों के साथ विभिन्न स्थानों पर हुई मुठभेड़ों के दौरान जो दस्तावेज बरामद किये हैं, उसी के आधार पर वो ये बात कह रहे हैं.

बताया जाता है कि कोटेश्वर राव उर्फ़ 'किशन जी' की पश्चिम बंगाल में पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत के बाद केशव राव माओवादी छापामारों की जनमुक्ति छापामार सेना के 'सेंट्रल मिलिट्री कमीशन' यानी 'सीएमसी' के 'कमांडर इन चीफ़' बन गए थे.

चौंकाने वाली बात ये है कि 64 वर्षीय नम्बला केशव राव की जो तस्वीर गुप्तचर एजेंसियों के पास है वो भी उनकी जवानी के दिनों की 'ब्लैक एंड व्हाइट' तस्वीर है. आज वो कैसे दिखते हैं और कहाँ-कहाँ उन्हें देखा गया है इसकी कोई जानकारी किसी के पास नहीं है.

पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि ज़ब्त किये गए दस्तावेज़ के अनुसार गणपति पर पदभार छोड़ने के लिए दबाव डालने वालों में प्रोसेनजीत बोस उर्फ़ 'किसान दा' भी शामिल थे जो माओवादियों के 'पोलित ब्यूरो' के सदस्य हैं.

आंतरिक सुरक्षा पर नज़र रखने वालों का कहना है कि वर्ष 2004 में हुए विलय का श्रेय भी गणपति को ही जाता है क्योंकि अविभाजित आंध्र प्रदेश और उससे लगे हुए राज्यों में बेहद सक्रिय भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (पीपल्स वार ग्रुप) यानी पीडब्ल्यूजी, माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी पर न सिर्फ़ हावी हो गई बल्कि उन सभी इलाकों और कमानों को भी अपने अधीन ले लिया जो एमसीसी के पास हुआ करते थे.

इस संगठन पर नज़र रखने वालों का ये भी कहना है कि पीडब्लूजी ने बड़े नियोजित तरीके से उस संगठन पर कब्ज़ा कर लिया जिससे वो बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और झारखण्ड में ख़ूनी संघर्ष किया करते थे. उनका कहना है कि विलय के बाद नए संगठन यानी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सारे प्रमुख पदों पर आंध्र और तेलंगाना के कैडरों का क़ब्ज़ा हो गया.

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केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के दस्तावेज़ बताते हैं कि एमसीसी के कई सदस्यों की पुलिस मुठभेड़ में मौत या उनकी गिरफ़्तारी के पीछे पीडब्लूजी की मुखबिरी ही थी. इन दावों को माओवादी नेता नकारते रहे हैं.

नक्सल उन्मूलन अभियान के दौरान बरामद किए गए दस्तावेजों के आधार पर केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां अपनी रिपोर्ट बनाती रहती हैं. इन्ही रिपोर्ट्स में समय समय पर इस बात को बताया गया है कि किस तरह पीडब्लूजी ने एमसीसी को ख़त्म किया. एमसीसी के पकड़ के इलाके ज़्यादातर बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और मध्य भारत रहे हैं.

सामंतवाद और बंधुआ मज़दूरी का अंत करने या फिर पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार अभियान चलाने में एमसीसी की भूमिका अहम रही है.

गणपति के बारे में सुरक्षा एजेंसियों को लगता है कि उन्होंने संगठन को बाहरी दुनिया में प्रचारित करने के लिए महानगरों और शहरी इलाकों में बड़े पैमाने पर संगठन की विचारधारा को विकसित करने का काम भी किया है.

गणपति के आत्मसमर्पण की पेशकश या इससे जुड़ी अटकलें पिछले एक हफ़्ते से चल रही हैं. कहा ये भी जा रहा है कि उनके साथ चार और बड़े नेता आत्मसमर्पण कर सकते हैं.

माओवादी नेता और बस्तर का अबूझमाड़ इलाक़ा

ज़्यादातर माओवादी नेताओं का बड़ा हिस्सा बस्तर के अबूझमाड़ के इलाके में शरण लेता आया है क्योंकि इलाके की भौगोलिक संरचना इनके लिए फायदेमंद रही है. एक तो पांच हज़ार वर्ग किलोमीटर का इलाका बाक़ी की दुनिया से पूरी तरह से कटा हुआ है और दूसरा कारण है कि यहाँ से ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र और तेलंगाना के बीच छापामार दस्तों को आने जाने में आसानी भी होती है. यहाँ कई ऐसे इलाके हैं जहां सफ़र का अनुमान किलोमीटर के हिसाब से नहीं बल्कि दिनों के हिसाब से लगाया जाता है.

गणपति के भी यहीं पर शरण लेने की बात पुलिस को पता थी. ये वो ही इलाका है जहां माओवादियों के 'मार्ग दर्शक मंडल' के नेताओं को रखा जाता है. यानी वो नेता और कैडर के वो नेता जो या तो बहुत बीमार हैं या काफ़ी बूढ़े हो चुके हैं.

तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में इस बात की अटकलें लगाई जा रही हैं कि गणपति चूँकि पहले से ही गंभीर रूप से बीमार हैं, वो बेहतर इलाज चाहते हैं जो जंगलों में उपलब्ध नहीं हो सकता है. वैसे उनपर तीन करोड़ रुपये का इनाम भी अलग अलग राज्यों की पुलिस ने रखा हुआ है.

अगर वे आत्मसमर्पण भी करते हैं तो उस सूरत में भी उन्हें जेल में रहना तो पड़ेगा ही क्योंकि छत्तीसगढ़ के बस्तर की दरभा घाटी में माओवादी हमले में राज्य कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की हत्या का मामला देश की प्रमुख जान एजेंसी यानी नेशनल इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी (एनआईए) कर रही है और उस मामले में गणपति भी अभियुक्त हैं.

आंतरिक सुरक्षा पर नज़र रखने वालों का कहना है कि या तो आत्मसमर्पण करने की पेशकश बिलकुल अटकलबाज़ी है या फिर गणपति ने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया हो. क्योंकि पेशकश रख कर आत्मसमर्पण करने वो जाते हैं तो माओवादी नेता उन्हें ऐसा करने देंगे या नहीं इसपर भी सवाल है.

गणपति पूरे माओवादी आन्दोलन के अहम पात्र हैं जिनके पास संगठन की रणनीति से लेकर नेताओं तक की जानकारी मौजूद है. ऐसे में उन्हें संगठन के लोग कैसे आत्मसमर्पण करने देंगे ये भी देखने की बात होगी अगर उन्होंने अभी तक ऐसा नहीं किया है.

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