संसदीय समिति की बैठक में फेसबुक ने क्या दिया जवाब

  • सलमान रावी
  • बीबीसी संवाददाता
फेसबुक के सीईओ मार्क ज़करबर्ग

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फेसबुक के सीईओ मार्क ज़करबर्ग

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना तकनीक पर बनी 30 सदस्यों वाली संसदीय समिति ने बुधवार को सोशल मीडिया साइट फेसबुक पर लग रहे आरोपों की सुनवाई की.

इस समिति के समक्ष विभाग से जुड़े अधिकारी मौजूद थे. साथ ही भारत में फेसबुक के प्रबंध निदेशक अजीत मोहन ने भी अपनी बात रखी.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार फेसबुक की तरफ़ से दलील रखी गयी कि उसने हमेशा अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर पारदर्शिता रखी है.

फेसबुक का ये भी कहना था कि उसने बिना किसी राजनीतिक दबाव के लोगों को अपनी अभिव्यक्ति प्रकट करने का माध्यम भी दिया है.

ये विवाद तब शुरू हुआ जब एक अमरीकी समाचार पत्र वॉलस्ट्रीट जर्नल ने भारत में फेसबुक के बारे में आरोप लगाए कि वो सत्तारूढ़ दल यानी भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में ज़्यादा काम करता है.

समाचार पत्र में ये भी आरोप लगाया गया कि फेसबुक पर अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत भड़काने वाली पोस्ट पर भी कोई नियंत्रण नहीं है. ये भी आरोप लगाये गए कि उन कथित भड़काऊ पोस्ट को फेसबुक ने तब हटाया जब अख़बार ने उनके बारे में जानकारी दी.

इन आरोपों पर बीबीसी को फेसबुक ने ईमेल के ज़रिये अपना जवाब दिया, “किसी भी तरह की हिंसा या नफ़रत फैलाने वाली सामग्री फेसबुक पर प्रतिबंधित है. ये मायने नहीं रखता कि पोस्ट लिखने वाले का राजनीतिक रुझान किस तरफ़ है.”

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कैमरे में रिकॉर्ड हुई कार्यवाही

कांग्रेस के सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता और सोशल मीडिया पर नज़र रखने वाले एक समूह के प्रतिनिधि को भी अपनी मदद के लिए कार्यवाही में शामिल किया.

संसद के सूत्रों का कहना है कि संसदीय समिति की बैठक बंद कमरे में ज़रूर हुई मगर पूरी कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग की गयी है.

समिति की सुनवाई काफ़ी लंबी चली. इस दौरान बंद कमरे में क्या कुछ हुआ इसे लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने फ़िलहाल चुप्पी साध रखी है.

समिति में संसद के दोनों सदनों के सदस्य शामिल हैं जिसमें ज़्यादा संख्या सत्ता पक्ष के सदस्यों की है.

शशि थरूर को हटाने की माँग

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कांग्रेस नेता और समिति के अध्यक्ष शशि थरूर

लेकिन समिति की बैठक से पहले ही कांग्रेस ने फेसबुक के सीईओ मार्क ज़करबर्ग को दो-दो चिठ्ठियां लिखीं जिसमें फेसबुक के लिए भारत में काम करने वाले दो प्रतिनिधियों के आचरण और उनके द्वारा की गई पोस्ट का हवाला दिया गया.

चिठ्ठी के बाद समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने फेसबुक को नोटिस भेजा तो भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे और राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने थरूर को समिति के अध्यक्ष पद से हटाने की मांग की.

दुबे का लिखित आरोप है कि शशि थरूर सोशल मीडिया के इस प्लेटफॉर्म के ज़रिये खुद के और अपनी पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं.

मगर लोकसभा के अध्यक्ष ने चिठ्ठी का कोई जवाब नहीं दिया.

रविशंकर प्रसाद की चिठ्ठी

समिति की बैठक से ठीक एक दिन पहले केंद्रीय विधि एंव न्याय, संचार एंव इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मार्क ज़करबर्ग को चिठ्ठी लिखकर आरोप लगाया कि उनका सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वालों की पोस्ट को सेंसर कर रहा है.

प्रसाद का ये भी आरोप था कि अमरीकी अख़बार में जो लिखा गया है दरअसल वो उल्टी छवि पेश कर रहा है. उन्होंने ये भी कहा कि ‘भारत की राजनीतिक व्यवस्था में अफ़वाहें फैला कर दख़लंदाज़ी करना निंदनीय है’.

भारत में फेसबुक के लगभग 30 करोड़ यूज़र्स हैं और प्रसाद का ये भी आरोप है कि 2019 में हुए आम चुनावों में फेसबुक ने भारतीय जनता पार्टी को लोगों तक ठीक से अपनी बात पहुँचाने नहीं दी.

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राजनीतिक दलों के बीच चल रहे इस वाकयुद्ध की वजह से फेसबुक लगातार चर्चा में बना हुआ है लेकिन संसदीय समिति में क्या कुछ हुआ, इसकी किसी को जानकारी नहीं है.

संसदीय समिति की बैठक गोपनीय

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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समाप्त

राज्यसभा के उपाध्यक्ष हरिवंश नारायण सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि कुल मिलाकर 24 संसदीय समितियां हैं जो विभिन्न विभागों या मुद्दों को लेकर बनायी गयीं हैं. इनमें लोकसभा और राज्यसभा के सांसद शामिल रहते हैं लेकिन ज़्यादातर समितियों के अध्यक्ष लोकसभा के सदस्य हैं.

संसद किस तरह चलेगी इसके लिए पहले से ही स्पष्ट रूपरेखा निर्धारित है. विधायी कार्यों के नियम भी स्पष्ट हैं जिन पर कोई बहस नहीं की जा सकती है क्योंकि वो पहले से ही निर्धारित संसदीय परंपरा का हिस्सा हैं.

हरिवंश नारायण कहते हैं, “संसदीय समिति की बैठक पूरी तरह से गोपनीय होती है जिसके बारे में समिति के सदस्यों को बाहर बोलने की अनुमति नहीं है. न सिर्फ़ सदस्य बल्कि जिनको समिति नोटिस भेजकर बुलाती है वो भी बाहर कुछ नहीं कह सकते. अगर वो ऐसा करते हैं तो ये विशेषाधिकार हनन का मामला बनता है.”

सांसद मनोज कुमार झा कहते हैं कि जब तक समिति की रिपोर्ट को संसद के पटल पर नहीं रखा जाता, तब तक उसे सार्वजनिक भी नहीं किया जा सकता है. वो कहते हैं कि संसदीय समिति के सदस्यों और उनके सामने पेश होने वाले लोग शपथ से भी बंधे हुए हैं.

इसलिए लगभग तीन घंटों तक चली इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना तकनीक की संसदीय समिति की बैठक की कार्यवाही का लेखा-जोखा आम लोगों की जानकारी के लिए तब तक उपलब्ध नहीं है जब तक कि संसद इसका अनुमोदन नहीं कर देती. यही विधायी कार्यप्रणाली है.

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