सुशांत सिंह मामला: नया नहीं है मीडिया ट्रायल का चलन, ये हैं दुनिया के टॉप केस

  • ज़ुबैर अहमद
  • बीबीसी संवाददाता

क्या अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के कथित आत्महत्या मामले में कोई संदिग्ध या अभियुक्त है?

इसका संक्षिप्त उत्तर यह है कि अब तक कोई नहीं है. लेकिन अधिकतर मीडिया का कवरेज सुशांत की गर्लफ़्रेंड रिया चक्रवर्ती की तरफ़ इशारा करता है.

वास्तव में उन्हें कुछ प्रमुख टीवी एंकरों और सोशल मीडिया के ट्रोल्स ने बिना किसी आरोप के दोषी ठहरा दिया है.

पक्की ख़बर पर आधारित रिपोर्टिंग के बजाए मीडिया के एक सेक्शन ने इसे सर्कस में बदल दिया है और एक 28 साल की महिला के ख़िलाफ़ जज और जूरी की भूमिका निभाने की कोशिश की है.

चिंताजनक बात यह है कि यह परीक्षण पारंपरिक टीवी और समाचार पत्रों और सोशल मीडिया दोनों पर बेरोकटोक चलता जा रहा है.

राकेश भटनागर, जो एक अनुभवी पत्रकार हैं और जिन्होंने पिछले चार दशकों में भारत के उच्च न्यायालयों में सैकड़ों हाई प्रोफाइल मामलों को कवर किया है. वो कहते हैं, "सुशांत की मृत्यु की जांच कर रही तीन केंद्रीय एजेंसियों के फ़िलहाल जाँच का फोकस रिया चक्रवर्ती हैं. इस केस में अब तक कोई भी आरोपी नहीं है. मीडिया अत्याचार बंद हो. हाँ सीबीआई और अन्य एजेंसियों द्वारा कुछ दिनों से रिया और उनके परिवार वालों से पूछताछ ज़रूर की जा रही है लेकिन इस मामले में इस समय कोई भी आरोपी नहीं है."

वरिष्ठ पत्रकार राकेश भटनागर आज भारत में पत्रकारिता की स्थिति पर अफ़सोस जताते हैं. उनके अनुसार मीडिया द्वारा परीक्षण एक आम बात हो गयी है. लेकिन वो यह भी स्वीकार करते हैं कि ये एक वैश्विक समस्या है.

ब्रिटेन में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय स्थित रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ़ जर्नलिज्म की एसोसिएट डायरेक्टर कैथलीन मर्सर ने पत्रकारों से आत्महत्या के मामलों की रिपोर्टिंग के दौरान सावधानी बरतने की अपील करते हुए कहा, "मैं इस मामले (सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले) के विवरण से परिचित नहीं हूं लेकिन जब आत्महत्या पर रिपोर्टिंग की बात आती है, तो कई अलग-अलग देशों में ढेर सारे रिसर्च का निष्कर्ष ये है कि ज़िम्मेदारी के साथ की गयी रिपोर्टिंग ही जनता के हित में है."

वो आगे कहती हैं, "किसी भी ज़िम्मेदार मीडिया संगठन को रिपोर्ट करने से पहले तीन प्रमुख बातों का ध्यान रखना चाहिए- दुख और आघात से निपटने वाले रिश्तेदारों के प्रति संवेदनशीलता दिखाना, आम जनता के प्रति ज़िम्मेदारी दिखाना और इस बात को रोकने का कर्तव्य कि आत्महत्या पर रिपोर्टिंग से कहीं दूसरे लोग भी आत्महत्या न करने लगें."

"दुर्भाग्य से आत्महत्या की रिपोर्ट पर ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी हासिल करना इंसानी कमज़ोरी है. हम सभी हर विवरण को जानना चाहते हैं. हर संभव साज़िश और दृष्टिकोण को परखना चाहते हैं. यह हमारी मौत के भय से प्रेरित है. अब यह प्रॉफ़िट और ट्रैफ़िक के लिए बहुत अच्छा हो सकता है लेकिन यह जनता और शोक करने वाले परिवार के साथ एक भयानक अन्याय है."

नेटफ्लिक्स पर 'ट्रायल बाय मीडिया' नामी छह-भाग की एक नयी श्रृंखला है, जिसमें अमरीका में छह प्रसिद्ध मामलों को चित्रित किया गया है.

इस श्रृंखला से पता चलता है कि इन मामलों को मीडिया ने कैसे सनसनीख़ेज़ बनाया और इसने कितने लोगों के करियर और प्रतिष्ठा को नष्ट कर दिया. मीडिया ट्रायल अब एक दुधारी तलवार बन गया है. पारंपरिक मीडिया के अलावा अब लोगों को सोशल मीडिया की सनसनीख़ेज़ कवरेज से भी जूझना पड़ता है जिसकी ताज़ा मिसाल रिया चक्रवर्ती हैं.

विश्व स्तर पर 'ट्रायल बाय मीडिया' मामलों के पांच प्रसिद्ध उदाहरण पर एक नज़र:

ओ.जे. सिम्पसन का मीडिया ट्रायल

अमरीका के नेशनल फुटबॉल लीग के प्रसिद्ध खिलाड़ी ओ.जे. सिम्पसन द्वारा कथित हत्या के मुक़दमे को "ट्रायल ऑफ़ द सेंचुरी" कहा जाता है.

3 अक्टूबर 1995 को सिम्पसन के मुक़दमे के फ़ैसले को अमरीका में कोर्ट रूम से लाइव प्रसारित किया गया जिसे 10 करोड़ से अधिक लोगों ने देखा. उनके ख़िलाफ़ अपनी पूर्व पत्नी निकोल ब्राउन सिम्पसन और उनके दोस्त रोनाल्ड गोल्डमैन की हत्या का मुक़दमा चला था. लेकिन जूरी ने सिम्पसन को बरी कर दिया.

ट्रायल के दौरान मीडिया में लगातार अपुष्ट और फ़ेक समाचार छपने के कारण जज को जूरी के सदस्यों को कई बार बदलना पड़ा और कई बार ट्रायल स्थगित करना पड़ा.

जज ने कहा कि जूरी के कुछ सदस्यों ने ट्रायल में बढ़ती दिलचस्पी के कारण मीडिया को इंटरव्यू दिए और अपने विचार प्रकट किए जिससे ट्रायल के परिणाम पर असर पड़ सकता था. कुछ गवाहों को अत्यधिक मीडिया कवरेज से प्रभावित पाया गया.

ब्रिटेन में डॉ. डेविड केली की मीडिया कवरेज के बाद मौत

मई 2003 में बीबीसी की एक रिपोर्ट ने सरकार के इस दावे का खंडन किया कि इराक़ के पास सामूहिक विनाश के हथियार (weapons of mass destruction) हैं जो 45 मिनट के भीतर तैनात किए जा सकते हैं.

हथियार विशेषज्ञ डॉ. डेविड केली को अख़बारों में इस ख़बर के सोर्स के तौर पर पहचाने जाने के बाद इसे खूब उछाला गया. बीबीसी ने अपने सोर्स को डिस्क्लोज़ नहीं किया लेकिन इसके बावजूद डॉक्टर सुर्ख़ियों में बने रहे.

इसके बाद डॉ. केली ने सांसदों की समितियों को दिए सबूतों के दौरान इस बात का खंडन किया कि उन्होंने बीबीसी को ये ख़बर लीक की है.

अपनी गवाही के दो दिन बाद, वो एक सुनसान इलाक़े में मृत पाए गए. उनकी मृत्यु की जांच में सुझाव दिया गया कि उन्होंने आत्महत्या की है लेकिन कुछ लोग आज तक जांच के निष्कर्षों पर संदेह करते हैं. उनकी मौत के बाद बीबीसी ने बताया कि डॉक्टर केली ही इस ख़बर के सोर्स थे. उनकी पत्नी ने बाद में बताया कि उनके पति मीडिया द्वारा पूरी तरह से अपमान किए जाने से बहुत परेशान थे.

लोरेना बोबिट केस

ये एक अनोखा मामला था जिसके कारण इस केस को ख़ूब मीडिया कवरेज मिली.

अमरीका में 1993 में घरेलू दुर्व्यवहार की शिकार लोरेना बोबिट का मीडिया ट्रायल हुआ था, जिन्होंने वर्जीनिया में अपने पति जॉन वेन बोबिट के लिंग को काट दिया था और इसे अपनी कार की खिड़की से बाहर फेंक दिया था.

उनका बचाव यह था कि उनके पति ने उनकी शादी के दौरान भावनात्मक, शारीरिक और यौन शोषण किया. विशेषज्ञों के विचारों को ध्यान में रखते हुए जूरी ने उन्हें बरी कर दिया. उनके पति के कटे लिंग का जहाँ तक सवाल है उसे सड़क पर से ढूंढ़ निकाला गया और उनके शरीर से इसे फिर से जोड़ा गया, जिससे उसे सेक्स लाइफ वापस मिल गई.

रोडनी किंग की गोरे पुलिस कर्मियों द्वारा पिटाई का मामला

1991 में अमरीका के लॉस एंजेलिस शहर में काली नस्ल के रोडनी किंग की सफ़ेद नस्ल के पुलिसकर्मियों ने सरेआम पिटाई की जिसे एक राहगीर ने अपने कैमरे में क़ैद कर लिया था.

रोडनी किंग बच गए थे लेकिन टूटी खोपड़ी, टूटे दाँत और टूटी हुई आत्मा के साथ.

उनके परिवार वालों के मुताबिक़, वो मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से शायद हमेशा के लिए प्रभावित हो गए. अधिकारियों के अनुसार उनकी मौत 2012 में ड्रग एब्यूज़ के कारण हुई. उनकी सरेआम हुई पिटाई वाली घटना और पुलिस वालों के ख़िलाफ़ मुक़दमे की सुनवाई को अमरीका और विश्व भर की मीडिया ने छापा और प्रसारित किया. लेकिन पुलिस वाले बरी हो गए.

हालांकि अदालत के फ़ैसले से पहले ही मीडिया ने फ़ैसला सुना दिया था और पुलिस कर्मियों को दोषी माना था. लेकिन जब अदालत ने पुलिस कर्मियों को बरी कर दिया तो दुनिया भर में खलबली मच गई.

बाद में रोडनी किंग के एक दोस्त ने कहा, "जब फ़ैसला आया (29 अप्रैल, 1992 को) तो मैं हैरान रह गया". इसके कारण शहर में पांच दिन आगज़नी, लूटपाट और गोलीबारी हुई, जिसमें 54 लोग मारे गए.

स्कॉट पीटरसन का मामला

स्कॉट पीटरसन नाम के एक अमरीकी, जिस पर अपनी गर्भवती पत्नी, लैकी की हत्या का आरोप लगाया गया था. कथित तौर पर वह अपनी पत्नी और शादी से मुक्ति चाहता था. मुक़दमे के विचाराधीन होने के बावजूद, वह अपनी पत्नी के परिवार का समर्थन करने पर ज़ोर देते रहे और उन्हें पैसे भी भेजते रहे.

वो मुक़दमे के दौरान भी एक आदर्श पति की छवि बनाये रखने की कोशिश करते रहे. इस हाई प्रोफाइल मामले में मीडिया ने उन्हें अदालत से पहले ही मुजरिम क़रार दे दिया. हालाँकि वो अपनी बेगुनाही पर ज़ोर देते रहे.

उनके मुक़दमे को लेकर मीडिया में काफ़ी बवाल मचा था और आख़िरकार जूरी ने उन्हें दोषी क़रार दे दिया. उनके दोस्तों और समर्थकों का मानना था कि मीडिया ने उन्हें ट्रायल से पहले ही एक हत्यारे के रूप में पेश करना शुरू कर दिया था, जिससे जूरी और गवाह प्रभावित हुए थे.

एक स्वतंत्र और निष्पक्ष परीक्षण का अधिकार

क़ानून के विशेषज्ञों का मानना है कि मीडिया ट्रायल एक व्यक्ति के अधिकार को ख़तरे में डाल सकता है. मीडिया ट्रायल से न्यायालय की अवमानना भी हो सकती है.

तेलंगाना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रघुवेन्द्र सिंह चौहान ने 2011 में मीडिया ट्रायल पर अपने एक लेख में ये विचार व्यक्त किए थे.

उन्होंने कहा था, "प्री-ट्रायल पब्लिसिटी एक निष्पक्ष परीक्षण के लिए हानिकारक है. अभियुक्त की गिरफ़्तारी और ट्रायल के पहले ही मीडिया का शोरगुल शुरू हो जाता है और अभियुक्त को दोषी क़रार दे दिया जाता है. मीडिया अप्रासंगिक और जाली सबूतों को सच्चाई के रूप में पेश कर सकता है, ताकि लोगों को अभियुक्त के अपराध के बारे में आश्वस्त किया जा सके. "

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म की कैथिलीन मर्सर का कहना है कि सनसनीख़ेज़ रिपोर्टिंग से ट्रैफ़िक और मुनाफ़े जैसे थोड़े समय वाले फ़ायदे मिल सकते हैं, लेकिन अंततः इसके कारण भविष्य में भरोसे का नुकसान होता है और लोकतंत्र और स्वतंत्रता को, जो हमें बहुत प्यारा है, नष्ट कर देती है."

एक अंग्रेज़ी समाचार टीवी चैनल के न्यूज़ रूम के एक वरिष्ठ पत्रकार, जो अपने या अपने चैनल का नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहते, ट्रैफ़िक के लिए भयंकर प्रतिस्पर्धा को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि वो अक्सर ग़ैर-पुख़्ता ख़बरें चलाने पर मजबूर हो जाते हैं. लेकिन उनका तर्क है, "हम एक स्वतंत्र प्रेस के सदस्य के रूप में अपने दर्शकों की सेवा कर रहे हैं और देखिये लगातार कवरेज से दबाव में आकर अब तीन केंद्रीय एजेंसियाँ सुशांत की मौत की जांच कर रही हैं."

कैथिलीन मर्सर मानती हैं कि पत्रकार देवता नहीं हैं और वो ग़लतियाँ करते हैं. वह कहती हैं, "बेशक, मैं दर्शकों को दोषी नहीं मानती (सनसनीख़ेज़ ख़बरों के लिए), लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया केवल उस समाज का प्रतिनिधि है जो इसका उपभोग करता है."

क्या मीडिया ट्रायल को नियंत्रित किया जा सकता है?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कई मौक़ों पर व्यक्तिगत पत्रकारों या मीडिया आउटलेट्स को सनसनीख़ेज़ और नाटकीय ख़बरें चलाने के लिए फ़टकार लगाई है लेकिन जजों ने मीडिया के मामलों में हस्तक्षेप करने से काफ़ी हद तक परहेज़ किया है.

लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में तब्लीग़ी जमात के लोगों की कवरेज इसका एक उदाहरण है.

जमात के कई लोग अप्रैल में कोरोना वायरस पॉज़िटिव पाए गए थे. मीडिया के एक वर्ग ने इसकी कवरेज जिस तरह से की उससे लगा इसने अदालत की भूमिका संभाल ली है. मीडिया ने उन्हें कोरोना आत्मघाती हमलावर कहा. उन्हें समाज में जानबूझकर वायरस फैलाने के लिए दोषी ठहराया गया था. न्यायपालिका ने हस्तक्षेप की दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि पत्रकारों को रिपोर्ट करने का अधिकार है.

लेकिन हाल ही में महाराष्ट्र उच्च न्यायालय ने गिरफ़्तार तब्लीग़ी जमात के सदस्यों को बरी करते हुए आरोपियों के ख़िलाफ़ झूठ फैलाने में मीडिया की भूमिका के लिए इसे आड़े हाथों लिया.

वरिष्ठ पत्रकार राकेश भटनागर का कहना है कि रिपोर्टर को तथ्यों को रिपोर्ट करने का अधिकार है. लेकिन उन्हें अफ़वाहों, फ़र्ज़ी ख़बरों और झूठ की रिपोर्ट करने का कोई अधिकार नहीं है.

उनका मानना है कि मीडिया को रिपोर्टिंग मानकों में सुधार के लिए सेल्फ़-रेगुलेशन को सख़्त करना होगा. राकेश भटनागर मीडिया ट्रायल की रोकथाम के लिए स्पीडी ट्रायल की ज़ोरदार वकालत करते हैं.

वो कहते हैं, "हत्या के एक केस में ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक 20 साल लग जाते हैं. मुक़दमे जल्द समाप्त हों तो मीडिया ट्रायल कम हो सकते हैं."

कैथिलीन मर्सर का कहना है कि मीडिया ट्रायल का रुझान दुनिया भर में मौजूद है. "यह समस्या भारत के लिए अनोखी नहीं है. प्रत्येक लोकतंत्र में एक स्वस्थ समाचार मीडिया को लोगों की सेवा करने का अधिकार है."

वो आगे कहती हैं, "वास्तव में, अधिकांश न्यूज़ मीडिया प्लेटफ़ॉर्म योग्य आदर्शों को इस वास्तविकता से टटोलने के लिए मजबूर होते हैं कि यदि वे ट्रैफ़िक और विज्ञापन नहीं लाएं तो वे जल्द ही व्यवसाय से बाहर हो जाएँगे. लंबी अवधि में, अच्छी पत्रकारिता अच्छा व्यवसाय है. "

क़ानूनी प्रावधान क्या है?

निष्पक्ष जांच का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 में दर्ज है और जिसे अनुच्छेद 14 से जोड़कर देखा जाना चाहिए.

भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 में दर्ज है. भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (ए) बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है. अनुच्छेद 19 (2) के अनुसार, यह अधिकार केवल "भारत की संप्रभुता और अखंडता के हितों, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता के संबंध में क़ानून द्वारा प्रतिबंधित किया जा सकता है."

राकेश भटनागर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर मीडिया ट्रायल पर सवाल उठाया है लेकिन "उच्च अदालत इस सिलसिले में काफ़ी सेलेक्टिव रही है."

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