चीन से तनाव के बीच ईरान मोदी सरकार के लिए इतना अहम क्यों हो गया?

  • रजनीश कुमार
  • बीबीसी संवाददाता
भारत ईरान

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ईरान का मतलब होता है लैंड ऑफ आर्यन. भारत का भी एक नाम आर्यावर्त है. ईरान इस्लामिक देश बनने से पहले पारसी था. लेकिन अब यहां पारसी गिने-चुने ही बचे हैं. इस्लाम के उभार के साथ ही ईरान से पारसियों को बेदख़ल कर दिया गया. तब ज़्यादातर पारसी या तो भारत के गुजरात राज्य में आए या पश्चिमी देशों में चले गए. ईरान में जब पारसी थे तब भी भारत के साथ सांस्कृतिक संबंध था और जब इस्लामिक देश बना तब भी गहरे संबंध रहे.

ईरान शिया इस्लामिक देश है और भारत में भी ईरान के बाद सबसे ज़्यादा शिया मुसलमान हैं. अगर भारत का विभाजन न हुआ होता यानी पाकिस्तान नहीं बनता तो ईरान से भारत की सीमा लगती. पाकिस्तान और ईरान भले पड़ोसी हैं पर दोनों के संबंध बहुत अच्छे नहीं रहे.

मंगलवार को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ईरान के दौरे पर थे. उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़ारिफ़ से मुलाक़ात की. ईरानी विदेश मंत्री ने ट्वीट कर बताया है कि भारतीय विदेश मंत्री से कई मुद्दों पर बहुत ही सकारात्मक बात हुई है. इससे पहले छह सितंबर को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ईरान में थे और उन्होंने ईरान के रक्षा मंत्री ब्रिगेडियर जनरल आमिर हतामी से मुलाक़ात की थी. चार दिनों के भीतर मोदी सरकार के दो-दो कैबिनेट मंत्रियों का ईरान जाने का मतलब क्या है?

एक हफ़्ते में दो मंत्रियों का दौरा

कई देशों में भारत के राजदूत रहे राकेश सूद कहते हैं कि ईरान में चार दिनों के भीतर मोदी सरकार के दो-दो कैबिनेट मंत्रियों के जाने को दो तरीक़ों से देखा जा सकता है. राकेश सूद कहते हैं, "राजनाथ सिंह मॉस्को से लौटते वक़्त तेहरान पहुंचे और विदेश मंत्री एस. जयशंकर मॉस्को जाने से पहले ईरान गए. दोनों एयरफोर्स के विमान से गए थे. ऐसे में मॉस्को से सीधे नई दिल्ली या नई दिल्ली से सीधे मॉस्को नहीं जा सकते. बीच में कहीं न कहीं तो रुकना था. दोनों ने तेहरान को चुना. ज़ाहिर है तेहरान के बदले दोनों दुबई को भी चुन सकते थे. लेकिन तेहरान का चुनना केवल रास्ते में रुकने जैसा नहीं है. ईरान भारत के लिए आज के समय में कई मामलों में बहुत अहम है."

राकेश सूद कहते हैं, ''ईरान, चीन, रूस, पाकिस्तान और तुर्की मध्य-पूर्व में साथ आते दिख रहे हैं. चीन तो ईरान और पाकिस्तान में कई बड़ी परियोजनाओं पर काम भी कर रहा है. रूस भी मध्य-पूर्व में अमरीका के ख़िलाफ़ अहम ताक़त है. मध्य-पूर्व में रूस और चीन की लाइन अलग नहीं है. पाकिस्तान, तुर्की और ईरान भी इसी लाइन पर हैं. दूसरी तरफ़ भारत को ईरान से बहुत अच्छी ख़बर नहीं मिल रही. भारत ईरान में चाबहार प्रोजेक्ट को अब भी उस तरह से ज़मीन पर नहीं उतार पाया है. इसके अलावा, मध्य-पूर्व में भारत उन देशों के क़रीब है जिनकी क़रीबी अमरीका से है. मसलन, सऊदी अरब और यूएई."

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साउथ एशिया डेमोक्रेसी वॉच की ओर से पिछले महीने 26 अगस्त को आयोजित आस्मा जहांगीर मेमोरियल लेक्चर में पाकिस्तान की जानी-मानी रक्षा विशेषज्ञ आयशा सिद्दिक़ा ने कहा था कि दुनिया करवट ले रही है और पुरानी व्यवस्था के साथ पुराने गठबंधन भी टूट रहे हैं. आस्मा ने कहा कि पाकिस्तान और अमरीका का संबंध भयानक रूप से बदल गया और इसका सीधा असर भारत पर पड़ा है.

आयशा ने कहा, ''यहां तक कि पाकिस्तान ने अमरीका-तालिबान वार्ता में अहम भूमिका निभाई लेकिन पाकिस्तान को अमरीका से मिलने वाली सारी आर्थिक मदद बंद हो चुकी है. पाकिस्तान अमरीकी गठबंधन में 9/11 के बाद शामिल हुआ था. हालांकि लोगों का कहना था कि पाकिस्तान मजबूरी में आर्थिक मदद के लिए शामिल हुआ था. ओसामा बिन-लादेन को रखने और तालिबान को समर्थन देने के मामले में पाकिस्तान के पास चुप्पी के अलावा कुछ कहने के लिए नहीं रहा है. अब पाकिस्तान के लिए चीन एकमात्र विकल्प है. पाकिस्तान संकट की घड़ी में चीन के अलावा किसी और से उम्मीद नहीं कर सकता. विश्व राजनीति के बदलते नए समीकरण में अमरीका, सऊदी अरब और भारत साथ हो गए हैं. ऐसे में पाकिस्तान अब चीन, रूस और ईरान के खेमे में जाता दिख रहा है."

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने हाल ही में कहा था कि पाकिस्तान का भविष्य चीन के साथ ही है.

मध्य-पूर्व में बनते नए समीकरण

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आयशा सिद्दिक़ा ने इस मेमोरियल लेक्चर में कहा, ''ईरान और पाकिस्तान दोनों चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के हिस्सा हैं. ऐसे में उम्मीद की जा रही है दोनों मुल्कों में क़रीबी बढ़ेगी. चीन और ईरान के बीच कई बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर के लिए बातचीत चल रही है. एक वक़्त में ईरान और पाकिस्तान दोनों अमरीका के सहयोगी रहे हैं. एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान और ईरान बीआरआई से फ़ायदा उठा पाएंगे? हम इसे देखने के लिए इंतज़ार ही कर सकते हैं. पाकिस्तान में ऐसे भी शिया और सुन्नी की लड़ाई चलती रहती है. दूसरी तरफ़, ईरान और पाकिस्तान की दोस्ती सऊदी अरब को पसंद नहीं आएगी. पाकिस्तान ईरान और सऊदी के बीच संतुलन कैसे बनाएगा?"

राजनाथ सिंह और एस जयशंकर के तेहरान दौरे को पाकिस्तान, ईरान, रूस, चीन और तुर्की के बनते गठजोड़ के आईने में भी देखा जा रहा है. भारत की चीन, तुर्की और पाकिस्तान से कभी दोस्ती नहीं रही लेकिन रूस तो भारत का दोस्त रहा है और ईरान से भी अच्छे संबंध रहे हैं. ऐसे में भारत की यह चिंता लाजिमी है कि ईरान और रूस से अपने संबंधों को ख़राब न होने दे. अभी लद्दाख में सरहद पर भारत और चीन की सेना आमने-सामने है. पूरे विवाद में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का हटाया जाना भी एक कारण है. चीन, पाकिस्तान, तुर्की और यहां तक कि ईरान ने भी भारत के इस क़दम का खुलकर विरोध किया था. रूस ने भारत का विरोध नहीं किया था. लेकिन चिंता इस बात की है कि अगर रूस के साथ चीन पाकिस्तान को लाने में कामयाब होता है तो यह भारत के लिए बड़ा झटका होगा.

एक तरफ़ ईरान और चीन की क़रीबी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ़ भारत ईरान में जिस चाबहार प्रोजेक्ट को अंजाम तक पहुंचाना चाहता था वो लटकता दिख रहा है. मध्य-पूर्व के देशों में ईरान और तुर्की ही कश्मीर के मसले पर खुलकर सामने आए थे. चीन से तनाव के बीच भारत के लिए यह बहुत ही अहम है कि वो किन देशों के साथ आए. मध्य-पूर्व में भारत के लिए चीन से मुक़ाबला करना धीरे-धीरे और मुश्किल होता जा रहा है. एईआई चाइना ग्लोबल इन्वेस्टमेंट ट्रैकर के अनुसार 2005 से 2019 के बीच चीन ने मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में 55 अरब डॉलर निवेश किए. ऐडडेटा रिसर्च लैब के अनुसार 2004-2014 के बीच चीन ने 42.8 अरब डॉलर की आर्थिक मदद इन इलाक़ों में दी. इसके इलाक़े के कई देशों में चीन सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है.

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ईरान का बढ़ता प्रभाव

मध्य-पूर्व में ईरान एक बड़ा खिलाड़ी है और वहां भारत का प्रभाव लगातार कम हो रहा है और चीन के पक्ष में चीज़ें मज़बूती से आगे बढ़ रही हैं. चीन और ईरान के बीचे होने वाला कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटिजिक पार्टनरशिप अग्रीमेंट की रिपोर्ट लीक होने के कुछ दिन बाद ही चाबहार प्रोजेक्ट के लिए रेलवे लिंक को ईरान ने ख़ुद ही आगे बढ़ाना शुरू कर दिया था. इससे पहले इसमें भारत भी शामिल था. इस रेल लाइन को ईरान के चाबहार से अफ़ग़ानिस्तान के ज़ेरांज प्रांत तक ले जाने की योजना है. लीक्ड रिपोर्ट के अनुसार, चीन के साथ जिस प्रोजेक्ट पर ईरान की बात चल रही है वो 400 अरब डॉलर की है.

पिछले साल नवंबर महीने में ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने भारत की महिला पत्रकारों के एक समूह से कहा था कि भारत और ईरान के रिश्ते तात्कालिक वैश्विक वजहों या राजनीतिक आर्थिक गठबंधनों से नहीं टूट सकते. भारत ने ईरान के ख़िलाफ़ पाबंदियों को लेकर स्वतंत्र रुख़ अपनाया है लेकिन हम अपने दोस्तों से उम्मीद करते हैं कि वो झुके नहीं. आप में दबाव को ख़ारिज करने की क्षमता होनी चाहिए क्योंकि अमरीका डराता-धमकाता रहता है और भारत उसके दबाव में आकर ईरान से तेल नहीं ख़रीदता है. अगर आप मुझसे तेल नहीं ख़रीदेंगे तो हम आपसे चावल नहीं ख़रीदेंगे.''

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ईरान को लगता था कि भारत सद्दाम हुसैन के इराक़ के ज़्यादा क़रीब है. हालांकि, भारत के तब इराक़ से रिश्ते भी अच्छे थे और लंबे समय तक इराक़ भारत में सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश रहा. गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल से आर्थिक संबंध और भारतीय कामगारों के साथ प्रबंधन के क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं के कारण अरब देशों से भारत के मज़बूत संबंध कायम हुए. भारत की ज़रूरतों के हिसाब से ईरान से तेल आपूर्ति कभी उत्साहजनक नहीं रही. इसके मुख्य कारण इस्लामिक क्रांति और इराक़-ईरान युद्ध और अमरीका रहे.

भारत भी ईरान से दोस्ती को मुकाम तक ले जाने में लंबे समय से हिचकता रहा है. 1991 में शीतयुद्ध ख़त्म होने के बाद सोवियत संघ का पतन हुआ तो दुनिया ने नई करवट ली. भारत के अमरीका से संबंध स्थापित हुए तो उसने भारत को ईरान के क़रीब आने से हमेशा रोका.

इराक़ के साथ युद्ध के बाद से ईरान अपनी सेना को मज़बूत करने में लग गया था. उसी के बाद से ईरान की चाहत परमाणु बम बनाने की रही है और उसने परमाणु कार्यक्रम शुरू भी कर दिया था. अमरीका किसी सूरत में नहीं चाहता है कि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न बने और मध्य-पूर्व में उसका दबदबा बढ़े. ऐसे में अमरीका ने इस बात के लिए ज़ोर लगाया कि ईरान के बाक़ी दुनिया से संबंध सामान्य न होने पाएं.

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