मोदी बोले, 'प्रवासी मज़दूरों के दम पर सरकार ने बनाया रिकॉर्ड' - प्रेस रिव्यू

PTI

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार, शहरों से लौटे प्रवासी मज़दूरों ने पीएम आवास योजना के तहत बनने वाले मकानों के काम में तेज़ी लाने का बड़ा काम कर दिखाया है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि इन मज़दूरों के दम पर भारत सरकार एक रिकॉर्ड कायम करने में सफल हुई है.

द इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने लिखा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने एक 'वर्चुअल गृह-प्रवेश समारोह' में यह बात कही. वे मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाक़े में कुछ लोगों को पीएम आवास योजना के तहत मिले मकानों के गृह-प्रवेश के अवसर पर बोल रहे थे.

रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री ने कहा, "दोस्तों, कोरोना महामारी के इस काल में, तमाम बाधाओं के बीच, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत देश भर में क़रीब 18 लाख मकान बनाकर तैयार किये गए. इनमें से अकेले मध्यप्रदेश में एक लाख 75 हज़ार मकान बने हैं. जिस रफ़्तार से यह काम किया गया, वह अपने आप में एक रिकॉर्ड है."

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उन्होंने कहा, "सामान्य दिनों में, पीएम आवास योजना के तहत एक घर को बनने में 125 दिन लगते थे. लेकिन अब जो जानकारी मैं आप सबसे शेयर करने वाला हूँ, वो इस देश के विकास के लिहाज़ से बहुत ही सकारात्मक सूचना है. कोरोना काल में, हम एक घर 45 से 60 दिनों में बनाकर तैयार करने में सफल रहे हैं. यह आपदा को अवसर में बदलने का बेहतरीन नमूना है."

पीएम मोदी बोले, "आप सोचेंगे कि यह कैसे संभव है? तो दोस्तों, हमारे मेहनतकश भाईयों और बहनों ने, जो कोरोना काल में शहरों से अपने गाँव लौटने को मजबूर हुए, उन्होंने इस काम की रफ़्तार बढ़ाने में बड़ी मदद की. उनके पास कौशल है और शक्ति भी, इसलिए वो इस मुहिम से जुड़े और नतीजे आपके सामने हैं."

प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि इन मज़दूरों को प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान के तहत लाभ दिये गए ताकि वो अपना घर चला सकें.

उन्होंने कहा कि ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था के लिए पीएम ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान काफ़ी फायदेमंद साबित हुआ है.

'जजों को समझा जा रहा गपशप का पात्र'

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एन वी रमन्ना ने इस बात पर चिंता ज़ाहिर की है कि पिछले कुछ समय से जजों को आलोचना के लिए सॉफ़्ट टारगेट बनाया जा रहा है.

हिन्दुस्तान टाइम्स अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे सीनियर जज जस्टिस रमन्ना ने कहा है कि "न्यायाधीशों को आत्मसंयम का पालन करना पड़ता है और ख़ुद का बचाव करने का उनके पास कोई उपाय नहीं होता."

सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस एस ए बोबडे के सामने एक कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस एन वी रमन्ना ने यह बात कही. उन्होंने न्यायाधीशों को आलोचना के लिए सॉफ्ट टारगेट बनाये जाने के बढ़ते चलन पर चिंता जताई.

भारत के अगले प्रधान न्यायाधीश बनने वाले जस्टिस रमन्ना ने कहा, "चूंकि न्यायाधीश अपने बचाव में बोलने से ख़ुद को रोकते हैं, उन्हें अब आलोचना के लिए सॉफ़्ट टारगेट समझा जा रहा है, ख़ासकर सोशल मीडिया पर, जहाँ जजों को गपशप का पात्र बनाया जा रहा है. यह ग़लतफहमी है कि न्यायाधीश आराम का जीवन जीते हैं. यह सच नहीं है."

जस्टिस रमन्ना ने कहा कि न्यायाधीशों को स्वतंत्र होने के लिए अपने सामाजिक जीवन को संतुलित करना होता है. उन्होंने ये बातें सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस आर भानुमति की क़िताब 'ज्यूडिशियरी, जज, एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ़ जस्टिस' नामक पुस्तक के लोकार्पण समारोह में कहीं.

इस कार्यक्रम में मौजूद रहे चीफ़ जस्टिस एस ए बोबडे ने भी जस्टिस रमन्ना की टिप्पणियों का समर्थन किया.

एस्ट्राज़ेनेका ने फिर शुरू किये ब्रितानी वैक्सीन के ट्रायल, भारत में कब होगी शुरुआत?

दवा निर्माता कंपनी एस्ट्राज़ेनेका ने एक बार फिर ब्रितानी कोरोना वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल शुरू कर दिये हैं.

द टेलीग्राफ़ अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने कहा है कि ब्रिटेन के मेडिसिन हेल्थ रेगुलेटरी अथॉरिटी (एमएचआरए) द्वारा अनुमति मिलने के बाद वैक्सीन के ट्रायल दोबारा शुरू करने का निर्णय लिया गया है.

ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी के विज्ञानियों द्वारा विकसित इस टीके को अब तक के सबसे आधुनिक टीकों में से एक माना जाता है जिसे लेकर संदेह तब पैदा हुआ जब ट्रायल के दौरान एक वॉलेंटियर में कोरोना जैसे लक्षण दिखाई देने लगे. डॉक्टरों को लगा कि वैक्सीन कहीं कम प्रभावी तो नहीं, जिसकी वजह से वॉलेंटियर में कोरोना का प्रभाव दिख रहा है.

इसके बाद ना सिर्फ़ ब्रिटेन, बल्कि अन्य देशों समेत भारत में भी इस वैक्सीन के ट्रायल रोक दिये गए थे.

एमएचआरए ने जब इस मामले की जाँच की तो पाया कि वो वॉलेंटियर जिसे कोरोना के प्रभाव में समझा गया, वो दरअसल कोरोना नहीं, बल्कि एक अन्य बीमारी से ग्रसित था.

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ब्रिटेन में एस्ट्राज़ेनेका के ट्रायल रुकने का असर पूरी दुनिया में चल रहे क्लीनिकल ट्रायल्स पर पड़ा है. भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया इस वैक्सीन के ट्रायल कर रहा है जिसने कुछ दिन पहले ही डीसीजीआई के निर्देश पर इस वैक्सीन के ट्रायल रोक दिये थे. अब डीसीजीआई को ही तय करना होगा कि क्लीनिकल ट्रायल दोबारा कब शुरू हो सकते हैं.

लॉकडाउन में तेज़ी से बढ़ी ड्रग्स की खपत

द हिन्दू अख़बार ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि 'लंबे वक़्त तक शराब की दुकानें बंद रहने की वजह से ड्रग्स की माँग में तेज़ वृद्धि हुई.'

अख़बार ने दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से लिखा है कि लंबे लॉकडाउन के दौरान गांजे की खपत में तेज़ वृद्धि देखी गई. यह एक ऐसा ड्रग है जो आसानी से मिल जाता है. दिल्ली जैसे शहरों में जहाँ शराब की दुकानें लंबे समय तक बंद थीं, वहाँ गांजे की खपत बढ़ने के कारण इसकी क़ीमत में भी तीन गुना तक वृद्धि हुई.

इस अधिकारी ने अख़बार को बताया कि "हमने भारी मात्रा में गांजा बरामद किया है जिसे दिल्ली-एनसीआर में बिक्री के लिए झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और राजस्थान जैसे प्रदेशों से लाया गया था. हमने अपने मुख़बिरों के नेटवर्क की मदद से ड्रग्स की आवाजाही का पता लगाया और कार्रवाई की."

अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, 31 अगस्त तक दिल्ली पुलिस ने 2,262 किलो गांजा, 28 किलो अफ़ीम, 8 किलो चरस, 50 किलो स्मैक या हिरोइन और क़रीब 700 किलो कोकेन बरामद किया.

गांजे की मात्रा सबसे अधिक होने की वजह समझाते हुए पुलिस अधिकारी ने बताया, "यह ऐसा ड्रग है जिसे तैयार करने में कोई मेहनत नहीं लगती. यह आसानी से मिल जाता है. बाकियों से सस्ता भी होता है और लॉकडाउन के दौरान इसकी काफ़ी बिक्री हुई. इसे बेचने वालों में रिक्शा चलानेवाले भी हैं और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले कुछ लोग भी, जो किसी जानकार के ज़रिये ही इसे बेचते हैं."

रिपोर्ट के अनुसार, साल 2019 में ड्रग्स से संबंधित 712 केस दर्ज किये गए थे और 909 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. वहीं इस साल, अब तक 373 केस दर्ज किये जा चुके हैं और 461 लोगों को नारकोटिक्स एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया है.

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