अफ़ग़ान-तालिबान वार्ता: क्या भारत के लिए बदल जाएगा अफ़ग़ानिस्तान

  • कमलेश
  • बीबीसी संवाददाता

अफ़ग़ानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच क़तर में पहली बार शांति वार्ता हो रही है.

इस वार्ता के उद्घाटन समारोह में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी ऑनलाइन हिस्सा लिया.

वहीं, मंत्रालय के संयुक्त सचिव जेपी सिंह राजधानी दोहा पहुंचे हैं. वो इस उद्घाटन समारोह में भारतीय प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुए हैं.

भारत भी अफ़ग़ानिस्तान-तालिबान शांति वार्ता में ख़ासी दिलचस्पी रखता है और चाहता है कि दोनों के बीच बातचीत सफल साबित हो.

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस समारोह को संबोधित करते हुए भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच ऐतिहासिक रिश्तों और सहयोग पर बात की.

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COVER STORY:क्या तालिबान से बनेगी बात?

भारत के लिए चिंता की बात

एस जयशंकर ने ज़ोर दिया कि अफ़ग़ानिस्तान शांति वार्ता हो और उसमें अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं और अल्पसंख्यंकों के हितों को ध्यान में रखा जाए.

भारत के लिए ये वार्ता बेहद अहम है क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का मज़बूत होना भारत के लिए चिंता की बात हो सकती है.

तालिबान पाकिस्तान के करीब है और भारत-पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे नहीं हैं.

अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत कराने में पाकिस्तान की भूमिका भी छुपी हुई नहीं है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने वार्ता का स्वागत करते हुए कहा था कि हमारे एकजुट प्रयासों से वो दिन आ गया जिसका अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को सालों से इंतज़ार था.

भारत के लिए अफ़ग़ानिस्तान का महत्व

भारत ने सालों अफ़ग़ानिस्तान में शिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाओं के सुधार में मदद दी है. भारत ने यहां बड़े पैमाने पर निवेश किया है.

अफ़गानिस्तान का नया संसद भवन बनाने के अलावा भारत वहां बांध, सड़क, शिक्षण संस्थान और अस्पताल बनाने की योजनाओं से जुड़ा है.

भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक़, अफ़गानिस्तान में क़रीब 1700 भारतीय मौजूद हैं जो वहां स्थित बैंकिंग, सुरक्षा और आईटी सेक्टर की कंपनियों के अलावा अस्पतालों में काम करते हैं.

इसके अलावा रणनीतिक स्तर पर और देश की सुरक्षा के लिहाज़ से भी अफ़ग़ानिस्तान में भारत की पकड़ कमज़ोर होना उसके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है.

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अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के साथ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

भारत के साथ संबंधों पर असर

अफ़गान-तालिबान वार्ता में संघर्ष विराम और शांति वार्ता के बाद की व्यवस्था को लेकर फ़ैसला होना है.

अफ़ग़ानिस्तान में कई लोगों को ये उम्मीद है कि सरकार को तालिबान से बातचीत में धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता जैसी देश की प्रमुख उपलब्धियों की सुरक्षा करनी चाहिए.

लेकिन, तालिबान इन मसलों पर कट्टर नज़रिया अपनाता आया है. वो शरिया लागू करने का पक्षधर रहा है. इसके संकेत इस बात से भी मिलते हैं कि तालिबान का प्रतिनिधित्व एक धार्मिक गुरु शेख़ अब्दुल हाकिम कर रहे हैं.

जानकार मानते हैं कि अगर तालिबान इस्लामी क़ानून लागू करने की अपनी मांग पर अड़ा रहता है या उस पर सहमति बनी तो ये भारत के लिए बहुत बुरी ख़बर होगी.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज़ में प्रोफेसर संजय के भारद्वाज कहते हैं, "तालिबान हमेशा से इस्लामी क़ानून लागू करने का पक्षधर रहा है. ये हो सकता है कि वो संघर्षविराम के लिए राज़ी हो जाए लेकिन लोकतांत्रितक संवैधानिक सरकार के लिए उसका तैयार होना मुश्किल है. ऐसे में दोनों देशों के सहयोगपूर्ण रिश्ते तो प्रभावित होगें ही साथ ही भारत की सुरक्षा के लिए भी ख़तरा पैदा हो जाएगा."

"भारत हमेशा से चरमपंथ से पीड़ित रहा है और तालिबान से भारत विरोधी चरमपंथी गुटों को भी समर्थन मिला है. अगर अफ़ग़ानिस्तान में कट्टर ताकतें मजबूत होती हैं तो भारत क्या पूरे दक्षिण एशिया को इसका ख़ामियाज़ा भुगतान पड़ेगा. ये देश पहले भी चरमपंथी हिंसा झेलते रहे हैं."

भारत-तालिबान का बदलता रुख

भारत कहता रहा है कि वह अफ़ग़ानिस्तान में एक शांतिजनक, स्थिर, सुरक्षित और लोकतांत्रिक सरकार चाहता है. उसने इस वार्ता का स्वागत किया है. लेकिन, भारत ने ये भी कहा कि ये वार्ता अफ़ग़ान सरकार के नेतृत्व में और नियंत्रण में हो.

भारत और अफ़ग़ानिस्तान के लंबे समय से दोस्ताना संबंध रहे हैं लेकिन भारत तालिबानी सत्ता का हमेशा विरोधी रही है. भारत ने तालिबान से मिलने का कभी समर्थन नहीं किया क्योंकि उसका स्टैंड है कि अच्छा तालिबान और बुरा तालिबान जैसा कुछ नहीं होता है.

लेकिन, हाल के समय में तालिबान को लेकर भारत के रुख में अंतर आया है. इसकी क्या वजह है और क्या ये अंतर दोनों के रिश्तों पर कोई प्रभाव लाएगा.

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क्या अफ़ग़ानिस्तान में भारत का रोल बदल रहा है, तालिबान से करेगा बात?

पूर्व राजदूत अशोक सज्जनहार कहते हैं कि अब जब स्थितियां बदल रही हैं और तालिबान का रुख भी पहले के मुक़ाबले नरम है तो भारत के रुख में भी बदलाव आया है. इसकी शुरुआत नवंबर 2018 में रूस में तालिबान को जब बुलाया गया था तभी से हो गई थी. तब भारत के दो सेवानिवृत्त राजनयिक वहां ऑब्ज़र्वर के तौर पर शामिल हुए थे.

अशोक सज्जनहार कहते हैं, "अभी जो तालिबान है वो 1990 के तालिबान से अलग है. वो इस्लामी देश भी चाहते हैं लेकिन उसमें समावेश की बात भी करते है. उसे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति चाहिए. फिर भारत को अफ़ग़ानिस्तान में ज़मीनी स्तर पर लोगों के बीच अच्छा समर्थन प्राप्त है. भारत ने वहां जितना काम किया है कोई और देश नहीं कर पाएगा. कोई भी सरकार आती है तो वो इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएगी."

हालांकि, संजय भारद्वाज का मानना है कि ये सभी बातें उस सरकार के लिए सही हैं जो लोकतांत्रिक है और जिसकी जवाबदेही है. लेकिन, अगर तालिबान इस्लामी क़ानून पर चलेगा और तानाशाही रवैया अपनाएगा तो उसकी कोई जवाबदेही नहीं होगी. ऐसे में वार्ता क्या रुख लेती है ये बहुत मायने रखता है.

चीन को लेकर चिंता

भारत की चिंता सिर्फ़ तालिबान और अपने संबंधों को लेकर नहीं है. इन संबंधों में पाकिस्तान और चीन की भूमिका भी अहम हो जाती है. चीन भी अफ़ग़ानिस्तान में तांबे और लोहे की ख़दानों में निवेश करता रहा है. वह वन बेल्ट वन रोड योजना के तहत कई देशों पर अपना प्रभाव बढ़ता रहा है.

वहीं, चीन-पाकिस्तान और तालिबान-पाकिस्तान की नज़दीकी भी जग जाहिर है. ऐसे में चीन पाकिस्तान की मदद से तालिबान से करीबी बढ़ा सकता है जो भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएगा.

अशोक सज्जनहार भी इस बात से कुछ हद तक सहमति जताते हैं. वह कहते हैं, "चीन अफ़ग़ानिस्तान में एक प्लेयर तो ज़रूर होगा. नई व्यवस्थाओं में वो भी अफ़ग़ानिस्तान में पैठ बनाने की कोशिश करेगा. लेकिन, चीन पहले भी वहां निवेश कर चुका है लेकिन उस पर ज़्यादा काम नहीं हो पाया और वहीं, भारत ने ज़मीनी तौर पर काम करके दिखाया है. भारत दूसरे देश की चिंता किए बिना अपनी मजबूती पर काम करेगा."

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चीन अब पाकिस्तान, नेपाल और अफ़ग़ानिस्तान से मिलकर क्या करने वाला है?

पाकिस्तान की बात करें तो अशोक सज्जनहार कहना है कि अगर तालिबान बिल्कुल ही पाकिस्तान के कहे अनुसार चला, तब तो भारत के लिए चिंता हो सकती है. लेकिन, मुझे लगता है कि तालिबान सत्ता में आने के बाद कुछ हद तक उदारता लाएगा और अपने अनुसार सरकार चलाएगा. किसी भी सरकार की तरह वो भी दूसरे देशों से अच्छे संबंध बनाना चाहेगा.

इस सबके बीच कुछ जानकारों को ये भी लगता है कि इस वार्ता का कोई नतीज़ा नहीं निकलेगा. ये एक तरह से अमरीकी चुनाव से पहले की कवायद है. क्योंकि 9/11 झेलने के बाद अमरीका कभी अफ़ग़ानिस्तान को तालिबानी ताकतों के हवाले नहीं करेगा.

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अफ़ग़ानिस्तान से लौटे सिख और हिंदू, सुनाई खौफ़ की दास्तां

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