प्याज़ के दाम बढ़ने की वजह फसल ख़राब होना है या कुछ और

  • दिलनवाज़ पाशा
  • बीबीसी संवाददाता
क्या प्याज़ के दाम बढ़ने की वजह फसल ख़राब होना है या कारण कुछ और हैं?

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प्याज़ का ठीक-ठीक इतिहास तो स्पष्ट नहीं है लेकिन ये माना जाता है कि इसे सबसे पहले मध्य एशिया में उगाया गया.

इतिहासकारों की इस बात पर एक राय है कि खेती की शुरुआत से पहले हमारे पूर्वज जंगली प्याज़ खाते थे. ये भी माना जाता है कि प्याज़ की खेती कोई पांच हज़ार साल पहले शुरू हुई होगी और ये हज़ारों सालों से दुनियाभर में भोजन का हिस्सा रही है.

प्याज़ का ज़िक्र बाइबल में भी है और क़ुरान में भी. चरक संहिता में तो प्याज़ को दवा बताते हुए इसे दिल, आंखों और जोड़ों के लिए फ़ायदेमंद बताया गया है.

प्राचीन मिस्र के लोग परत दर परत खुलने वाली प्याज़ को शाश्वतता का प्रतीक मान इसकी पूजा करते थे.

सिर्फ़ भूख ही नहीं, प्यास भी मिटाने वाली ये सब्ज़ी कई स्वरूपों में खाई जाती है. जब खाने के लिए और कुछ नहीं होता तो लोग प्याज़ के साथ ही रोटी खा लेते हैं.

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सलाद से लेकर सब्जी और बिरयानी से लेकर कोरमे तक के लिए ज़रूरी प्याज़ के दाम जब भी बढ़ते हैं, राजनीतिक पारा गर्म होने लगता है. अब एक बार फिर भारत में प्याज़ के दाम बढ़ रहे हैं और इसे लेकर सरगर्मियां भी बढ़ रही हैं.

मंगलवार को दिल्ली में प्याज़ का खुदरा दाम पचास रुपए प्रति किलो तक था. ठेले पर सब्ज़ी बेच रहा एक विक्रेता जो 40 रुपए प्रति किलो प्याज़ बेच रहा था उसने कहा, 'मेरे पास पुराने ख़रीदे प्याज़ रखे हैं इसलिए मैं चालीस रुपए किलो बेच रहा हूं. अब मंडी में दाम बढ़ गया है.'

उसकी बात सही थी, एक अन्य सब्ज़ी विक्रेता पचास रुपए किलो प्याज़ बेच रहा था. उसने कहा, 'आज मंडी में भाव बढ़ा हुआ है. आढ़ती कह रहे थे पीछे से प्याज़ नहीं आ रहा है इसलिए दाम और बढ़ सकते हैं.'

दिल्ली की आज़ादपुर सब्ज़ी मंडी में मंगलवार को प्याज़ के थोक दाम 22 रुपए से लेकर 37 रुपए प्रति किलो तक थे. आज़ादपुर मंडी के एक सब्ज़ी व्यापारी ने अपना नाम न बताते हुए कहा, 'सितंबर-अक्तूबर में हर साल प्याज़ के दाम बढ़ने लगते है क्योंकि कई इलाक़ों में बारिश की वजह से फसल ख़राब हो जाती है जिससे आपूर्ति प्रभावित होती है.'

इस व्यापारी ने कहा कि मंडी में प्याज़ कम आ रहा है, इसे देखते हुए लग रहा है कि अगले एक दो सप्ताह प्याज़ के दाम और अधिक बढ़ेंगे. अभी एक सप्ताह पहले तक ही दिल्ली में प्याज़ फुटकर में बीस रुपए प्रति किलो तक बिक रहा था.

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पिछले साल सितंबर में दिल्ली में प्याज़ 65 रुपए से लेकर 80 रुपए प्रति किलो तक बिका था. तब भी दाम बढ़ने की वजह यही बताई गई थी. लेकिन उससे पहले लगातार पांच साल तक प्याज़ के दाम नियंत्रित थे. साल 2015 से लेकर 2018 तक प्याज़ के दाम 10 रुपए प्रति किलो से लेकर 20 रुपए प्रति किलो के बीच ही रहे थे.

इससे पहले साल 2013 में दिल्ली में प्याज़ के दाम बढ़कर 80 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए थे. उस साल भी प्याज़ के दामों में बढ़ोत्तरी की वजह से बारिश से फसल ख़राब होना ही था.

नाशिक, जहां भारत की सबसे बड़ी प्याज़ मंडी हैं और जहां सबसे ज़्यादा प्याज़ का उत्पादन होता है वहां भी बीते एक सप्ताह से लगातार प्याज़ के दाम बढ़ रहे हैं.

यहां के एक सब्ज़ी व्यापारी आदित्य काबरा ने बीबीसी को बताया, 'मंगलवार को मंडी में प्याज़ का दाम 22 रुपए प्रति किलो से लेकर 30 रुपए प्रति किलो तक था.'

प्याज़ के दामों में बढ़ोत्तरी की वजह बताते हुए उन्होंने कहा, 'दक्षिण भारत, ख़ासकर कर्नाटक से जो प्याज़ मंडियों में पहुंचता था उसकी आपूर्ति प्रभावित हुई है. बारिश होने की वजह से कर्नाटक में फसल ख़राब हो गई है.'

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भारत सरकार ने प्याज़ के बढ़ते दामों को नियंत्रित करने के लिए प्याज़ के निर्यात पर रोक लगा दी है. सरकार को उम्मीद है कि इससे प्याज़ के दामों में कमी आएगी.

लेकिन आदित्य को लगता है कि ये प्रतिबंध दाम नियंत्रित करने में बहुत प्रभावी साबित नहीं होगा. वो कहते हैं, 'बारिश की वजह से सितंबर आते-आते प्याज़ के दाम बढ़ जाते हैं. अगले कुछ हफ्तों में प्याज़ के दाम और बढ़ेंगे क्योंकि माल बचा नहीं है. स्टाक में 25-30 फ़ीसदी माल ही बचा है. प्याज़ खाना लोगों का बंद नहीं होगा. डिमांड ज़्यादा रहेगी, सप्लाई कम रहेगी तो दाम बढ़ना तय है.'

आदित्य की कंपनी भारत के कई शहरों में प्याज़ सप्लाई करती है. दिल्ली-कलकोता समेत कई और बड़े शहरों में वो प्याज़ भेजते हैं. डीज़ल के दाम बढ़ने की वजह से उनका प्याज़ भेजने का ख़र्च बढ़ गया है.

आदित्य कहते हैं, 'पहले जहां डेढ़ रुपए किलो ट्रांसपोर्ट ख़र्च आता था वहां अब पौने दो रुपए किलो ख़र्च आ रहा है.'

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प्याज़ के दाम और राजनीति

जब-जब प्याज़ के दाम बढ़ते हैं इस पर राजनीति भी तेज़ हो जाती है. कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने सरकार पर निशाना साधते हुए एक ट्वीट में कहा है, 'लोगों की जेब में पहले ही पैसा नही,रोज़ नौकरियाँ- रोज़ी जा रही है, ऊपर से कमरतोड़ महँगाई की मार, कहाँ है, क्या कर रही मोदी सरकार? ठीक कहा- मोदी और महँगाई, दोनों हानिकारक हैं."

वहीं यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लोगों को उचित मूल्यों पर सब्ज़ियां उपलब्ध कराने के लिए अधिकारियों को दिशा निर्देश दिए हैं. उन्होंने आलू, प्याज़ और टमाटर की जमाखोरी करने वालों पर कार्रवाई करने के लिए कहा है.

अब बिहार में चुनाव हैं और सरकार नहीं चाहती कि प्याज़ की महंगाई मुद्दा बने. क्योंकि भारत में प्याज़ के दामों का राजनीति को प्रभावित करने का इतिहास रहा है.

1980 में भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दोबारा सत्ता दिलाने में प्याज़ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उस वक़्त इंदिरा गांधी ने प्याज़ की बढ़ी हुई क़ीमतों को तत्कालीन सरकार की नाकामी के तौर पर पेश किया था. इसी साल जनता दल गठबंधन टूटने के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी को जीत मिली थी.

1998 में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में प्याज़ की बढ़ती क़ीमतें एक बड़ा मुद्दा थीं. तब कांग्रेस की शीला दीक्षित ने बीजेपी की सुषमा स्वराज को हराया था.

साल 2013 में जब प्याज़ के दामों ने आसमान छुआ तो बजीपी इसे लेकर प्रदर्शनों पर उतर आई थी. दिल्ली में बीजेपी ने 25 रुपए किलो प्याज़ बेचा था.

इससे पहले जब साल 2010 में भी प्याज़ के क़ीमतों में तेज़ी से उछाल आया था तो इसके विरोध में बीजेपी ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए थे.

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भारत में प्याज़ का उत्पादन

प्याज़ ऐसी सब्ज़ी है जिसका आसानी से भंडारण किया जा सकता है और ये महीनों तक ख़राब नहीं होता. किसान भी दाम बढ़ने की उम्मीद में प्याज़ का भंडारण करते हैं. लेकिन हर बार उन्हें मनमाफिक दाम नहीं मिल पाते.

अभी मई में जब लॉकडाउन लगा तो किसानों के प्याज़ फेंकने की ख़बरें आईं. मध्य प्रदेश के खरगौन में हज़ारों टन प्याज़ किसानों के खेतों में ही सड़ गया.

साल 2018 में किसानों का प्याज़ पचास पैसे प्रति किलो भी नहीं बिका और किसानों को सड़क पर ही प्याज़ फेंकना पड़ा.

भारत में प्याज़ का कुल उत्पादन क़रीब 2 करोड़ 50 लाख मीट्रिक टन से 2 करोड़ 25 लाख मीट्रिक टन के बीच है. देश में हर साल कम से कम डेढ़ करोड़ मीट्रिक टन प्याज़ बेचा जाता है और क़रीब 10 से 20 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ भंडारण के दौरान ख़राब हो जाता है या उसका वज़न कम हो जाता है. औसतन 35 हज़ार मीट्रिक टन प्याज़ निर्यात किया जाता है.

एनएचआरडी के आंकड़ों के मुताबिक़, 2018 में प्याज़ का अनुमानित उत्पादन 2 करोड़ 22 लाख मीट्रिक टन था. लेकिन, हकीकत में यह लगभग 2 करोड़ 50 लाख मीट्रिक टन तक हुआ. वहीं साल 2018-19 में भारत में 2 करोड़ 28 लाख मिट्रिक टन प्याज़ का उत्पादन हुआ था.

भारत सरकार ने इस साल प्याज़ के उत्पादन में सात प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की उम्मीद ज़ाहिर की थी. सरकार ने अनुमान लगाया था कि इस साल प्याज़ का उत्पादन 2 करोड़ 44 लाख मिट्रिक टन होगा. कृषि मंत्रालय ने जनवरी में जारी रिपोर्ट में कहा था कि इस साल 12.93 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर प्याज़ की खेती होगी जो बीते साल के 12.20 लाख हेक्टेयर से कुछ ज़्यादा है.

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प्याज़ बढ़ने की वजह जमाखोरी?

अभी सरकार ने प्याज़ के एक्सपोर्ट पर रोक लगाई है. सरकार का मानना है कि महंगाई बढ़ रही है और इससे प्याज़ के दाम कम होंगे.

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा इस बैन को ग़लत मानते हैं, उनका कहना है कि इससे किसानों को नुक़सान होगा. वो कहते हैं कि प्याज़ के दामों में बढ़ोत्तरी की वजह फसल ख़राब होना नहीं बल्कि व्यापारियों की जमाखोरी है.

वो कहते हैं, "इसी साल मार्च अप्रैल में किसानों को अपने प्याज़ को फेंकना पड़ा था. जब मार्केट क्रैश हुआ तो किसानों का प्याज़ 8-9 रुपए प्रति किलो भी नहीं बिक पाया. अब जब बाज़ार कुछ ठीक हुआ है तो सरकार ने एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया है. प्याज़ के दाम बढ़ने की वजह ये बताई जा रही है कि कर्नाटक में बारिश की वजह से फसल का नुक़सान हो गया है. जबकि इसकी असल वजह जमाखोरी है."

देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "अभी कल जो आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन पारित हुआ है उसमें स्टॉक की सीमा हटा दी गई है. सरकार अब ये भी नहीं जान पाएगी कि किसके पास कितना स्टॉक है. सरकार अगर जमाखोरी को वैध कर देगी तो यही होगा और यही हो भी रहा है."

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बारिश की वजह से फसल ख़राब होने और इससे प्याज़ के दामों में बढ़ोत्तरी के तर्क को ख़ारिज करते हुए देवेंद्र शर्मा कहते हैं, " प्याज़ व्यापारी कह रहे हैं कि कर्नाटक में फसल ख़राब होने से दाम बढ़ रहे हैं. अगर ऐसा है तो ये भी बताया जाए कि कर्नाटक में प्याज़ का रिटेल दाम क्या है? व्यापारी जब भी जमाखोरी करते हैं, कोई ना कोई कारण बताते ही हैं. सच्चाई ये है कि व्यापारी वर्ग परिस्थितियों का फायदा उठा रहे हैं. अभी ये प्याज़ में हो रहा है. जमाखोरी वैध होने के बाद दूसरी चीज़ों में भी होगा."

वो कहते हैं, "किसान पहले भी मार खा रहा था, अब भी मार खा रहा है. किसान महाराष्ट्र में एक्सपोर्ट बैन के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट कर रहे हैं क्योंकि इससे उनका नुक़सान हो रहा है. जब प्याज़ के दाम ज़रा से बढ़ते हैं तो सब चिल्लाने लगते हैं. लेकिन जब किसान को प्याज़ फेंकना पड़ता है तो कोई किसान के लिए नहीं बोलता."

भारत में औसतन हर घर में महीने में साढ़े चार से पांच किलो प्याज़ की खपत होती है. यदि प्याज़ के दाम में दस बीस रुपए बढ़ते भी हैं तो महीने में सौ-दो सौ रुपए तक का ही ख़र्च बढ़ता है. भारत में जब भी प्याज़ के दाम बढ़ते हैं, इसका विरोध शुरू हो जाता है. इसे महंगाई का पैमाना मान लिया जाता है.

देवेंद्र शर्मा का यह भी मानना है कि सरकार नहीं चाहती कि प्याज़ के दाम आगामी चुनावों में मुद्दा बनें. वो कहते हैं, "अब बिहार में चुनाव आ रहे हैं, सरकार नहीं चाहती कि प्याज़ के दाम इसी तरह मुद्दा बने जिस तरह दिल्ली के चुनावों में बने थे. किसानों को अब सरकार वोट बैंक भी नहीं मान रही है."

उनका कहना है कि किसानों का हित सरकार की नीतियों में ही नहीं है. वो कहते हैं, "हमारे देश में जो नीतियां बनाई जाती हैं वो ग्राहक को फायदा देने के मकसद से बनाई जाती हैं ना कि किसान को फायदा देने के लिए. जब भी क़ीमतें बढ़ती हैं सरकार दखल देती है. लेकिन जब कीमतें गिरती हैं और किसान का नुक़सान होता है तब कोई दखल नहीं देता. इससे स्पष्ट है कि किसानों की मदद करना हमारी नीतियों में ही नहीं है."

भारत सरकार के एक्सपोर्ट पर रोक लगाने के बाद व्यापारियों का प्याज़ भी टर्मिनलों पर फंस गया है. पहले सरकार न्यूनतम मूल्य बढ़ाकर बाज़ार को आगाह कर देती थी और एक्सपोर्टर सतर्क हो जाते थे, लेकिन इस बार अचानक बैन लगा दिया गया जिसकी वजह से व्यापारी भी परेशान है.

बीबीसी मराठी से बात करते हुए प्याज़ एक्सपोर्टर विकास सिंह ने कहा, ''इससे पहले भी एक्सपोर्ट बैन हुआ है, लेकिन यह पहली बार हुआ की पोर्ट से जानेवाले जहाज़ से कंटेनर हटाए गए, जिसका जबाब किसी ने नहीं दिया, हमने ग्राहकों से समय पर डिलीवरी देने का वादा किया था. अब हमें पोर्ट पर कंटेनर प्लग इन चार्ज भी देना पड़ेगा. हमारी विश्वसनीयता तो खराब हो ही रही है."

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भारत के प्याज़ एक्सपोर्ट बैन करने के बाद बांग्लादेश में एक ही दिन में प्याज़ के दाम दोगुने हो गए हैं. वहां भारत के ख़िलाफ़ प्रदर्शन होने की भी ख़बरें हैं.

परत दर परत खुलने वाले प्याज़ के कारोबार की कई परते हैं जिन्हें समझना आसान नहीं है. लेकिन एक बात स्पष्ट है कि प्याज़ के दाम ऊपर नीचे होने की एक वजह इसका भंडारण है.

दाम भले बढ़ें, लेकिन हज़ारों सालों से प्याज़ खा रहे लोग इसे खाना नहीं छोड़ेंगे. ना ही इसकी मांग में कमी आएगी. मसालों को नर्म करने और खाने में एक ख़ास क़िस्म का ज़ायका लाने वाली प्याज़ के दाम बढ़ने से भले ही ज़ायका ज़रा ख़राब हो रहा हो.

प्याज़ आंख में आंसू भी लाती है, अभी ये आंसू किसानों की आंखों में हैं, नेताओं को डर है कि कहीं उन्हें न रोना पड़े. शायद इसलिए ही वो भागदौड़ कर रहे हैं.

कल ही महाराष्ट्र के शीर्ष नेता शरद पवार ने एक्सपोर्ट बैन हटवाने के लिए काफ़ी भागदौड़ की है, लेकिन सरकार अभी इसे हटाने के मूड में नज़र नहीं आ रही है.

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