चीन पर राजनाथ सिंह राज्यसभा में बोले- भारत बड़ा और कड़ा क़दम उठाने के लिए तैयार

राजनाथ सिंह

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राज्यसभा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ सीमा पर तनाव को लेकर बयान दिया है.

रक्षा मंत्री ने कहा कि देश हित में चाहे जितना बड़ा या कड़ा क़दम उठाना पड़े भारत पीछे नहीं हटेगा. राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत न तो अपना मस्तक झुकने देगा और न ही किसी का मस्तक झुकाना चाहता है.

रक्षा मंत्री ने कहा, ''भारत हर क़दम उठाने को तैयार है और सेना की पूरी तैयारी है. हमारे जवानों का हौसला बुलंद है. ये सच है कि लद्दाख में हम एक चुनौती से जूझ रहे हैं लेकिन हम चुनौती का सामना करेंगे. हम देश का माथा झुकने नहीं देंगे. हमारे जवान चीनी सेना से आँख से आँख मिलाकर खड़े हैं और सदन से उन्हें इसी हौसला को बढ़ाने का संदेश देना चाहिए.''

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत का मानना है कि द्विपक्षीय रिश्तों को विकसित किया जा सकता है और साथ ही साथ सीमा के मसले के समाधान के बारे में चर्चा भी की जा सकती है.

रक्षा मंत्री ने कहा, ''हम ये दोनों काम कर सकते हैं. लेकिन एलएसी पर शांति में किसी भी तरह की गंभीर स्थिति का द्विपक्षीय रिश्तों पर निश्चित रूप से असर पड़ेगा. ये बात भी दोनों पक्षों को अच्छी तरह समझनी चाहिए.''

उन्होंने 15 जून 2020 को गलवान घाटी में जान गंवाने वाले 20 जवानों को याद किया.

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मौजूदा स्थिति की जानकारी दी

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मौजदा स्थिति की जानकारी देते हुए विस्तार से बताया कि साल 1993 और 1996 के समझौते में इस बात का ज़िक्र है कि एलएसी के पास दोनों देश अपनी सेनाओं की संख्या कम से कम रखेंगे. समझौते में ये भी है कि जबतक सीमा विवाद का पूर्ण समाधान नहीं हो जाता, तब तक एलएसी का कड़ाई से सम्मान और पालन करेंगे और उसका उल्लंघन किसी भी सूरत में नहीं किया जाएगा.

उन्होंने बताया, "इसके आधार पर 1990 से 2003 तक दोनों देशों द्वारा एलएसी पर कॉमन अंडरस्टैंडिंग बनाने की कोशिश की गई, लेकिन इसके बाद चीन ने इस कार्रवाई को आगे बढ़ाने पर अपनी सहमति नहीं जताई. इसके कारण कई जगहों पर चीन और भारत के बीच एलएसी परसेप्शन को लेकर ओवरलैप बराबर बना रहता है."

रक्षा मंत्री ने कहा कि अप्रैल माह से लद्दाख की सीमा पर चीन ने सेना की संख्या और सैन्य हथियार और उपकरणों में वृद्धि की है, जिसे स्पष्ट रूप से देखा गया है.

उन्होंने कहा, "मई महीने की शुरुआत में चीन ने गलवान घाटी क्षेत्र में हमारे सैनिकों की सामान्य गश्ती पैटर्न में व्यवधान डालना शुरू किया. इसके कारण फेस-ऑफ की स्थिति उत्पन्न हुई. ग्राउंड कमांडर इस समस्या को सुलझाने के लिए विभिन्न समझौतों और प्रोटोकॉल के तहत वार्ता कर रहे थे."

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'चीन को दो टूक शब्दों में दिया जवाब'

उन्होंने कहा कि इस बीच मई महीने के मध्य में चीन ने वेस्टर्न सेक्टर में कई जगहों पर एलएसी पर घुसने की कोशिश की है, "लेकिन इन कोशिशों को हमारी सेना ने वक़्त पर देख लिया और आवश्यक जवाबी कार्रवाई भी की."

"और हमने चीन को राजनयिक और सैन्य चैनल के माध्यम से ये अवगत करा दिया कि इस तरह की गतिविधियां यथास्थिति को एकतरफा बदलने की कोशिश है और ये भी साफ कर दिया कि ये प्रयास हमें किसी भी सूरत में मंज़ूर नहीं है. ये दो टूक शब्दों में चीन को बता दिया गया है."

उन्होंने बताया कि एलएसी पर तनाव बढ़ता हुआ देखकर दोनों तरफ के सैन्य कमांडरों ने 6 जून 2020 को बैठक की और इस बात पर सहमति बनी कि आपसी कार्रवाई के आधार पर डिसएंगेजमेंट किया जाना चाहिए. दोनों पक्ष इस बात पर भी सहमत हुए कि एलएसी को माना जाएगा और कोई ऐसी कार्रवाई नहीं की जाएगी, जिससे यथास्थिति बदले.

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'जवानों ने संयम और शौर्य का प्रदर्शन किया'

"लेकिन इस सहमति के उल्लंघन में चीन ने एक बहुत ही हिंसक झड़प की स्थिति 15 जून को गलवान में बनाई. हमारे बहादुर सिपाहियों ने अपनी जान का बलिदान दिया और साथ ही चीनी पक्ष को भी भारी नुकसान पहुंचाया है और अपनी सीमा की सुरक्षा में कामयाब भी रहे हैं. इस पूरी अवधि के दौरान हमारे बहादुर जवानों ने जहां संयम की ज़रूरत थी वहां संयम रखा और जहां शौर्य की ज़रूरत थी वहां शौर्य का भी प्रदर्शन किया."

राजनाथ सिंह ने सदन से अनुरोध किया कि सैनिकों की वीरता और बहादुरी की भूरी-भूरी प्रशंसा की जानी चाहिए.

उन्होंने कहा कि हमारे बहादुर जवाब बहुत ही मुश्किल परिस्थितियों में अपने अथक प्रयास से समस्त देशवासियों को सुरक्षित रखने के अपने प्रयास का निर्वहन कर रहे हैं.

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'पड़ोसियों के साथ आपसी सम्मान भी ज़रूरी'

उन्होंने ये भी कहा कि एक और किसी को भी हमारी सीमा की सुरक्षा के प्रति हमारे दृढ़ निश्चय के बारे में संदेह नहीं होना चाहिए, "वहीं भारत ये भी मानता है कि हमारे पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण संबंधों के लिए आपसी सम्मान और संवेदनशीलता भी रखना ज़रूरी है."

"चूंकि हम इस मौजूदा स्थिति का बातचीत के ज़रिए समाधान चाहते हैं, हमने चीनी पक्ष के साथ राजनयिक और सैन्य संपर्क बनाए रखा है."

राजनाथ सिंह ने बताया, "इस बातचीत में तीन सिद्धांत हमारी अप्रोच को तय करते हैं. पहला, दोनों पक्षों को एलएसी का कड़ाई से सम्मान और पालन करना चाहिए, दूसरा किसी भी पक्ष को अपनी तरफ से यथास्थिति का उल्लंघन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए, तीसरा दोनों पक्षों के बीच सभी समझौतों और अंडरस्टैंडिंग का पूरा पालन करना चाहिए."

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'चीन की कथनी और करनी में अंतर'

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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उन्होंने सदन को ये भी बताया कि चीनी पक्ष की ये पोज़िशन है कि स्थिति को एक ज़िम्मेदार ढंग से हैंडल किया जाना चाहिए और द्विपक्षीय समझौतों और प्रोटोकॉल के साथ शांति और स्थिरता को सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

"इसके बावजूद चीन की गतिविधियों से पूरी तरह स्पष्ट है कि उसकी कथनी और करनी में अंतर है और इसका प्रमाण है कि जब चर्चा चल ही रही थी चीन की तरफ से 29 और 30 अगस्त की रात को उकसाने वाली सैनिक कार्रवाई की गई. वो चीन की तरफ से की गई, भारत की तरफ से नहीं की गई."

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि द्विपक्षीय समझौतों के प्रति चीन की उपेक्षा दिखती है. "चीन की ओर से सैनिकों की भारी संख्या में तैनाती किया जाना 1993 और 1996 के समझौता का उल्लंघन है."

उन्होंने कहा कि अभी भी चीनी पक्ष ने एलएसी और अपने अंदरूनी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में सैनिक टुकड़ियां और गोला-बारूद इकट्ठा किया हुआ है. "चीन की कार्रवाई के जवाब में हमारे सुरक्षा बलों ने भी क्षेत्रों में उपयुक्त काउंटर तैनाती की है ताकि भारत की सीमा पूरी तरह से सुरक्षित रहे."

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