केंद्र सरकार ने फ़ेक न्यूज़ को पलायन का ज़िम्मेदार बताया, क्या कहते हैं प्रवासी मज़दूर?

  • अनंत प्रकाश
  • बीबीसी संवाददाता
नित्यानंद राय

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केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बीते 15 सितंबर को लोकसभा में कहा है कि फे़क न्यूज़ की वजह से पैदा हुए डर के चलते लॉकडाउन के बाद हज़ारों मज़दूरों ने अपने घरों की ओर पैदल चलना शुरू कर दिया था.

केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय ने ये उत्तर तृणमूल कांग्रेस पार्टी की नेता और सांसद माला रॉय के सवाल पर दिया था.

सांसद माला रॉय ने पूछा था कि लॉकडाउन के उपरांत हज़ारों मज़दूरों के अपने-अपने घर पैदल लौटने के क्या कारण हैं.

नित्यानंद राय ने इसके जवाब में कहा, “लॉकडाउन की अवधि के बारे में फ़र्ज़ी समाचारों से उत्पन्न भय के कारण बड़ी संख्या में प्रवासी कामगार का प्रवासन शुरू हो गया था और लोग, विशेषकर प्रवासी कामगार, भोजन, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाओं और आश्रय जैसी मलूभूत आवश्यकताओं की पर्याप्त आपूर्ति के बारे में चिंतित थे. तथापि, केंद्र सरकार इस बात के प्रति सजग थी और उसने यह सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक उपाय किए कि अपरिहार्य लॉकडाउन की अवधि के दौरान कोई भी नागरिक भोजन, पेयजल, चिकित्सा सुविधाओं आदि की मूलभूत सुविधाओं से वंचित न हो.”

केंद्र सरकार की ओर से देश की संसद में ये बयान दिए जाने के बाद बीबीसी ने कुछ प्रवासी मज़दूरों से बात की है.

क्या कहते हैं प्रवासी मज़दूर?

भारत में लॉकडाउन के ऐलान से कुछ दिन पहले शुरू हुआ प्रवासी मज़दूरों का पलायन कई महीनों तक चलता रहा.

लॉकडाउन से पहले जहाँ सड़कों पर दो चार लोग कंधों पर झोले और अपने बच्चों को सहजे हुए पैदल चलते दिख रहे थे. वहीं, लॉकडाउन की घोषणा के बाद देशभर में हाईवे से लेकर अंदरूनी सड़कों और रेलवे लाइनों पर सैकड़ों हज़ारों लोग पैदल चलते देखे गए.

जून जुलाई बीतने के बाद भी कई लोग ट्रक समेत दूसरे बड़े वाहनों में अमानवीय ढंग से यात्राएं करते हुए देखे गए.

बीबीसी संवाददाताओं ने प्रवासी मज़दूरों के साथ सड़क पर चलते हुए उनकी ज़िंदगियों से जुड़ीं कहानियां बयां की हैं.

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय का बयान आने के बाद इनमें से कुछ प्रवासी मज़दूरों ने एक बार फिर बताया है कि वे किन वजहों से महानगरों को छोड़कर अपने घरों की ओर पैदल ही निकल पड़े थे.

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ट्रक में जाते हुए प्रवासी कामगार

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लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में अपने पति के साथ रहने वालीं पूजा कुमारी ने जो कुछ झेला है, उसे भुलाना शायद उनके लिए संभव न होगा. लॉकडाउन से पहले पूजा के पति दिल्ली में ही काम कर रहे थे.

पूजा बताती हैं, “मेरे रूम में खाने पीने के लिए कुछ नहीं था. तीन दिन तक हम चीनी का शर्बत बनाकर पिए. चावल-दाल कुछ नहीं था. मेरा गैस भी ख़त्म हो गया था. फिर कॉल किए 100 नंबर पर. वो जो हेल्पलाइन नंबर शुरू किए थे. उस पर कॉल किया. उन्होंने कहा कि वो खाना लेकर आ रहे हैं. हम बोले ठीक है... इसके बाद भी राशन तो नहीं आया लेकिन सात नंबर गली में बना हुआ खाना लेकर आए. जब खाने के लिए जा रहे थे तो मेरे पति को पुलिस ने डंडा मारकर गिरा दिया.

“मतलब, खाने के लिए भी नहीं जाने दिया. फिर किसी तरह तीन दिन काटे. उसके बाद इतनी हालत ख़राब हो गया था कि क्या बताएं... फिर घर जाने के लिए थाने में आधार कार्ड और लोकेशन वग़ैरह जमा किए. लेकिन कोई कॉल या मैसेज भी मोबाइल में नहीं आया. तब सोचे कि मैसेज भी नहीं आ रहा है, खाने के लिए कोई सुविधा भी नहीं है, रूम में. रूम वाला भी भाड़ा माँग रहा था. तब सोचा कि नहीं कुछ होगा तो पैदल निकल पड़ेंगे. बहुत दूर पैदल सफ़र किया. नोएडा से मोदीनगर पहुँच गए. फिर वहां प्रशासन ने हमें रोक लिया, डंडा मारने लगे और कहने लगे कि रूम पर वापस जाओ."

“हम लोगों ने कहा कि रूम पर क्यों जाएं...मकान मालिक भाड़ा माँग रहा है. क्या करें...”

पूजा कुमारी ओर उनके पति उस दौरान चलाई गईं विशेष ट्रेनों से तमाम दुश्वारियों को झेलती हुईं अपने घर झारखंड पहुँची.

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प्रवासी कामगार महिला, अपने बच्चे के साथ

कुछ ऐसी ही कहानी विमला देवी की है जिन्होंने हाल ही में एक बच्चे को जन्म दिया है.

विमला ने दिल्ली से पलायन की यात्रा गर्भवती रहते हुए तय की थी.

विमला देवी बताती हैं, “हम लोग वहां (दिल्ली) से तब निकले जब हमारे पास कुछ काम नहीं था. खाने-पीने की दिक़्क़त हो गई थी. किराए का कमरा था, ख़र्च नहीं चल पा रहा था. जो चीज़ें चाहिए होती थीं वो नहीं हो पाती थीं. और डिलीवरी भी होनी थी. सब कुछ बहुत मुश्किल हो गया था. और घर आने का कोई साधन नहीं दिख रहा था. ऐसे में हम पैदल चलते चलते आते रहे. रास्ते में एक ट्रक मिल गया तो घर तक आ सके.”

लेकिन पलायन का दंश झेल चुके कई प्रवासी कामगार ऐसे भी थे जो मीडिया और सिस्टम से निराश नज़र आए.

पैदल चलते हुए मरने वाले रणवीर सिंह के साथ दिल्ली से निकले मनोज सिंह ने इस मुद्दे पर बात करने से इनकार कर दिया.

पलायन की प्रताड़ना झेलने वाले एक अन्य प्रवासी कामगार सिट्टू कुमार लॉकडाउन से ठीक पहले रोज़ी-रोटी कमाने के लिए बिहार से दिल्ली आए थे.

दिल्ली में उन्हें काम मिल भी गया लेकिन काम शुरू होने के दो दिन बाद ही लॉकडाउन लग गया.

सिट्टू कुमार बताते हैं, “वहां काम नहीं चल रहा था. हमारे पास खाने तक के लिए रुपये-पैसे नहीं थे. तब जाकर हम निकले थे. हम पहली बार गए थे. सोचा था कि थोड़ा काम कर लेंगे तो पैसे आ जाएंगे. दो दिन काम किया होगा कि लॉकडाउन हो गया. अब क्या कहें...जैसे तैसे घर पहुंच गए हैं. दिल्ली से भूखे प्यासे ट्रेन में दिल्ली से बिहार आए थे. तब तो बहुत दिक़्क़त हुई थी...”

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बच्चे के शरीर का तापमान लेता हुआ स्वास्थ्य कर्मी

इसके साथ ही कुछ प्रवासी कामगार ऐसे भी हैं जिन्होंने पलायन की यातना झेली है. लेकिन गाँव घर में भी रोज़ी रोटी की व्यवस्था न होने की वजह से वे वापस दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों की ओर लौट रहे हैं.

एक बार फिर दिल्ली लौट आए सलमान बताते हैं, “मैं पहले बवाना रहता था, वहां से मैं पहले पैदल ग़ाज़ियाबाद पहुंचा. वहां से कोई वाहन नहीं मिला. तो इसके बाद हम नोएडा एक्सप्रेस वे पहुँच गए. वहां कुछ मीडियाकर्मियों ने हमारी मदद की. जब हम निकले थे तब कुछ राशन नहीं था. लोग भी मदद नहीं कर पा रहे थे. तब हम मजबूरी में वहां से निकले.”

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