आयुष्मान खुराना: 'प्रभावशाली' अभिनेता जो कभी मंच पर जाने से डरता था

  • मधु पाल
  • बीबीसी हिंदी के लिए
आयुष्मान ख़ुराना

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बॉलीवुड अभिनेता आयुष्मान खुराना ने इस साल टाइम मैगज़ीन की 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में अपनी जगह बना ली है. इस सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम है. अपने एक्टिंग करियर के शुरुआती दौर से ही वो उन फ़िल्मों से जुड़े हैं, जो समाज की खोखली धारणाओं को तोड़ती नज़र आती हैं.

विक्की डोनर, दम लगाके हइशा, बधाई हो, शुभ मंगल सावधान, आर्टिकल 15, अंधाधुन, ड्रीम गर्ल, बाला, गुलाबो सीताबो - ऐसी तमाम फ़िल्में हैं, जो समाज को आईना दिखाने का काम करती हैं. इन्ही फ़िल्मों की कामयाबी ने आज आयुष्मान खुराना को एक बड़ा कलाकार बना दिया है, लेकिन उनकी कामयाबी का सफ़र इतना आसान नहीं था.

'तेज़ाब' देख एक्टिंग का शौक़ लगा

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अभिनय के अलावा आयुष्मान की गायकी भी लोगों को बेहद पसंद है. चंडीगढ़ के रहने वाले आयुष्मान को अभिनेता बनने की प्रेरणा उनकी दादी से मिली. उनकी दादी घर पर ही अभिनेता राज कपूर और दिलीप कुमार की मिमिक्री करती थीं.

आयुष्मान जब 6 साल के थे, तब वो माता-पिता के साथ पहली बार थिएटर गए, वहाँ उन्होंने अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित की फिल्म 'तेज़ाब' देखी थी. तभी उन्होंने अभिनेता बनने का निश्चय कर लिया था.

इसके बाद आयुष्मान ने अपने अभिनय कौशल को बढ़ाने के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी में थिएटर किया और नुक्कड़ नाटकों में भी हिस्सा भी लिया.

आयुष्मान ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा था, "मुझे मंच पर आकर बात करने का भय रहता था. मुझे मंच से बहुत डर लगता था. मेरे पिता जी को लगता था कि मुझमें गाने और नाचने का टैलेंट है. इसलिए वो मुझे हर जन्मदिन की पार्टी पर गाने और नाचने के लिए कहते थे, जिससे मेरे अंदर विश्वास आए और मंच का जो डर है, वो निकल जाए. उन्होंने मुझसे कई अभ्यास कराए, जिसके चलते मंच पर जाने का जो डर था, वो हट गया."

फ़्लॉप फ़िल्में देने के बाद अपनी दिल की सुनी

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एक्टिंग के शुरुआती दौर में आयुष्मान को कई ऑडिशन्स में रिजेक्ट कर दिया गया था, जिसकी वजह थी उनकी मोटी भौंहें और उनका पंजाबी लहज़ा. शुरुआत में जब कुछ बात नहीं बनी, तो उन्होंने आरजे के तौर पर काम करना शुरू किया. वर्ष 2004 में मशहूर शो एमटीवी रोडीज़ से उन्हें लाइमलाइट में आने का मौक़ा मिला.

वो इस शो के दूसरे सीजन के विजेता बने. इसके बाद उन्होंने वीडियो जॉकी और टीवी होस्ट बन कई कार्यक्रमों में काम किया. फिर साल 2012 क़िस्मत ने करवट बदली. सुजीत सरकार के निर्देशन में आई उनकी पहली फ़िल्म विक्की डोनर सुपरहिट रही.

इसके बाद 2013 में आई फ़िल्में नौटंकी साला ,बेवकूफियाँ और 2014 में आई 'हवाईज़ादा' बॉक्स ऑफ़िस पर कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पाईं.

इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा था, "मैं जब नया-नया आया था, तो मैं लोगों की बातों को ज़्यादा सुनता था जो मुझसे ज़्यादा अनुभवी थे. मुझे लगता था कि इनको ज़्यादा पता है, लेकिन पता किसी को नहीं होता है. क्योंकि एक मंझा हुआ निर्देशक भी असफल फ़िल्म बना सकता है और एक नया निर्देशक भी सफल फ़िल्म बना सकता है. इस इंडस्ट्री में कोई नियम नहीं है. इस बात को मैंने समझा और तब से ख़ुद की यानी अपने अंदर की आवाज़ सुननी शुरू की और तभी से मेरी फ़िल्में भी चलनी शुरू हुई."

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आयुष्मान खुराना के अच्छे मित्र और निर्देशक राज शांडिल्य कहते हैं, "एक अभिनेता का समझदार होना बहुत ज़रूरी है और वो एक समझदार अभिनेता हैं. उन्हें म्यूजिक से लेकर, गायिकी, स्क्रिप्ट, कंटेंट- हर चीज़ की समझ है. इतनी सारी ख़ूबियाँ जिनमें होती है, वही व्यक्ति आयुष्मान खुराना जैसा बनता है."

"आज टाइम पत्रिका ने 100 प्रभावशाली सूची में उनका नाम शामिल किया है, मुझे लगता है कि वो लेट हो गए हैं. ये तीन साल पहले ही हो जाना चाहिए था. आरजे, वीजे, टीवी, फिल्में - उन्होंने हमेशा अपने आपको टॉप पर ही रखा है. बहुत मेहनत की है."

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"मैंने अपनी ज़िंदगी में उनसे ज़्यादा प्रतिभाशाली अभिनेता नहीं देखा. अभिनेता का मतलब ये नहीं कि आप मेकअप कर लें, ऑटोग्राफ दें, आपके फ़ैंस हैं, आपको लोग फ़ॉलो करते हैं. अभिनेता की ज़िम्मेदारी ये भी होती है कि वो मनोरंजन के साथ -साथ लोगों को एक संदेश भी दे. वो ये ज़िम्मेदारी समझते हैं. वो एक साधारण परिवार से आते हैं, उनका कोई गॉड फ़ादर नहीं था. फ़िल्मों के माध्यम से एक आम आदमी को क्या समझाना है यह उन्हें पता है. यही आम बात उनको ख़ास बनाती है."

आज के अमोल पालेकर हैं आयुष्मान खुराना

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए राज शांडिल्य कहते हैं, "आज फ़िल्मों में आम आदमी का किरदार वही कर सकता है, जिसने आम आदमी की ज़िंदगी जी हो और मध्यम वर्गीय परिवार से आता है."

"इसलिए आयुष्मान अपने किरदार में ढल जाते हैं. जिस तरह से अमोल पालेकर छोटी-छोटी फिल्में किया करते थे और लोगों को संदेश भी दिया करते थे. ऋषिकेश मुख़र्जी की फ़िल्मों में जो देखा जाता था, परिवार की कहानी, अहम बातें और संदेश, अब वो नज़र फिर से नज़र आ रहा है. हम कह सकते हैं कि आज के अमोल पालेकर हैं आयुष्मान खुराना."

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