बाबरी मस्जिद विध्वंस: सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई अदालत की राय बिल्कुल अलग कैसे हो गई?

  • सलमान रावी
  • बीबीसी संवाददाता
बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में अभियुक्त रहीं साध्वी ऋतंभरा

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बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में अभियुक्त रहीं साध्वी ऋतंभरा

छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने को लेकर आपराधिक मामले में फ़ैसले का इंतज़ार किया जा रहा था. सीबीआई की विशेष अदालत का फ़ैसला आया भी, लेकिन इस मामले में पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी समेत सभी 32 अभियुक्तों को बरी कर दिया गया.

इस फ़ैसले को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं, ख़ासकर उस स्थिति में जब पिछले साल अयोध्या में विवादित ज़मीन मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आया था. सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यीय संवैधानिक खंडपीठ ने अपने फ़ैसले में कहा था कि बाबरी मस्जिद को गिराया जाना एक 'ग़ैर क़ानूनी' कृत्य था.

सीबीआई के कामकाज पर भी सवाल उठ रहे हैं. क्योंकि सीबीआई की विशेष अदालत का कहना था कि अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मज़बूत साक्ष्य नहीं पेश किए जा सके.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी इन आरोपों को ख़ारिज कर रही है. भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता ज़फर इस्लाम ने सीबीआई की स्वायत्ता पर उठ रहे सवालों को ग़लत बताया है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि बीजेपी ने जाँच में कोई दखल नहीं दिया है.

उन्होंने कहा- सीबीआई एक स्वतंत्र जाँच एजेंसी है और उसने साक्ष्य के आधार पर काम किया, जो कांग्रेस की सरकारों के दौर में इकट्ठा किए गए थे.

लेकिन हैदराबाद स्थित नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बीबीसी संवाददाता दीप्ति बाथिनी से बातचीत में सीबीआई की विशेष अदालत के फ़ैसले को निराशाजनक बताया और कहा कि ये भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक धक्का है.

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बाबरी विध्वंस मामले के फ़ैसले पर आडवाणी और जोशी क्या बोले?

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फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने कहा, "इस फ़ैसले में सबसे बड़ा गैप ये है कि इस मामले में मुख्य आरोप 153ए और 153बी के तहत थे, जो जाति और धर्म के आधार पर नफ़रत भड़काना है. जिस तरह के भाषण दिए गए, उन्हें 153ए और 153बी के अंतर्गत लाया गया था. आप किसी की मंशा का अंदाज़ा कैसे लगा सकते हैं, ये तो भाषण से पता चलता है. आपराधिक साज़िश खुले में नहीं की जाती, बल्कि वो गुप्त रूप में होती हैं. सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों में ये कहा गया है कि आपराधिक साज़िश के मामलों में परिस्थिजन्य सबूतों को लेना चाहिए. कल्याण सिंह, आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी के बयानों को देखिए. साज़िश के लिए हमें परिस्थिजन्य सबूतों की ज़रूरत होती है और वो थी. जिस तरह के हथियार वहाँ मौजूद थे, वो साज़िश दिखाती है. लोगों को दोषी साबित करने के लिए सभी सबूत थे. ये बहुत निराशाजनक है कि इस तरह के अपराध में सभी को बरी कर दिया जाता है. ये तो 'किसी ने जेसिका को नहीं मारा' जैसा ही हो गया- किसी ने बाबरी मस्जिद नहीं गिराई."

लेकिन भारतीय जनता पार्टी को इसमें कोई समस्या नहीं दिखती. पार्टी के प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि ये लोग किसी भी साज़िश में शामिल नहीं थे और न ही वहाँ जो कुछ हुआ वो पूर्व नियोजित नहीं था. उन्होंने कहा कि कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया है कि वो लोग वहाँ नफ़तर फैलाने नहीं गए थे. कोर्ट ने तो ये कहा है कि वे उन्होंने शांति क़ायम करने की कोशिश की.

अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि 28 वर्षों से ये मामला चल रहा है, कई बार गवाहों के बयान लिए गए.

उन्होंने कहा, "सीबीआई को तो पहले भी क्लोज़र रिपोर्ट दे चुकी थी. क़ानूनी रूप से सीबीआई चाहे तो इसे चुनौती दे सकती है. लेकिन सीबीआई के अधिकारियों को अपनी एनर्जी सही काम में लगानी चाहिए, उन्हें दोबारा अपनी एनर्जी इस केस में नहीं लगानी चाहिए. उनके पास हज़ारों केस पड़े हैं, मुझे लगता है कि उन्हें अपनी एनर्जी उसमें लगानी चाहिए."

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CBI अदालत में गई तो भाजपा क्या करेगी?

850 गवाहों के बयान, फिर भी कुछ साबित नहीं हुआ

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत में कुल 850 गवाहों के बयान दर्ज हुए थे.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी का कहना है कि अदालत ने फ़ैसला सुनाने से पहले न तो 6 दिसंबर 1992 की घटना से संबंधित अख़बारों और पत्रिकाओं में छपी रिपोर्टों का ही संज्ञान में लिया, न तस्वीरों को और न ही वीडियो का, जबकि ये सब कुछ अब 'पब्लिक डोमेन' यानी सार्वजनिक है.

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सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर मुसलमान पक्ष के वकील नाखुश

लेकिन बीजेपी प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि फोटो और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की फुटेज देखी गई और विदेशों से बुलाकर भी लोगों की गवाहियाँ ली गई, अब इस मामले में कुछ बचा नहीं है.

लेकिन जिलानी कहते हैं, "वो वीडियो इंटरनेट पर अब भी मौजूद हैं, जिनमें भारतीय जाता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद् और दूसरे हिंदू संगठन के नेता कारसेवकों को मस्जिद तोड़ने के लिए उकसाते हुए साफ़ दिख रहे हैं. उसमें कुछ नेताओं को माइक से घोषणा करते हुए साफ़ देखा जा सकता है जिनमें वो कह रहे हैं-एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो."

जिलानी ने इसपर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि सार्वजनिक तौर पर मौजूद सबूतों को कोई अदालत कैसे अनदेखा कर सकती है?

उनका तर्क है कि जिनकी गवाही अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज हैं, वो उस वक़्त अयोध्या में तैनात वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं. इसके अलावा जो उस वक़्त ये पूरा माजरा रिपोर्ट कर रहे थे वो पत्रकार भी गवाह हैं.

वो कहते हैं, "इन गवाहों ने जो बयान दिए, उन पर अदालत ने भरोसा नहीं किया. फ़ैसला बताता है कि अदालत ने गवाहों की बात को तरजीह नहीं दी. तो क्या ये सभी गवाह झूठ बोल रहे थे? अगर ऐसा है तो फिर अदालत न इन सब पर क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की?"

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, "बीजेपी और शिवसेना के नेताओं के उस व़क्त के भाषण उपलब्ध हैं. तब जो धर्म संसद आयोजित हो रही थीं, उनमें दिए नारे देखे जा सकते हैं. जो कार सेवक उस दिन आए थे, वो कुल्हाड़ी, फावड़ों और रस्सियों से लैस थे. इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि ये षड्यंत्र था."

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'भड़काऊ नारे, हथियारों से लैस कारसेवक'

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा कहते हैं कि इतने बड़े अपराध के लिए किसी को दोषी न पाया जाना देश की क़ानून व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है.

उन्होंने कहा, "इससे यही लगता है कि सीबीआई अपना काम ठीक से नहीं कर पाई क्योंकि इतने ऑडियो, वीडियो साक्ष्य और 350 से ज़्यादा प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के बावजूद ठोस सबूत ना मिल पाने की बात समझ नहीं आती."

प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा के मुताबिक़ जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष का अलग-अलग और स्वायत्त होना ज़रूरी है. वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय ने 6 दिसंबर 1992 की घटना और उस दौरान पैदा हुए माहौल पर किताब भी लिखी है.

बीबीसी के साथ एक ख़ास बातचीत में उनका कहना था कि वर्ष 1989 में ही विश्व हिंदू परिषद ने अदालत के समक्ष स्पष्ट कर दिया था कि वो वहाँ मौजूद मस्जिद के ढांचे को तोड़कर मंदिर का निर्माण करना चाहता है. विश्व हिंदू परिषद का इरादा साफ़ था.

मुखोपाध्याय कहते हैं कि ये सिर्फ़ एक दिन की बात या सिर्फ़ एक घटना नहीं थी जो अचानक 6 दिसंबर 1992 को घटित हुई.

वो कहते हैं, "इसकी तैयारी काफ़ी लंबे समय से चल रही थी और ये पूरी तरह से नियोजित थी. इसके सत्यापन के लिए बहुत सारे सबूत अख़बारों की करतनों और पत्रिकाओं की रिपोर्टों में मौजूद हैं. सब कुछ 'डॉक्यूमेंटेड' है और सार्वजनिक भी है. इतने बरसों तक जो हिंदू संगठनों ने अभियान चलाया था उसका असली मक़सद ही था कि बाबरी मस्जिद के मौजूदा ढाँचे को तोड़कर वहाँ मंदिर बनाया जाए."

उनका कहना था कि लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा का भी यही मक़सद था.

लेकिन बीजेपी प्रवक्ता ज़फर इस्लाम के मुताबिक अदालत में सबूतों के आधार पर ही सच सामने आया और इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव की सरकार के दौरान बीजेपी नेताओं को फँसाने के लिए विध्वंस के बारे में एक भ्रम पैदा किया था.

'अचानक नहीं टूटी बाबरी'

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सीबीआई की विशेष अदालत ने अपने फ़ैसले में साफ़ किया कि जो आरोपपत्र अभियोजन पक्ष की तरफ़ से दायर किया गया उसमें कहीं से भी ये बात साबित नहीं होती है कि नामज़द अभियुक्तों ने लोगों को उकसाया या दंगे जैसे हालात पैदा किए.

विशेष अदालत ने ये भी पाया कि 6 दिसंबर 1992 को दोपहर में कारसेवक अचानक बेकाबू हो गए और वो नाकेबंदी तो तोड़ते हुए बाबरी मस्जिद पर चढ़ गए थे, जबकि विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल उन्हें ऐसा करने से मना कर रहे थे.

अदालत का ये भी मानना है कि कारसेवकों के बीच कुछ आपराधिक तत्व थे जिन्होंने इस कार्य को अंज़ाम दिया क्योंकि अगर वो राम भक्त होते तो अशोक सिंघल की बात सुनते जो बार-बार कह रहे थे कि उस विवादित जगह पर मूर्तियाँ भी हैं.

वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "क़ानून में षड्यंत्र एक ऐसी चीज़ होती है जिसे साबित करना आसान नहीं होता है. इसमें सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि यह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर होता है. वहाँ अंजू गुप्ता जो आईपीएस हैं, उनकी और कई अन्य लोगों की गवाही थी जिनकी सत्यनिष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है.''

''दूसरा, अगर कहीं भीड़ इकट्ठी होती है और कोई ग़ैर-क़ानूनी काम करती है तो आईपीसी के सेक्शन 149 के मुताबिक़, भीड़ के लोग एक-दूसरे के कार्यों के लिए ज़िम्मेदार होते हैं. यह तो स्थापित तथ्य है कि बाबरी मस्जिद थी और गिराई गई. ऐसे में क़ानून के हिसाब से उन लोगों की ज़िम्मेदारी बनती है."

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COVER STORY: बाबरी विध्वंस की कहानी

बीबीसी के साथ एक ख़ास बातचीत में उनका कहना था कि वर्ष 1989 में ही विश्व हिंदू परिषद ने अदालत के समक्ष स्पष्ट कर दिया था कि वो वहाँ मौजूद मस्जिद के ढांचे को तोड़कर मंदिर का निर्माण करना चाहता है. विश्व हिंदू परिषद का इरादा साफ़ था.

मुखोपाध्याय कहते हैं कि ये सिर्फ़ एक दिन की बात या सिर्फ़ एक घटना नहीं थी जो अचानक 6 दिसंबर 1992 को घटित हुई.

वो कहते हैं, "इसकी तैयारी काफी लंबे समय से चल रही थी और ये पूरी तरह से नियोजित थी. इसके सत्यापन के लिए बहुत सारे सुबूत अख़बारों की करतनों और पत्रिकाओं की रिपोर्टों में मौजूद हैं. सब कुछ 'डॉक्युमेंटेड' है और सार्वजनिक भी है. इतने बरसों तक जो हिंदू संगठनों ने अभियान चलाया था उसका असली मक़सद ही था कि बाबरी मस्जिद के मौजूदा ढाँचे को तोड़कर वहाँ मंदिर बनाया जाए."

उनका कहना था कि लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा का भी यही मकसद था.

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सभी अभियुक्त कैसे बरी हो गए?

सीबीआई की विशेष अदालत ने अपने फ़ैसले में साफ़ किया कि जो आरोपपत्र अभियोजन पक्ष की तरफ़ से दायर किया गया उसमें कहीं से भी ये बात साबित नहीं होती है कि नामज़द अभियुक्तों ने लोगों को उकसाया या दंगे जैसे हालात पैदा किए.

विशेष अदालत ने ये भी पाया कि 6 दिसंबर 1992 को दोपहर में कारसेवक अचानक बेकाबू हो गए और वो नाकेबंदी तो तोड़ते हुए बाबरी मस्जिद पर चढ़ गए थे, जबकि विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल उन्हें ऐसा करने से मना कर रहे थे.

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बाबरी मस्जिद विध्वंस केस: राम जन्मभूमि आंदोलन में महिलाएं

अदालत का ये भी मानना है कि कारसेवकों के बीच कुछ आपराधिक तत्व थे जिन्होंने इस कार्य को अंज़ाम दिया क्योंकि अगर वो राम भक्त होते तो अशोक सिंघल की बात सुनते जो बार-बार कह रहे थे कि उस विवादित जगह पर मूर्तियाँ भी हैं.

वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "क़ानून में षड्यंत्र एक ऐसी चीज़ होती है जिसे साबित करना आसान नहीं होता है. इसमें सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि यह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर होता है. वहाँ अंजू गुप्ता जो आईपीएस हैं, उनकी और कई अन्य लोगों की गवाही थी जिनकी सत्यनिष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है.''

''दूसरा, अगर कहीं भीड़ इकट्ठी होती है और कोई ग़ैर-क़ानूनी काम करती है तो आईपीसी के सेक्शन 149 के मुताबिक़, भीड़ के लोग एक-दूसरे के कार्यों के लिए ज़िम्मेदार होते हैं. यह तो स्थापित तथ्य है कि बाबरी मस्जिद थी और गिराई गई. ऐसे में क़ानून के हिसाब से उन लोगों की ज़िम्मेदारी बनती है."

विरोधाभास

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने सेवा निवृत जस्टिस एमएस लिब्राहन के नेतृत्व में एक जांच आयोग का गठन किया था जिसने 17 वर्षों के बाद साल 2009 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी.

आयोग ने कुल 100 गवाहों के बयान दर्ज किए और अपनी रिपोर्ट में लाल कृष्णआडवाणी, कलराज मिश्रा, मुरली मनोहर जोशी सहित 68 लोगों की दंगा फैलाने और बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने में अहम भूमिका की बात कही.

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बाबरी विध्वंस फ़ैसले पर जस्टिस लिब्राहन क्या बोले?

जस्टिस एमएस लिब्राहन ने बीबीसी संवाददाता अरविंद छाबड़ा से कहा कि आयोग की जांच में आपराधिक षड्यंत्र और बाबरी मस्जिद के ढांचे को तोड़े जाने में जिन लोगों की अहम भूमिका थी उनके ख़िलाफ़ सुबूत भी रखे गए थे.

जस्टिस लिब्राहन कहना है कि आयोग की रिपोर्ट और सीबीआई की विशेष अदालत के फैसले में भी काफ़ी विरोधाभास है.

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