बिहार चुनाव: सीट बँटवारे को लेकर एनडीए और महागठबंधन में जारी घमासान

  • नीरज प्रियदर्शी
  • पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और अमित शाह

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बिहार विधानसभा चुनाव 2020 की अधिसूचना जारी हो चुकी है. पहले चरण में 28 अक्तूबर को 71 विधानसभा सीटों के लिए होने वाली नामांकन की प्रकिया भी गुरुवार से शुरू हो गई है.

मतदान में इतना कम समय बचा है, बावजूद इसके अभी तक राज्य के प्रमुख गठबंधनों में सीटों का बँटवारा नहीं हो सका.

एक तरफ़ सत्ताधारी गठबंधन एनडीए में लोजपा की सीटों को लेकर समस्या चल रही है, तो वहीं दूसरी तरफ़ विपक्षी महागठबंधन की दोनों प्रमुख पार्टियाँ राजद और कांग्रेस आपस में अधिक से अधिक सीटों के लिए अड़े दिख रहे हैं.

सीटों के बँटवारे में अभी तक सहमति नहीं बन पाने का ही कारण है कि राज्य में एक सप्ताह पहले तक जहाँ सिर्फ़ दो गठबंधन हुआ करते थे, अब वो बिखरकर पाँच हो चुके हैं. जिन पार्टियों को गठबंधन में मन मुताबिक़ हिस्सेदारी नहीं मिल रही, वे टूटकर कुछ नई और छोटी पार्टियों को साथ लेकर अपना नया गठबंधन बना ले रहे हैं.

चाहे वह उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) का बसपा के साथ गठबंधन हो या फिर पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी का चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद समाज पार्टी के साथ गठबंधन, या फिर असदउद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम का पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र प्रसाद यादव की पार्टी समाजवादी जनता दल के साथ गठबंधन.

बिखराव ज़्यादा

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ये सभी नए गठबंधन राज्य की बड़ी पार्टियों वाले गठबंधनों में सीट बँटवारे पर चल रही खींचतान का नतीजा तो है ही, लेकिन इसमें भी ग़ौर करने वाली बात ये है कि अभी तक जितने भी नए गठबंधन बने हैं, वे विपक्षी पार्टियों वाले ही हैं.

सत्ताधारी एनडीए सरकार को हराने के लिए लड़ रहीं इन पार्टियों में टकराव और बिखराव का सबसे ताज़ा उदाहरण है भाकपा माले का महागठबंधन से अलग होकर पहले चरण के लिए अपने 30 सीटों की सूची जारी करना. जबकि पार्टी ने पहले ये ऐलान कर रखा था कि वे महागठबंधन के अंदर रहकर चुनाव लड़ेंगे.

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बुधवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह सूची जारी करते हुए भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल ने कहा, "एनडीए के ख़िलाफ़ विपक्ष की कारगर एकता न होना दुखद होगा. राजद की ओर से हमारे लिए जो सीटें प्रस्तावित की गईं हैं, उनमें वे सीटें नहीं हैं, जहाँ हमलोगों ने बहुत काम किया है. जैसे पटना, औरंगाबाद, जहानाबाद, गया, बक्सर, नालंदा आदि ज़िलों की एक भी सीट शामिल नहीं है. इसलिए हमने अपनी सीटों की सूची जारी कर दी है. क्योंकि, बिहार चुनाव के पहले चरण के नामांकन का दौर शुरू ही होनेवाला है."

इसके पहले पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी हम (हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा) और उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा भी महागठबंधन से अलग होने की घोषणा कर चुके हैं.

जीतनराम मांझी तो पहले ही नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के साथ दोबारा हाथ मिला चुके हैं, वहीं उपेंद्र कुशवाहा को भी नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का नेतृत्व पसंद नहीं आया, बाद में उन्होंने एनडीए में शामिल होने की कोशिशें कीं, लेकिन वहाँ भी बात नहीं बन पाई और आख़िरकार मायावती की बसपा के साथ गठबंधन कर लिया.

राजद और कांग्रेस का अड़ियल रुख़

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ऐसा नहीं है कि विपक्षी महागठबंधन से केवल छोटी पार्टियों का टकराव ही सामने आया है, बल्कि इसके दो प्रमुख घटक दल राजद और कांग्रेस के बीच अब भी सीटों को लेकर खींचतान जारी है.

एक ओर कांग्रेस का दावा है कि पिछले विधानसभा चुनाव के उनके प्रदर्शन और छोटी पार्टियों के गठबंधन से अलग हो जाने के आधार पर उन्हें ज़्यादा सीटें मिलनी चाहिए, वहीं राजद का कहना है कि कांग्रेस ज़रूरत से ज़्यादा दबाव बनाने की कोशिश कर रही है.

स्थानीय मीडिया में चल रही ख़बरों के मुताबिक़ कांग्रेस पार्टी अपने लिए कम से कम 75 सीटें माँग रही है, जबकि राजद 60 सीट देने के लिए ही तैयार है.

पिछले विधानसभा चुनाव में जब राजद का जदयू के साथ बीजेपी को हराने के लिए गठबंधन हुआ था, तब कांग्रेस को 40 सीटें मिली थीं, जिनमें 27 पर उसके उम्मीदवार जीते थे. 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार के अंदर विपक्षी महागठबंधन को केवल एक लोकसभा सीट पर विजय मिली थी और वो भी कांग्रेस के ही खाते की थी.

लेकिन, ऐसा लगता है कि सीटों को लेकर कांग्रेस की तरफ़ से दिया जा रहा यह तर्क राजद को स्वीकार नहीं है.

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राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने बुधवार को पार्टी कार्यालय में एक सभा के दौरान कांग्रेस की सीटों की माँग पर इशारों-इशारों में कहा, "चुनाव लड़ने के लिए राजद पूरी तरह तैयार है. जिसको साथ रहकर लड़ना है, वो लड़ेगा. उसका सम्मान है. ऐसे दल जो हमें चुनौती देकर हिस्सेदारी चाहते हैं, वे ग़लतफ़हमी में हैं, क्योंकि हमारा गठबंधन सिर्फ़ जनता से है. कुछ दल केवल सियासत के लिए ग़ैर-तार्किक आधार पर सीटों का बँटवारा चाहते हैं."

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा के मुताबिक़, "सीट बँटवारे पर आख़िरी फ़ैसला हमारे केंद्रीय शीर्ष नेतृत्व को लेना है. हम तार्किक आधार पर अपने लिए सीटें माँग रहे हैं. अगर पिछले विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव के परिणाम देखें, तो हमारा प्रदर्शन अन्य पार्टियों से बेहतर रहा है. लेकिन, हम आपको आश्वस्त करना चाहते हैं कि दोनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत के ज़रिए सीटों के बँटवारे का मसला जल्द सुलझा लिया जाएगा. गठबंधन के टूटने का कोई सवाल नहीं है."

लोजपा ने बढ़ाई एनडीए की मुश्किलें

यह तथ्य भले सही हो कि अभी तक की चुनावी सरगर्मियों में दलों और नेताओं के पाला बदलने से विपक्षी महागठबंधन को नुक़सान अधिक हुआ है, लेकिन सत्ताधारी एनडीए गठबंधन के लिए अकेले लोक जनशक्ति पार्टी ने ही मुश्किलें बढ़ा दी है.

लोजपा अध्यक्ष चिराग़ पासवान पिछले कई दिनों से नीतीश कुमार और जदयू को लेकर हमलावर हैं. सार्वजनिक मंचों से भी उन्होंने कई बार सरकार की आलोचना की है. दोनों के बीच तल्ख़ियाँ इतनी बढ़ गई हैं कि पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक में यह प्रस्ताव पास किया जा चुका है कि वे उन सभी 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे, जिन पर जदयू या जीतनराम मांझी की पार्टी हम के उम्मीदवार खड़े होंगे.

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "चिराग़ पासवान ख़ुद को यहाँ एक विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, यही कारण है कि वे केवल नीतीश कुमार को टारगेट कर रहे हैं. बीजेपी के साथ उनकी कोई असहमति नहीं दिखती. कल को अगर चुनाव परिणामों में बीजेपी की सीटें जदयू से अधिक हो गईं तो चिराग़ पासवान एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं."

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स्थानीय मीडिया में चल रही ख़बरों के मुताबिक़ एनडीए की तरफ़ से लोजपा को 27 सीटों पर लड़ने का ऑफ़र दिया गया है, लेकिन उसे यह स्वीकार नहीं है.

लोजपा पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन के अंदर 42 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, हालांकि उसे जीत सिर्फ़ दो सीटों पर ही मिल पाई थी. लेकिन पार्टी के नेताओं का मानना है कि इस बार कम से कम पिछली बार जितनी सीटें तो मिलनी ही चाहिए.

चिराग़ पासवान ने बुधवार को दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और अमित शाह से भी मुलाक़ात की थी, लेकिन शायद उस मुलाक़ात में कोई बात बन नहीं पाई.

चिराग़ ने इसके बाद मीडिया से बात करते हुए कहा, "हमारी पार्टी को कोई दबाने, छोटा करने और अस्तित्व मिटाने की अगर सोचेगा, तो यह संभव नहीं है. पार्टी हमारी माँ है. उसे आगे बढ़ाना है."

बीजेपी और जदयू के प्रदेश प्रवक्ता लोजपा के रुख़ पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं दिखते. दोनों का एक ही जवाब है, "हमारे शीर्ष नेता ही सीट शेयरिंग पर कोई फ़ैसला ले पाएँगे, इस मुद्दे पर बात करने के लिए हम अधिकृत नहीं हैं."

सबकी निगाहें इस समय चिराग़ पासवान के फ़ैसले पर टिकी हैं, क्योंकि अगर वे एनडीए से अलग होने का फ़ैसला करते हैं, तो राज्य में एक नया राजनीतिक समीकरण बन सकता है. कांग्रेस, राजद, जाप, रालोसपा के नेता पहले ही चिराग़ को ऑफ़र दे चुके हैं.

क्या एनडीए भी टूटेगा?

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जिस तरह लोजपा और जदयू के बीच नोक-झोंक चल रही है और लोजपा बार-बार 143 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की बात कह रही है, क्या उससे एनडीए गठबंधन पर कोई प्रभाव पड़ेगा?

पटना के वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा कहते हैं, "इसकी संभावनाएँ कम हैं, क्योंकि लोजपा के पास और कोई विकल्प नहीं बचता दिख रहा है. राम विलास पासवान का मौसम विज्ञान अब पहले की तरह नहीं रहा. वैसे भी लोजपा और बीजेपी का कोई टकराव नहीं है. जहाँ तक बात लोजपा और जदयू के टकराव की है, तो यह केवल और केवल अधिक से अधिक सीटें पाने के लिए किया जा रहा है."

लव कुमार मिश्रा के मुताबिक़ ये तय है कि लोजपा बीजेपी का साथ नहीं छोड़ने वाली. हाँ, अगर जदयू साथ छोड़ दे, तो कुछ कहा नहीं जा सकता.

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर को भी लगता है कि एनडीए में टूट की कोई संभावना नहीं नज़र आ रही.

वे कहते हैं, "चाहे विपक्ष के लोग हों या पक्ष के, चुनाव के समय सबकी चाहत रहती है कि उसकी हिस्सेदारी ज़्यादा से ज़्यादा हो. विपक्षी महागठबंधन में बातचीत का अभाव था, इसलिए लोग अलग होते चले गए, लेकिन संगठन के तौर पर देखें, तो एनडीए में वैसा नहीं है. भले ही लोजपा और जदयू के बीच तकरार चल रही है, लेकिन बीजेपी का इक़रार बना हुआ है. जो यह समझने के लिए काफ़ी है कि एनडीए में क्या होने वाला है."

बहरहाल, बिहार में मुख्यमंत्री पद के कथित रूप से छह दावेदार हो चुके हैं. पाँच गठबंधनों से पाँच चेहरे तो हैं ही, उनके अलावा इस बार मैदान में पुष्पम प्रिया चौधरी भी हैं, जो लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स से पढ़कर आई हैं, उन्होंने प्लूरल्स नाम की पार्टी बनाई है और आने के साथ ही प्रदेश से छपने वाले लगभग सारे अख़बारों के पहले पन्ने पर पूरे पन्ने का विज्ञापन देकर चर्चा में आ गईं.

पुष्पम प्रिया ने सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की योजना बनाई है और स्वयं दो जगहों से चुनाव लड़ने की उन्होंने घोषणा भी कर दी है.

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