आर्मीनिया-अज़रबैजान संघर्ष में भारत किसके साथ?

  • अपूर्व कृष्ण
  • बीबीसी संवाददाता
नागोर्नो काराबाख

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मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना हिंदी हैं हम, हिंदी हैं हम, हिंदी हैं हम, वतन है - हिंदोस्तां हमारा.

अज़रबैजान के मशहूर और मक़बूल गायक रशीद बेहबुदोव जब ये पंक्तियाँ गाते थे, तो सुनने वाले हर हिंदुस्तानी का सीना अपने देश के गौरवशाली अतीत और सोवियत संघ के साथ भारत की दोस्ती को याद कर फ़ख़्र से चौड़ा हो जाया करता था. ये भारत की आज़ादी के कुछ साल बाद की बात है.

रशीद सोवियत संघ के एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति के गायक थे. 1952 में वो भारत आए और तब उनकी दोस्ती राज कपूर से हुई, जिनकी एक साल पहले रिलीज़ हुई फ़िल्म आवारा सोवियत संघ में ग़ज़ब का धूम मचा रही थी.

राज कपूर 1956 में अपने दोस्त के देश गए, अज़रबैजान की राजधानी बाकू में ज़बरदस्त स्वागत हुआ, वो इतनी बड़ी बात थी कि वहाँ राज कपूर की यात्रा पर एक छोटी-सी डॉक्यूमेंट्री बन गई.

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रशीद बेहबुदोव

यही कुछ हाल आर्मीनिया का भी था, वहाँ पहुँचने वाले किसी भी हिंदुस्तानी को अगर किसी आर्मीनियाई से बात करनी हो, और दोनों को एक-दूसरे की ज़बान ना भी आती हो, तो भी बातचीत का सिलसिला इन शब्दों से शुरू हो ही जाता था - आवारा...राज कपूर… - और चेहरों पर मुस्कान आ जाती थी, पराए देश का वासी होने की झिझक दूर हो जाती थी.

वैसे ही आर्मीनिया के लोग अंग्रेज़ों के ज़माने से काफ़ी पहले से ही व्यापार और रोज़गार के सिलसिले में भारत आते रहे थे, मुग़ल बादशाह अकबर ने आर्मीनियाई लोगों को आगरा में बसाया था.

आर्मीनिया के लोग सूरत, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई और बंगाल के कई शहरों में फैले. आज भी कोलकाता में बहुत सारे आर्मीनियाई लोग रहते हैं. कोलकाता, चेन्नई के अलावा कुछ और भी शहरों में अब भी आर्मीनियाई चर्चों में प्रार्थनाएँ होती हैं.

तो चाहे आर्मीनिया हो या अज़रबैजान - दोनों भारत के क़रीब रहे हैं. लेकिन ये पुरानी बातें हैं. राज कपूर, टैगोर जब बाकू गए थे, तो ना अज़रबैजान स्वतंत्र देश था, ना आर्मीनिया. दोनों सोवियत संघ के गणराज्य थे.

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1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद 15 नए देश बने. इनमें आर्मीनिया भी था, अज़रबैजान भी. भारत ने जल्द ही दोनों की आज़ादी को मान्यता दे दी. सोवियत संघ का जो रुतबा था, उसका उत्तराधिकारी रूस बना.

अब जब नागोर्नो काराबाख के विवाद को लेकर आर्मीनिया और अज़रबैजान एक-दूसरे पर बम बरसाने पर तुले हैं, तो ये जानना दिलचस्प हो जाता है कि इस मुद्दे पर भारत किसका साथ देगा.

भारत सरकार और रूस से संबंध

भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने नागोर्नो काराबाख में लड़ाई छिड़ने के पाँच दिन बाद एक बयान जारी किया था, जिसमें कहा गया कि भारत क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा को ख़तरे में डालने वाली इस घटना को लेकर चिंतित है, वो सभी पक्षों से तत्काल लड़ाई बंद करने, संयम बरतने और सीमा पर शांति बनाए रखने की अपील दोहराता है, और भारत मानता है कि इस संघर्ष का दूरगामी समाधान शांति के साथ कूटनीतिक वार्ताओं से ही निकल सकता है.

ये एक सधा, संतुलित और सपाट बयान है, इससे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता कि भारत किसे सही और किसे ग़लत मानता है.

और जानकार बताते हैं कि इसमें हैरान होने वाली कोई बात नहीं, और इसकी मुख्य वजह एक तीसरा देश है - रूस. पुराने सोवियत संघ से स्वतंत्र हुए देशों में किसी तीसरे देश की दिलचस्पी या दख़लंदाज़ी से रूस की भवें तन जाती हैं.

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व्लादिमीर पुतिन

आर्मीनिया में भारत के पूर्व राजदूत अचल मल्होत्रा कहते हैं कि रूस साउथ काकेशस क्षेत्र को लेकर काफ़ी संवेदनशील रहता है, वो नहीं चाहता कि बाहर का कोई भी प्रभाव वहाँ आए, वो चाहे तुर्की हो, ईरान हो, यूरोपीय संघ हो, अमरीका हो.

अचल मल्होत्रा कहते हैं, "भारत मानकर चलता है कि साउथ काकेशस रूस का एक बैकयार्ड है (घर से सटा या पास का इलाक़ा), तो भारत इस बात का ध्यान रखकर ही कोई बयान देता है."

दिल्ली की जेएनयू यूनिवर्सिटी में रूसी अध्ययन संस्थान में प्रोफ़ेसर राजन कुमार भी कहते हैं कि 'उस पूरे यूरेशियाई क्षेत्र में भारत की नीति बिल्कुल स्पष्ट है, वो चुप रह जाएगा, तटस्थ बयान देगा, लेकिन रूस के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलेगा'.

इसकी वजह बताते हुए प्रोफ़ेसर राजन कहते हैं, "भारत जानता है कि चीन और पाकिस्तान के साथ संघर्ष के मामले में रूस का साथ ज़रूरी है, जो उसे सैन्य और कूटनीतिक सहयोग देता है. तो भारत की नीति बिल्कुल स्पष्ट होती है कि वो रूस का समर्थन करेगा क्योंकि रूस भी भारत को कश्मीर के मुद्दे पर सीधा समर्थन करता है."

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आर्मीनिया या अज़रबैजान - कौन क़रीब?

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31 अक्तूबर 2003 को आर्मीनिया के राष्ट्रपति रॉबर्ट कोचारियन का स्वागत करते प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम

आर्मीनिया-अज़रबैजान संघर्ष में भले ही भारत सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया संतुलित दिखे, कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि दोनों देशों में आर्मीनिया भारत के ज़्यादा निकट है.

पूर्व राजदूत अचल मल्होत्रा कहते हैं, "जब से आर्मीनिया बना है, वहाँ के तीन राष्ट्रपति भारत आ चुके हैं, और हमारे दो उपराष्ट्रपति आर्मीनिया जा चुके हैं, और अज़रबैजान से आज तक किसी भी राष्ट्राध्यक्ष ने भारत का दौरा नहीं किया है, ना भारत से कोई वहाँ गया है."

वो ये भी बताते हैं कि आर्मीनिया कश्मीर के मुद्दे पर भारत को बिना शर्त समर्थन देता है और भारत ने जब परमाणु परीक्षण किए थे, तब भी उसने भारत की आलोचना नहीं की थी.

प्रोफ़ेसर राजन कुमार भी कहते हैं कि भारत राजनीतिक रूप ही नहीं सांस्कृतिक रूप से भी आर्मीनिया के क़रीब है, क्योंकि अज़रबैजान ख़ुद को इस्लामिक देशों के साथ जोड़ने की कोशिश करता दिखता है.

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वो कहते हैं, "तुर्की खुलकर कश्मीर मामले पर पाकिस्तान का समर्थन करता है, और पाकिस्तान भी ख़ुलकर अज़रबैजान का समर्थन करता है, इसलिए भारत के लिए ये बहुत ही आसान हो जाता है कि वो आर्मीनिया को क़रीब माने, क्योंकि भारत ये जताना चाहेगा कि जैसे तुर्की पाकिस्तान का समर्थन करता है, वैसे ही भारत भी ऐसे देश का साथ देगा जो तुर्की का क़रीबी नहीं है."

हालाँकि जानकार कहते हैं कि भारत आधिकारिक तौर पर खुलकर किसी भी देश के आंतरिक मामले में मदद नहीं कर सकता.

अचल मल्होत्रा साथ ही ये भी कहते हैं कि भारत के लिए आर्थिक हितों की दृष्टि से अज़रबैजान ज़्यादा क़रीब है.

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आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच लड़ाई की वजह क्या है?

अज़रबैजान एक तेल संपन्न देश है, जहाँ ओएनजीसी ने भी निवेश किया हुआ है. साथ ही वहाँ भारत की फ़ार्मास्युटिकल कंपनियों ने भी कारखाने लगाए हुए हैं.

इनके अलावा इंटरनेशनल नॉर्थ- साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) परियोजना से भी भारत और अज़रबैजान के आर्थिक हित जुड़े हैं.

इसके तहत एशिया और यूरोप के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के लिए 7200 किलोमीटर लंबा एक रेल, सड़क और जल मार्ग तैयार किया जा रहा है.

मुंबई को रूस से जोड़नेवाला ये कॉरिडोर अज़रबैजान होते हुए गुज़रेगा.

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