हाथरस के रास्ते में ही गिरफ़्तार होने वाले केरल के पत्रकार ने खटखटाया SC का दरवाज़ा

  • सलमान रावी
  • बीबीसी संवाददाता
केरल

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मलयालम समाचार एजेंसी अज़िमुख्म के पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन की गिरफ़्तारी को लेकर 'केरल यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स' ने सुप्रीम कोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की है. याचिका में उनके गिरफ़्तारी को 'ग़ैर क़ानूनी' बताते हुए कप्पन को फ़ौरन सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करने की गुहार लगाई गयी है.

सिद्दीक़ कप्पन को मथुरा पुलिस ने गिरफ़्तार किया है.

याचिका दायर करने वाले वकील विलिस मैथ्यू ने बीबीसी से बात करते हुए कहा है कि उनकी याचिका पर अदालत में शुक्रवार को सुनवाई होगी. उन्होंने अपनी याचिका में लिखा है कि स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र की सांस है और पुलिस का कप्पन को इस तरह गिरफ़्तार करना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.

दरअसल, कप्पन को पाँच अक्टूबर को मथुरा के टोल प्लाज़ा के पास गिरफ़्तार किया गया जब वो तीन अन्य लोगों के साथ उत्तर प्रदेश के हाथरस में उस गाँव की तरफ़ जा रहे थे जहां एक 19 वर्षीय दलित लड़की से कथित रूप से गैंगरेप किया गया था और जिसकी बाद में अस्पताल में मौत हो गई थी.

पीएफ़आई से है कनेक्शन- मथुरा पुलिस

मथुरा के एसपी गौरव ग्रोवर ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि कप्पन के साथ जिन तीन अन्य लोगों की गिरफ़्तारी हुई है, उनके संबंध कट्टरपंथी संगठन 'पापुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया' यानी 'पीएफ़आई' और उसकी छात्र इकाई कैंपस फ्रंट ऑफ़ इंडिया से है.

गिरफ़्तार किए गए लोगों की पहचान अतीक़-उर रहमान, मसूद अहमद और आलम के रूप में की गयी है जो 'पीएफ़आई' के सक्रिय सदस्य बताये जाते हैं. पुलिस का कहना है कि रहमान मुज़फ़्फ़रनगर के रहने वाले हैं जबकि मसूद बहराईच और आलम रामपुर के रहने वाले हैं.

कहा जा रहा है कि आलम उस गाड़ी के ड्राईवर हैं जिस गाड़ी से सभी को मथुरा टोल प्लाज़ा के पास से गिरफ़्तार किया गया.

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मथुरा के वरिष्ठ एसएसपी कहते हैं कि अभी प्राथमिकी दर्ज हुई है और पुलिस ने जाँच शुरू कर दिया है, ऐसे में कोई जानकरी अभी नहीं दी जा सकती.

वैसे जो प्राथमिकी मथुरा के पुलिस स्टेशन में दर्ज की गयी है उसमे कहा गया है कि चारों को 'षड्यंत्र रचने' के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.

इन पर 'ग़ैर-क़ूनूनी गतिविधियां (रोकथाम) संशोधन अधिनियम (यूएपीए) की धारा 17 और 14 (आतंकी गतिविधियों के लिए धन जुटाने), भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए (देशद्रोह) के अलावा 153-ए और धार्मिक भावनाओं को भड़काने के ख़िलाफ़ धारा 295-ए के साथ-साथ आईटी एक्ट की धाराएं भी लगाई गयी हैं.

पुलिस की एफ़आईआर कहती है कि गिरफ़्तार किये गए लोग हाथरस की घटना की आड़ में धन इकठ्ठा करने का काम कर रहे थे और उनके पास से पोस्टर और कई दस्तावेज़ बरामद किये गए हैं.

एफ़आईआर में कहा गया है कि सामजिक माहौल को बिगड़ने के लिए एक वेबसाइट भी बनायी गयी थी.

मथुरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक गौरव ग्रोवर कहते हैं कि गिरफ़्तार किये गए लोगों के बारे में अलग-अलग जाँच चल रही है. जो सामग्री और दस्तावेज़ उनके पास से बरामद किये गए हैं उनकी जाँच एक विशेष टीम कर रही है. ये लोग कौन हैं, इनका क्या काम है और इनकी किस तरह की गतिविधियाँ रहीं हैं? उसके बारे में पता लगाया जा रहा है.

'कप्पन के ज़रिए पत्रकारों को धमकाने की कोशिश'

कप्पन की गिरफ़्तारी को लेकर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और 'केरल यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स' की तरफ़ से अलग-अलग बयान जारी कर घटना की निंदा करते हुए उनकी फ़ौरन रिहाई की माँग की गयी है.

केरल यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की दिल्ली इकाई की अध्यक्ष मिजी जोज़े पी. ने बयान जारी कर कहा है कि कप्पन एक पत्रकार के नाते अपना काम कर रहे थे और इस लिए तथ्यों को जानने के लिए वो हाथरस जा रहे थे. उनका आरोप है कि कप्पन को गिरफ़्तार कर घटना की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को धमकाने की कोशिश की जा रही है.

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वहीं पीएफ़आई के महासचिव अनीस अहमद ने एक बयान जारी कर उत्तर प्रदेश की सरकार को चुनौती दी है कि वो उनके संगठन के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों के सुबूतों को सार्वजनिक करे.

वह कहते हैं, "आरोप लगाए गए हैं कि सौ करोड़ रूपए इकठ्ठा किये गए ताकि समाज में गड़बड़ी फैलाई जा सके. हम उत्तर प्रदेश की सरकार से माँग करते हैं कि वो सार्वजनिक तौर पर इस बात का ख़ुलासा करें कि किस बैंक से ये रक़म दी गयी या जमा की गयी."

उन्होंने स्वीकार किया कि कप्पन के अलावा गिरफ़्तार किये गए बाक़ी के तीन लोग उनके संगठन से हैं. वह ये भी कहते हैं कि उनका संगठन प्रतिबंधित नहीं है.

अनीस अहमद ने आरोप लगाते हुए कहा कि पहले भी जब नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहे थे, तब उत्तर प्रदेश की सरकार उनके संगठन को बदनाम करने की कोशिश कर चुकी है. दिल्ली पुलिस ने भी ऐसा ही किया.

अहमद कहते हैं कि हाथरस में जो हुआ वो एक जघन्य कांड है जिसका विरोध उनका संगठन करता रहेगा.

कप्पन सहित गिरफ़्तार किये गए सभी अभियुक्तों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.

मथुरा में कप्पन की वकील दीपा चतुर्वेदी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि वो कल तक का इंतज़ार कर रहीं हैं जब 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' की याचिका की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी.

वह कहती हैं, "सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद हम यूएपीए की अदालत में दूसरी याचिका दायर करेंगे."

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पापुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया क्या है?

अब ज़रा एक नज़र डालते हैं 'पापुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया' यानी 'पीएफ़आई' के ऊपर. ये संगठन अक्सर विवादों में घिरा रहता है. कई राज्य इसपर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं. उनका आरोप है कि पीएफ़आई की गतिविधियाँ प्रतिबंधित संगठन 'स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया' यानी 'सिमी' की तर्ज़ पर हैं.

मगर पीएफ़आई ख़ुद के सामाजिक संगठन होने का दावा करता है और कहता है कि उसका या उसके सदस्यों का सिमी के 'कोई लेना देना नहीं है'

22 नवंबर, 2006 को केरल के कोझीकोड में गठन के बाद से ही 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया' यानी 'पीएफ़आई' विवादों में घिरी रही है.

नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए को लेकर विरोध प्रदर्शनों के दौरान वो एक बार फिर विवादों में घिर गई. क्योंकि विरोध प्रदर्शन कई जगह हिंसक हो गए थे और पीएफ़आई पर 'सुनियोजित ढंग से हिंसा भड़काने' के आरोप लगे.

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उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने गृह मंत्रालय से पीएफ़आई पर प्रतिबंध लगाने की माँग की है जिसे पीएफ़आई ने ''तानाशाही वाला क़दम'' की संज्ञा दी है.

तीन संगठनों- 'कर्नाटक फ़ोरम फ़ॉर डिग्निटी' यानी 'केडीएफ़', तमिलनाडु के 'मनीथा नीथी पसाराई' और 'नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट' को मिलाकर इस नए संगठन को खड़ा किया गया. जिसकी शाखाएं भारत के अलग-अलग प्रांतों में भी मौजूद हैं.

बाद में कुछ और संगठन 'पीएफ़आई' में शामिल हुए, जिसमें गोवा की 'सिटिज़न्स फोरम', राजस्थान की 'कम्युनिटी सोशल एंड एजुकेशनल सोसाइटी', पश्चिम बंगाल की 'नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति', मणिपुर की 'लिलोंग सोशल फ़ोरम' और आंध्र प्रदेश की 'एसोसिएशन ऑफ़ सोशल जस्टिस' शामिल हैं.

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पीएफ़आई पर लगे आरोप

इस पर सबसे पहला आरोप वर्ष 2010 की 4 जुलाई की घटना को लेकर लगाया गया, जब केरल के तोडुपुज़ा के एक कॉलेज प्रोफ़ेसर टीजे थॉमस को उनके घर के पास रोका गया और उनके एक हाथ को कलाई से काट दिया गया.

प्रोफ़ेसर थॉमस ने अपने कॉलेज के प्रश्न पत्र में कुछ आपत्तिजनक सवालों का उल्लेख किया था, जिसे लेकर उन पर आपराधिक मामला दर्ज किया गया.

बाद में उनके साथ ऐसी घटना घटी. इस संबंध में जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया उनपर 'पीएफ़आई' के सदस्य होने के आरोप लगाए गए.

हालांकि संगठन ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार कर इसे एक साज़िश क़रार दिया.

उसी साल अगस्त महीने तक केरल पुलिस ने 'पीएफ़आई' के कई ठिकानों पर छापामारी की और कई आपत्तिजनक दस्तावेज़ और हथियारों के बरामद होने का दावा किया.

इसमें प्रतबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया यानी 'सिमी' से 'पीएफ़आई' के जुड़े होने का दावा भी किया गया.

इसके अलावा केरल पुलिस ने ये भी दावा किया था कि 'पीएफ़आई' के कार्यकर्ताओं पर छापामारी के दौरान चरमपंथी संगठन 'अल-क़ायदा' की प्रचार सामग्री भी बरामद की गई थी.

केरल अकेला राज्य नहीं है जिसके राडार पर 'पीएफ़आई' की गतिविधियां रहीं हैं. वर्ष 2018 में झारखंड सरकार ने भी इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था जिसे बाद में झारखंड के उच्च न्यायलय ने ख़ारिज कर दिया था.

झारखंड सरकार ने इस संगठन पर एक बार फिर प्रतिबंध लगा दिया था.

झारखंड सरकार की ओर से जारी बयान में आरोप लगाया गया था कि इस संगठन का संबंध विभिन्न चरमपंथी संगठनों से है और इसके कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ राज्य के विभिन्न पुलिस थानों में मामले दर्ज हैं.

सरकारी सूत्रों का दावा है कि वर्ष 2012 में हुए दंगों के बाद पूर्वोत्तर राज्य असम में नफ़रत भरे 'एसएमएस' में भी पीएफ़आई का हाथ रहा है.

सूत्रों का कहना है कि केवल एक ही दिन 13 अगस्त 2012 को 60 करोड़ नफ़रत भरे एसएमएस भेजे गए थे. पीएफ़आई ने इसमें भी अपना हाथ होने से इनकार किया था.

'पीएफ़आई' हमेशा इन आरोपों को ख़ारिज करती रही और उसका कहना था कि वो सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया यानी 'एसडीपीआई' से ही संबद्ध हैं. इसलिए 2006 में हुए विलय के बाद एसडीपीआई के संस्थापक अध्यक्ष ई-अबू बक़र को ही 'पीएफ़आई' का चेयरमैन बनाया गया.

नागरिकता क़ानून और 'एनआरसी' के विरोध में उत्तर प्रदेश में हुई हिंसा के लिए भी राज्य सरकार ने 'पीएफ़आई' पर शक जताया है. उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से 'पीएफ़आई' पर प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश भी की है. वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि उत्तर प्रदेश और दिल्ली में हुई हिंसा में भी पीएफ़आई का हाथ हो सकता है.

लेकिन संगठन के महामंत्री एम मोहम्मद अली जिन्ना ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर आरोप लगाया है कि पूरे देश में नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में प्रदर्शन हुए.

"केवल भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में ही इन विरोध प्रदर्शनों से निपटने के लिए 'दमनकारी तरीक़ों' का इस्तेमाल किया गया."

पीएफ़आई ने अपने बयान में कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार की पीएफ़आई के ख़िलाफ़ कार्यवाही असल में ''लोकतांत्रिक गतिविधियों के ख़िलाफ़ योगी की पुलिस का एक और तानाशाही वाला क़दम है.''

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