डोनाल्ड ट्रंप ने भारत में मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ाईं या साथ दिया? 

  • सरोज सिंह
  • बीबीसी संवाददाता
मोदी और ट्रंप

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अमेरिका में जब कभी डोनाल्ड ट्रंप का नाम लिया जाएगा, तो कैपिटल हिल हिंसा, उनके ख़िलाफ़ लाए गए महाअभियोग प्रस्ताव, विश्व स्वस्थ्य संगठन के साथ उनकी तनातनी, ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन, प्रेस के साथ उनकी तकरार-  जैसी कुछ घटनाओं का ज़िक्र हमेशा किया जाएगा. 

ज़ाहिर है ये सारी यादें वैसी नहीं हैं, जिन्हें अमेरिकी अक्सर याद करना पसंद करें. इन यादों में कड़वाहट ज़्यादा है. लेकिन क्या भारत के संदर्भ में भी ये बात उतनी ही सही है. आज बात ट्रंप और भारत के रिश्तों की. 

डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान एक बार भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका गए और एक बार डोनाल्ड ट्रंप का उन्होंने स्वागत भारत में किया.

इन दो बड़ी भव्य और चर्चित मुलाक़ातों के अलावा भी मोदी और ट्रंप की कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में मुलाक़ातें हुईं. 

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भारत और अमेरिका एक दूसरे को दोस्त मानते आए हैं. मोदी और ट्रंप के कार्यकाल में इस दोस्ती के रिश्ते में कई बार उतार चढ़ाव भी रहे हैं. 

लेकिन अब जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के भूत पूर्व राष्ट्रपति होने जा रहे हैं, तो भारत में उनके कार्यकाल के बारे में वो कौन सी बातें हैं जिनको याद किया जाएगा. इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए घड़ी की सुईयों को चार साल पहले ले जाने की ज़रूरत होगी. 

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अमेरिकी, कनाडाई और लातिन अमेरिकी स्टडी सेंटर में प्रोफ़ेसर चिंतामणी महापात्रा के मुताबिक़ ट्रंप के कार्यकाल को भारत में तीन स्तर पर देखने की ज़रूर है. 

वो बताते हैं, "सुरक्षा और रक्षा के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच संबंध बहुत अच्छे रहे. राजनयिक मुद्दों पर ट्रंप और मोदी सरकार के बीच बेहतर तालमेल देखने को मिला, लेकिन व्यापार और अर्थव्यवस्था के लिहाज से देखें, तो निराशा हाथ लगती है. मोदी और ट्रंप के बीच जिस तरह की पर्सनल केमिस्ट्री देखने को मिली, बावजूद इसके दोनों देश चाह कर भी व्यापारिक रिश्तों को बेहतर नहीं कर पाए. "   ट्रंप का कार्यकाल भारत के लिए कैसा रहा? इस सवाल के जवाब में आब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्टडीज़ विभाग के डायरेक्टर हर्ष पंत कहते हैं कि चूँकि भारत के संदर्भ में सबसे ज़्यादा चर्चा पाकिस्तान और चीन की होती है, तो इस संदर्भ में इन दोनों देशों के प्रति अमेरिका का रुख़ भारत के रुख़ से मिलता जुलता रहा है.

ट्रंप कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ रिश्ते

1 जनवरी 2018 की बात है. डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका का राष्ट्रपति बने साल ही बीता था. नए साल के पहले दिन ही उन्होंने पाकिस्तान के लिए ट्वीट किया, जिसमें पाकिस्तान पर आंतकवाद को शह देने का आरोप लगाया. 

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हर्ष पंत कहते हैं कि इस ट्वीट में भारत का ज़िक्र नहीं था. लेकिन भारत के लिए महत्वपूर्ण ज़रूर था. भारत दुनिया को पाकिस्तान के बारे में जो बात हमेशा से बताना चाहता था, वो बात दुनिया के सबसे ताक़तवर देश के राष्ट्रपति ने अपने ट्वीट में कही थी. ये अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए बहुत अहम बात थी. 

ट्रंप ने ट्वीट के ज़रिए बताया कि पिछले डेढ़ दशक में कैसे अमेरिका ने पाकिस्तान की 33 बिलियन डॉलर की राशि की मदद की. लेकिन बदले में अमेरिका के साथ पाकिस्तान ने कितना बड़ा धोखा किया. 

इसके बाद से अमेरिका की तरफ़ से पाकिस्तान को मिलने वाली मदद में लगातार कटौती होती रही. 

आँकड़ों के मुताबिक़ 2014 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय जहाँ पाकिस्तान को 2.1 बिलियन डॉलर की मदद की गई थी, वहीं 2017 में डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद ये मदद घट कर 526 मिलियन डॉलर रह गई थी. 

प्रोफ़ेसर चिंतामणि महापात्रा कहते हैं, "अमेरिका के इस क़दम से भारत को परोक्ष तौर पर फ़ायदा हुआ. भारत और पाकिस्तान के बीच के रिश्ते में कड़वाहट की बड़ी वजह हमेशा से सीमा पार आतंकवाद को बताया जाता रहा है. अमेरिका की तरफ़ से आर्थिक मदद का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने में किया जा रहा था. अमेरिका की कटौती की वजह से पाकिस्तान को काफ़ी दिक़्क़त का सामना करना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी आलोचना भी हुई. इस वजह से अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते में थोड़ी तल्खी भी आई." 

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चीन के ख़िलाफ़ तनाव में भारत का साथ

अब बात भारत के दूसरे पड़ोसी देश चीन की.

साल 2020 में भारत के 20 सैनिकों की मौत, चीन और भारत की सीमा पर हुई. चीन ने इसके लिए भारत को ही ज़िम्मेदार ठहराया और भारत ने चीन को. इस मुद्दे पर अमेरिका का पहला बयान 19 जून 2020 को आया था, जो इतना सधा हुआ था कि ना तो चीन को निराशा हुई और न ही भारत को ख़ुशी.  तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान से भी वो आक्रमकता ग़ायब दिखी, जिसकी भारतीयों को उम्मीद थी. उन्होनें बस इतना कहा कि ये बहुत मुश्किल परिस्थति है. हम भारत से बात कर रहे हैं. हम चीन से भी बात कर रहे हैं. वहाँ उन दोनों के बीच बड़ी समस्या है. दोनों एक दूसरे के सामने आ गए हैं और हम देखेंगे कि आगे क्या होगा. हम उनकी मदद करने की कोशिश कर रहे हैं.

ऐसी पेशकश पाकिस्तान के साथ तनाव पर भी ट्रंप ने पहले की थी, जिसे भारत ने सिरे से ख़ारिज़ कर दिया था. 

प्रोफ़ेसर चिंतामणि महापात्रा कहते हैं, "लद्दाख सीमा पर चीन से तनाव का मुक़ाबला करने में वैसे तो भारत ख़ुद में सक्षम था, लेकिन जिस तरह का सपोर्ट अमेरिका से मिला, वो डिप्लोमेटिक नज़रिए से भारत के लिए बेहतर साबित हुआ. लेकिन ये बात भी सच है कि ट्रंप ने खुल कर चीन के ख़िलाफ़ भारत का साथ नहीं दिया."  

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वैसे अमेरिका चीन को अपना प्रतिद्वंदी मानता है और समय-समय पर दूसरे तरीक़ों से इसका अहसास चीन को कराता रहता है.

चीन के प्रति ट्रंप प्रशासन के कड़े रवैए से भारत को परोक्ष रूप से फ़ायदा ही पहुँचा. 

हर्ष पंत कहते हैं कि अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर की बात हो या फिर टेक्नोलॉजी वॉर में 5जी की चीनी कंपनी को अलग-थलग करने की बात हो- अमेरिका ने ऐसे क़दम उठाए, जिससे चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कटता चला गया. सीधे तौर पर ना सही लेकिन अमेरिका के इस क़दम का कुछ फ़ायदा भारत को भी मिला है. चीन के ख़िलाफ़ दूसरे पश्चिमी देशों का नज़रिया बदलने में ट्रंप के इन क़दमों की महत्वपूर्ण भूमिका रही."

कोरोना महामारी को लेकर ट्रंप ने चीन पर जैसा निशाना साधा, वो भी अमेरिका और चीन के रिश्तों में कड़वाहट की एक वजह है.   

हर्ष पंत मानते हैं कि चीन के ख़िलाफ़ ट्रंप के रवैए ने भारत को इस बात के लिए आश्वस्त कर दिया था कि अमेरिका चीन के साथ पहले के मुकाबले ज़्यादा सख़्ती से पेश आएगा.  

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ट्रंप की इंडो-पैसेफिक रणनीति

चाहे चिंतामणि महापात्रा हों या हर्ष पंत, दोनों ही मानते हैं कि चीन के साथ अपनी प्रतिद्वंदिता की वजह से ही ट्रंप ने इंडो-पैसिफक में भी नई तरह की रणनीति अपनाई, जो बराक ओबामा के कार्यकाल के मुकाबले ज़्यादा स्पष्ट थी.

भले ही ओबामा के समय में इसकी शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन नई रणनीति को स्पष्टता ट्रंप शासन में मिली. इस क्षेत्र में अमेरिका ने भारत की भूमिका को अलग से रेखांकित किया और अहम भी माना. अमेरिका ने जापान, भारत और आस्ट्रेलिया के साथ मिल कर भी काम किया और अलग से भी रिश्ते बनाए. 

ये वो बातें हैं, जो ट्रंप के कार्यकाल में भारत के लिए राहत की बात रही. लेकिन सब कुछ अच्छा ही रहा हो. ऐसा भी नहीं हैं.

ट्रंप कार्यकाल में भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते

भारत अमेरिका का आठवाँ सबसे बड़ा व्यापारिक पार्टनर देश है. लेकिन व्यापार के क्षेत्र में ट्रंप प्रशासन का भारत के साथ रिश्ता बहुत अच्छा नहीं माना जा सकता. ऐसा प्रोफ़ेसर चिंतामणि महापात्रा कहते हैं. 

अमेरिका ने पाँच जून 2019 को व्यापार में सामान्य तरजीही व्यवस्था (जीएसपी) जैसी चीज़ों पर भारत को शुल्क मुक्त आयात की सुविधा देनी बंद कर दी. इससे अमेरिका में 5.6 अरब डॉलर का भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ, जिसमें रत्न, आभूषण, चावल, चमड़ा आदि शामिल हैं.

जीएसपी का मतलब है जेनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफ्रेंस लिस्ट. आसान शब्दों में समझें तो जीएसपी अमेरिका की व्यापारिक वरीयता लिस्ट है.

2019 के इस फ़ैसले के बाद भारतीय निर्यातकों के उत्पादों पर अमेरिका में 10 फ़ीसदी ज़्यादा शुल्क लग रहा है.

बीते साल फरवरी में डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे पर देशों के बीच एक ट्रेड डील पर दस्तख़त की बात भी चल रही थी. लेकिन वो समझौता नहीं हो सका. जानकार ट्रंप शासन के दौरान इस समझौते के ना होने को दोनों देशों के लिहाज़ से सही नहीं मानते.

यही वजह है कि आर्थिक मोर्चे पर भारत अमेरिका ट्रंप के कार्यकाल में ज़रूर अलग-अलग दिखते हैं.  

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H1B वीज़ा पर ट्रंप सरकार का फैसला 

इसके अलावा जाते-जाते डोनाल्ड  ट्रंप ने H1B वीज़ा की व्यवस्था में भी काफ़ी बदलाव किए. ट्रंप के इस फ़ैसले से सबसे ज़्यादा भारतीय प्रभावित हुए.  

यूएस सिटीज़नशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज के डेटा के मुताबिक़ पाँच अक्तूबर 2018 तक 3,09,986 भारतीयों ने इस वीज़ा के लिए आवेदन दिए थे. ये संख्या दुनिया के किसी भी देश से ज़्यादा है. दूसरे नंबर पर चीन आता है, जहाँ के 47,172 लोगों ने इस वीज़ा के लिए आवेदन दिया था. 

इस फैसले को कई जानकारों ने भारत के ख़िलाफ़ फैसला कहने के बजाए, 'प्रो-अमेरिकी' फैसला करार दिया और नंवबर 2020 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से जोड़ कर देखने की बात की. लेकिन वजह जो भी रही हो, इस फैसले को भारतीय के हित में नहीं माना जा सकता. 

इसके अलावा चाहे अमेरिका ने ईरान पर जैसे भी प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत को चाबहार समझौते में शामिल रहने से नहीं रोका. कुछ जानकार मानते हैं कि ईरान पर प्रतिबंध की वजह से भारत का तेल ख़र्च ज़्यादा बढ़ गया है.

उसी तरह से रूस से एस-400 की ख़रीद पर भी दूसरे देशों के लिए अमेरिका के अलग नियम थे, लेकिन भारत के लिए नियम अलग रहे. 

हाल ही में भारत-अमेरिका के बीच हुआ बेका समझौता और अमेरिका, जापान, भारत और आस्ट्रेलिया के बीच क्वॉड समूह की दोबारा से शुरूआत भी ट्रंप कार्यकाल में भारत में किए गए कुछ ऐसे समझौते हैं, जो दोनों देशों के रिश्तें को नई पहचान देते हैं. 

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