पश्चिम बंगाल चुनाव: किसान नेताओं के प्रचार से बीजेपी पर कितना असर?

  • सलमान रावी
  • बीबीसी संवाददाता
किसान नेता

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पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में या यूं कहें कि देश के किसी भी राज्य के विधानसभा चुनाव में ऐसा संभवत: पहली बार हुआ कि पगड़ी बांधे सिख और हरी टोपी पहने किसान नेता प्रचार के दौरान मंच से लोगों को ठोस निर्णय लेने के बारे में सलाह दे रहे हों.

पश्चिम बंगाल के चुनावी दंगल में ये पहली बार था जब सभाओं में 'जय जवान, जय किसान' और 'किसान एकता ज़िंदाबाद' के नारे गूँज रहे थे.

ये आवाज़ें किसानों के मंचों से गूँज रही थीं जो दिल्ली के सिंघु बॉर्डर से पश्चिम बंगाल में किसान आंदोलन का केंद्र रहे नंदीग्राम और सिंगुर पहुंचे थे.

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केंद्र सरकार के लाए नए कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठन अब हर उस राज्य का दौरा कर रहे हैं जहां विधानसभा चुनाव होने हैं. पश्चिम बंगाल के चुनावी दंगल में इन किसान नेताओं की मौजूदगी ने चल रहे राजनैतिक संघर्ष को नया मोड़ दे दिया है.

कोलकाता के धर्मतल्ला का मैदान हो, आसनसोल या नंदीग्राम या फिर सिंगुर... जहां जहां किसानों की महापंचायतों का आयोजन किया गया वहाँ नेताओं की नई खेप देखकर पश्चिम बंगाल के लोग भी अचंभे में नज़र आए. उन्होंने ऐसा नज़ारा पहले कभी नहीं देखा था जब पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान बंगाल के चुनावों में इस इतरह की रूचि दिखा रहे हों.

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संयुक्त किसान मोर्चा के नेता गुरनाम सिंह चडूनी जब सिंगुर की किसान महापंचायत के मंच से बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने लोगों से कहा कि वो नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ केंद्र सरकार के विरोध स्वरूप सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के अलावा किसी भी दल को वोट दें. वो बार-बार कहते सुने गए कि किसी को भी वोट दे दें लेकिन बीजेपी को नहीं.

यही बात दूसरे किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने भी दोहराई. उन्होंने बार-बार ज़ोर देते हुए कहा कि वो मतदाताओं में यही जागरूकता लाने के लिए पश्चिम बंगाल आये हैं.

एक दिन पहले किसान नेता राकेश टिकैत जब कोलकाता पहुंचे थे. कोलकाता पहुंचने से पहले उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की नेता और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आई चोट के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त की थी और कहा था कि सबको ममता का साथ देना चाहिए. उनके इस बयान से ही स्पष्ट संकेत दिखने लगे थे कि किसान नेता किसके पक्ष में प्रचार कर रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ये सिर्फ़ संयोग मात्र भी नहीं था कि कोलकाता के हवाई अड्डे पर राकेश टिकैत का स्वागत करने तृणमूल कांग्रेस की सांसद डोला सेन ख़ुद पहुंची हुई थीं.

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संयुक्त किसान मोर्चा में तीन सौ से ज़्यादा किसान संगठन शामिल हैं और उनमें से भी लाल झंडे वाले संगठनों की तादाद बहुत ज़्यादा है. ऐसे में जब वाम मोर्चा ने कांग्रेस पार्टी और इन्डियन सेकुलर फ्रंट के साथ मिलकर गठबंधन किया है तो ऐसे में टिकैत के बयान से उनके ख़ेमे में बेचैनी बढ़ गई है.

मोर्चे के बड़े नेता अवीक साहा से जब बीबीसी ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने सफ़ाई देते हुए कहा कि 'राकेश टिकैत और योगेन्द्र यादव ने कोलकाता में जिस किसान महापंचायत को संबोधित किया था उसमे लाल झंडे वाले दल भी शामिल थे. उन्होंने कहा कि किसान किसी राजनीतिक दल के पक्ष में प्रचार नहीं कर रहे हैं'.

मगर सिंगुर की महापंचायत में तृणमूल कांग्रेस के कद्दावर नेता बेचाराम मन्ना की मौजूदगी कुछ और ही कह रही थी. वहां मौजूद लोगों ने बताया कि मन्ना ने पंचायत के आयोजन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है.

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बीबीसी से बात करते हुए मन्ना ने इस बात का खंडन किया और कहा कि वो सिर्फ़ किसान नेताओं की बात सुनने आये हैं जबकि पंचायत के शुरू होने से पहले वो मंच से लोगों को संबोधित भी कर रहे थे.

ज़ाहिर सी बात है कि इस आयोजन से वाम दल और कांग्रेस गठबंधन के नेताओं ने सिंगुर में खुद को दूर रखा लेकिन अवीक साहा तर्क देते हैं की किसान लोगों से अपील कर रहे हैं कि अपने अपने क्षेत्र में जो उम्मीदवार भाजपा को हराने में सक्षम है, उसी को वोट दें.

हालांकि किसानों के झंडों के अलावा महापंचायत में किसी भी राजनीतिक दल का झंडा नज़र नहीं आ रहा है लेकिन किसान नेताओं के हाव भाव और उनके भाषणों से साफ़ समझ आ रहा है कि वो इन चुनावों में किसे समर्थन देने के लिए इशारा कर रहे हैं.

बीबीसी ने वाम मोर्चा, कांग्रेस और आईएसएफ़ गठबंधन के नेताओं से जब इस संबंध में जानने की कोशिश की तो उन्होंने इस पर किसी भी तरह की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

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जानकार कहते हैं कि किसानों पर बयान देकर गठबंधन के नेता तृणमूल कांग्रेस को मज़बूत नहीं करना चाहते हैं.

वहीं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने टीवी चैनल एबीपी से कहा कि 'किसानों का आंदोलन कभी कांग्रेस का आंदोलन बन जाता है तो कभी तृणमूल का आंदोलन, तो ये साफ़ है कि साज़िशी संदूक़ किसानों के कंधों पर बंदूक रख चलाई जा रही है...बीजेपी को हटाने का उनका एजेंडा धराशायी हो जाएगा'.

नंदीग्राम और सिंगुर पश्चिम बंगाल के वो इलाक़े हैं जहां से तृणमूल कांग्रेस और ख़ास तौर पर ममता बनर्जी का राज्य की राजनीति में ज़ोरदार उदय हुआ था और वो भी किसानों के संघर्ष का नेतृत्व करके.

यही वो इलाक़े भी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि जहां से पश्चिम बंगाल की राजनीति में 34 सालों तक हावी रहने वाले वाम मोर्चे का पतन शुरू हुआ और वर्ष 2011 में उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी.

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