भारत में लोकतंत्र की हालत पर विदेशी चिंता कितनी सही है?

  • राघवेंद्र राव
  • बीबीसी संवाददाता
जयशंकर

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भारत के विदेश मंत्री ने इन दोनों रिपोर्टों को खारिज किया है

"दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र निर्वाचित निरंकुशता में बदल गया है."

स्वीडन की वी-डेम इंस्टीट्यूट की ताज़ा रिपोर्ट में यह बात भारत के बारे में कही गई है. कुछ ऐसी ही बात अमेरिकी संस्था फ्रीडम हाउस ने भी पिछले दिनों कही थी, अमेरिकी रिपोर्ट में भारत को 'स्वतंत्र लोकतंत्र' की श्रेणी से हटाकर 'आंशिक तौर पर स्वतंत्र लोकतंत्र' की श्रेणी में डाल दिया गया है.

इन दोनों रिपोर्टों के आने बाद भारत सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया तो नहीं आई थी लेकिन अब भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इन रिपोर्टों को 'पाखंड' कहा है.

पिछले दिनों 'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव' में एक बातचीत के दौरान जयशंकर ने कहा, "आप जिन रिपोर्टों की बात कर रहे हैं उनमें लोकतंत्र और निरंकुश शासन की बात नहीं है, वह पाखंड है. दरअसल, कुछ लोग हैं जिन्होंने ख़ुद को दुनिया का रक्षक घोषित कर दिया है, अगर चीज़़ें उनके हिसाब से नहीं होती तो उन्हें तकलीफ़ होती है. हमें किसी से सर्टिफ़िकेट लेने की ज़रूरत नहीं है."

जब भारत के विदेश मंत्री से पूछा गया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी छवि बन रही है कि नरेंद्र मोदी के शासनकाल में भारत में लोकतंत्र कमज़ोर हुआ है, तो विदेश मंत्री ने इसके जवाब में कहा, "वे बीजेपी को हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी कहते हैं, हम राष्ट्रवादी हैं और हमने 70 देशों में वैक्सीन पहुँचाई, जो ख़ुद को अंतरराष्ट्रीय-वादी कहते हैं उन्होंने कितने देशों को अपनी वैक्सीन दी?"

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विदेश मंत्री ने कहा, "हमारी आस्थाएँ हैं, मूल्य हैं, लेकिन हम धार्मिक पुस्तक हाथ में लेकर पद की शपथ नहीं लेते, हमें ऐसा करने वालों से सर्टिफ़िकेट लेने की ज़रूरत नहीं है."

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव के दौरान ही एक अन्य बहस में बीजेपी के वरिष्ठ नेता राम माधव ने इन दोनों रिपोर्टों पर अपनी राय रखी.

उन्होंने कहा कि फ्रीडम हाउस ने भी माना है कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था और चुनाव संचालन बहुत ही जीवंत है, बहुत सारी पार्टियाँ हैं, वे आलोचना करने के लिए स्वतंत्र हैं. "हाँ, कुछ शिकायतें होती हैं जो नागरिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों के बारे में हैं, इस मामले में मुझे कहना है कि हमारे देश में कुछ लोग बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं जिससे ऐसी छवि बनती है".

राम माधव ने कहा, "एक रवैया ऐसा भी है कि ये लोग कौन होते हैं हमें ज्ञान देने वाले, हम उनकी बात क्यों सुनें, हम उन्हें खारिज कर देते हैं. यह ठीक रवैया नहीं है, हमें बताना चाहिए कि ग़लत छवि पेश की जा रही है, और छवि को ठीक करने के लिए काम करना चाहिए."

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मुद्दा छवि का या वास्तविकता का?

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और त्रिवेंद्रम से सांसद शशि थरूर और बीजेपी के नेता राम माधव कार्यक्रम में एक साथ मंच पर थे.

शशि थरूर ने कहा, "भारत में ऐसे बहुत सारे कानून आ रहे हैं जिसकी वजह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ख़तरा है, ईदी अमीन का मशहूर जुमला है--मैं आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी दे सकता हूँ, लेकिन आपकी अभिव्यक्ति के बाद स्वतंत्रता की गारंटी नहीं दे सकता--बीजेपी में कुछ लोग ऐसी ही राह पर चल रहे हैं. जिस तरह पत्रकारों के ख़िलाफ़ लगातार मुकदमे पर मुकदमे दायर किए गए हैं उसने दुनिया का ध्यान खींचा है. छोटी-छोटी बातों पर ढेर सारे पत्रकारों पर राजद्रोह का मामला चलाया जा रहा है."

शशि थरूर ने कहा, "देश में एक कॉमेडियन है जो लतीफ़ा सुनाने से पहले ही जेल में डाल दिया गया, केरल का एक पत्रकार हाथरस जाने के रास्ते में पकड़कर जेल में डाल दिया गया, जब इस तरह के मामलों का तांता लगा हो तो आप कैसे उम्मीद करते हैं कि दुनिया की नज़र उस पर नहीं जाएगी. यूनिवर्सिटियों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दम घुट रहा है, भारत की छवि एक बहुलता वाले देश की रही है क्योंकि बहुलता थी, अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि पर असर पड़ रहा है तो उसके पीछे कारण भी हैं."

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क्या है इन रिपोर्टों में?

वी-डेम और फ़्रीडम हाउस दोनों ही प्रतिष्ठित संस्थान हैं और उनकी रिपोर्टों पर दुनिया भर में चर्चा होती है.

वी-डेम की रिपोर्ट में कहा गया है की भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी कम हुई है और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले देश ने इस तरह की सेंसरशिप शायद ही कभी देखी है. रिपोर्ट के मुताबिक, सेंसरशिप के मामले में भारत अब पाकिस्तान के समान है, जबकि भारत की स्थिति बांग्लादेश और नेपाल से बदतर है.

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने देशद्रोह, मानहानि और आतंकवाद के क़ानूनों इस्तेमाल अपने आलोचकों को चुप कराने के लिए किया है. रिपोर्ट में कहा गया है की भाजपा के सत्ता संभालने के बाद सात हज़ार से अधिक लोगों पर राजद्रोह के आरोप लगाए गए हैं, और जिन पर आरोप लगे हैं उनमें से ज़्यादातर लोग सत्ता की विचारधारा से असहमति रखते हैं.

यह भी कहा गया है कि मानहानि का क़ानून उन पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को चुप कराने के लिए अक्सर किया जा रहा है जो भाजपा की नीतियों पर सवाल उठाते हैं. यह रिपोर्ट यह भी कहती है की निरंकुशता की प्रक्रिया में नागरिक समाज का भी दमन किया जा रहा है.

अमेरिकी संस्था फ्रीडम हाउस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी राज्यों की सरकारों ने आलोचकों पर हमले जारी रखे हैं. रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि कोविड के दौरान लगाए गए लॉकडाउन के कारण लाखों प्रवासी मज़दूरों का खतरनाक और बेपरवाह तरीके से विस्थापन हुआ.

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क्या यह पूर्वाग्रह है?

नई दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम के निदेशक प्रोफेसर हर्ष वी पंत का कहना है कि इन विश्लेषणों में यह मानना ही होगा कि शुरू से ही मोदी के बारे में एक निश्चित नकारात्मकता है.

वे कहते हैं, "इस नकारात्मकता से ही सारी बात प्रभावित हो जाती है. भारत में आज जो भी नकारात्मक हो रहा है, उसके लिए मोदी को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है. पिछली सरकारें क्या कर रहीं थी, इसका कोई आकलन नहीं है. यह धारणा कि यह एक हिंदू राष्ट्रवादी सरकार है, बहुत सारी कवरेज को प्रभावित करती है."

वे कहते हैं, "जब आप उस अभिजात वर्ग के लोगों का सर्वेक्षण करते हैं जो जानकारी की आपूर्ति कर रहा है तो आपको उनके पूर्वाग्रहों को ध्यान में रखना होगा और यह भी कि भारत में एक कुलीन वर्ग है, जो शायद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से खुश नहीं है".

जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे कहते हैं कि फ्रीडम हाउस और वी-डेम जैसे अंतरराष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी संगठनों और निगरानी संस्थाओं का काम ही है सरकारों के लोकतांत्रिक व्यवहारों की जाँच करके उन पर टिप्पणी करना.

वे कहते हैं, "ये रिपोर्टें मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों के उल्लंघन को प्रकाश में लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं, इन रिपोर्टों में दुनिया भर में घटती आज़ादी की विचलित करने वाली स्थितियों पर भी टिप्पणियाँ की जाती हैं".

सूचना के अधिकार आंदोलन से जुड़े रहे निखिल डे कहते हैं, "ऐसी रिपोर्टों में लिखी टिप्पणियों और प्रतिक्रियाओं पर उनके मेरिट के हिसाब से विचार करना ही भारत सहित सभी लोकतांत्रिक देशों के हित में होगा, इस बात का बहुत मतलब नहीं है कि रिपोर्ट कहाँ से आ रही है, अहम ये बात है कि रिपोर्ट में क्या कहा गया है."

वे कहते हैं, "यह बहुत ही अजीब बात है कि भारत एक ऐसा देश है जो अपने यहाँ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी कारोबार को इतना प्रोत्साहन दे रहा है, लेकिन वही देश यूनिवर्सल मानवाधिकारों के ढाँचे को बनाने और उसे मजबूत करने को लेकर इच्छुक नहीं है."

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दिल्ली के ग़ाज़ीपुर में आंदोलनकारी किसानों को शहर में दाखिल होने से रोकने के लिए लगाई गई बैरीकेडिंग

लोकतंत्र का पैमाना क्या है?

वी-डेम की डेमॉक्रेसी रिपोर्ट किसी लोकतंत्र को पांच पैमानों पर मापती है, चुनावी प्रक्रिया कैसी है, देश में उदारता कितनी है, लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी कितनी है, विचार-विमर्श का माहौल कैसा है और सरकार का रुख़ सबके प्रति एक समान है या नहीं. इसके लिए डेटा इकट्ठा किया जाता है.

वी-डेम की रिपोर्ट लोकतंत्र को उसकी पूरी व्यावहारिक जटिलता के साथ देखती है यानी केवल चुनाव होने को लोकतंत्र नहीं माना जा सकता, देश लोकतांत्रिक तरीके से चल रहा है या नहीं, यह देखने की कोशिश की जाती है.

इसी तरह फ्रीडम हाउस 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुरूप अपनी रिपोर्ट बनाती है. उसकी रिपोर्ट इस आधार पर बनाई जाती है की ये वैश्विक मानक हैं जो सभी देशों और क्षेत्रों पर लागू होते हैं, चाहे उनकी धार्मिक, जातीय या नस्ली संरचना कैसी भी हो.

फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट इस धारणा से संचालित होती है कि सभी लोगों के लिए स्वतंत्रता उदार लोकतांत्रिक समाजों में सबसे अच्छी तरह से हासिल की जाती है. यह रिपोर्ट इस बात का आकलन करती है कि सरकार के दावों की तुलना में रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लोग अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का कितना इस्तेमाल कर पाते हैं.

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