अशोका यूनिवर्सिटी प्रकरण: क्या भारतीय विश्वविद्यालयों में बौद्धिक स्वतंत्रता ख़तरे में है?

  • राघवेंद्र राव
  • बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
प्रताप भानु मेहता

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पिछले दिनों शैक्षिक जगत में उस समय हलचल मच गई, जब राजनीतिक विश्लेषक और लेखक प्रताप भानु मेहता ने सोनीपत स्थित ग़ैर सरकारी विश्वविद्यालय अशोका यूनिवर्सिटी से प्रोफ़ेसर के पद से त्यागपत्र दे दिया.

अपने त्यागपत्र में मेहता ने कहा कि विश्वविद्यालय के संस्थापकों के साथ एक बैठक के बाद उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि विश्वविद्यालय से उनका जुड़ाव एक 'राजनीतिक बोझ' माना जा सकता है.

उन्होंने यह भी कहा कि चूँकि उनका सार्वजनिक लेखन स्वतंत्रता के संवैधानिक मूल्यों और सभी नागरिकों के लिए समान सम्मान का प्रयास करने वाली राजनीति के लिए है, ये भी विश्वविद्यालय के लिए जोख़िम उठाने जैसा समझा जा सकता है.

मेहता के त्यागपत्र के कुछ दिन बाद सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने भी अशोका यूनिवर्सिटी से इस्तीफ़ा दे दिया.

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बोलने की आज़ादी

सुब्रह्मण्यम ने अपने त्यागपत्र में कहा कि यह बात उनके लिए परेशान करने वाली थी की मेहता जैसे व्यक्ति ने ख़ुद को विश्वविद्यालय छोड़ने के लिए मजबूर पाया. इन दो बड़े नामों का एक साथ अशोका यूनिवर्सिटी को छोड़ देना भारत के शैक्षिक जगत के लिए एक झटके के समान था.

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बड़े पैमाने पर इस बात की चर्चा हुई. रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इस मामले को बोलने की आज़ादी पर एक गंभीर चोट कहा.

एक सोशल मीडिया पोस्ट में राजन ने मेहता को सरकार के लिए एक काँटा बताया. उन्होने कहा, "अशोका यूनिवर्सिटी के संस्थापकों को यह महसूस करना चाहिए कि उनका मिशन वास्तव में राजनीतिक पक्ष लेना नहीं था, बल्कि प्रोफ़ेसर मेहता जैसे लोगों के बोलने के अधिकार की रक्षा करना जारी रखना था."

इस घटनाक्रम को दुखद बताते हुए राजन ने यह भी कहा कि बोलने की आज़ादी एक महान विश्वविद्यालय की आत्मा है और इस पर समझौता करके संस्थापकों ने विश्वविद्यालय की आत्मा का सौदा किया है.

कई विदेशी शिक्षाविदों ने भी प्रताप भानु मेहता के प्रति समर्थन जताया. ऑक्सफ़र्ड, कैम्ब्रिज, कोलंबिया, येल, हार्वर्ड, और प्रिंस्टन सहित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के 150 से अधिक शिक्षाविदों ने विश्वविद्यालय के ट्रस्टियों और प्रशासकों को एक खुले पत्र में कहा कि वे इस बात से व्यथित हैं कि मेहता को 'राजनीतिक दबाव' के चलते विश्वविद्यालय छोड़ना पड़ा.

वहीं दूसरी ओर अशोका यूनिवर्सिटी के छात्र संगठन ने कक्षाओं के बहिष्कार का आह्वान करते हुए कहा कि छात्र दोनों प्रोफ़ेसरों के इस्तीफ़े से बेहद दुखी हैं और जिन शर्तों के तहत इस्तीफ़े हुए हैं, वे उनसे असंतुष्ट हैं.

छात्रों ने कहा कि उन्होंने न केवल बौद्धिक दिग्गजों को खो दिया है, बल्कि उस विश्वास को भी खो दिया है कि विश्विद्यालय प्रशासन उन्हे बाहरी राजनीतिक दबावों से बचाएगा.

अशोका यूनिवर्सिटी ने पूरे मामले पर 'गहरा अफ़सोस' जताते हुए यह माना कि उसकी 'संस्थागत प्रक्रियाओं में कुछ ख़ामियाँ हैं.' लेकिन वो ख़ामियाँ क्या हैं, इस पर विश्वविद्यालय ने कुछ नहीं कहा. लेकिन इतना ज़रूर कहा कि विश्वविद्यालय उन ख़ामियों को सुधारने के लिए काम करेगा, जिससे उसकी अकादमिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्धता की पुष्टि होगी.

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शिक्षाविदों का इस प्रकरण पर क्या कहना है?

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद का यह मानना है कि अपने इस्तीफ़े में और छात्रों को लिखे अपने पहले पत्र में मेहता ने जो संकेत किया था, उससे यह निष्कर्ष निकाला जाना बहुत ग़लत नहीं है कि उनको अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोमोटर्स की तरफ़ से यह बताया गया या इशारा किया गया कि उनका रहना अब अशोका यूनिवर्सिटी के लिए बोझ बन गया है और मेहता विश्वविद्यालय के विकास के रास्ते में या उनके प्रोमोटर्स के रास्ते में रोड़ा बन गए हैं.

वे कहते हैं, "इसका अर्थ बहुत स्पष्ट है कि प्रताप भानु मेहता के जो सार्वजनिक विचार हैं, वे सार्वजनिक विचार अभी जो सत्ता में हैं, उनके प्रतिकूल हैं. संभवतः इस कारण उनको कहा गया कि आप हमारे लिए बोझ बन रहे हैं, असुविधाजनक हैं. यह उनको संकेत किया गया और प्रताप भानु मेहता ने एक भले मानुस की तरह अशोका यूनिवर्सिटी को असुविधा से बचाने के लिए इस्तीफ़ा दे दिया."

मोदी सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रह्मण्यम के त्यागपत्र ने भी मेहता के त्यागपत्र की गंभीरता को बढ़ा दिया है.

अपने इस्तीफ़े में सुब्रह्मण्यम ने कहा कि यह बात बहुत ज़्यादा परेशान करने वाली है कि अशोका यूनिवर्सिटी अपनी निजी स्थिति और निजी पूँजी के आधार पर भी अब अकादमिक अभिव्यक्ति और आज़ादी को स्थान नहीं दे सकता है.

अपूर्वानंद कहते हैं कि इन दोनो बातों से स्पष्ट है कि अशोका यूनिवर्सिटी के ट्रस्टीज़ अवश्य ही कुछ दबाव महसूस कर रहे थे, जिस्की वजह से उन्होने प्रताप भानु मेहता जैसे व्यक्ति को विश्वविद्यालय छोड़ने का इशारा किया, जिन्हें वे पहले ट्रॉफ़ी की तरह चारों तरफ़ दिखा रहे थे.

लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर संगीत कुमार रागी का कहना है कि इस मामले में जाँच की जाए या मेहता उन तथ्यों के साथ सामने आएँ कि कौन सी ऐसी बात थी, जिसके कारण उनको लगा कि अशोका यूनिवर्सिटी में काम करना मुश्किल है.

रागी कहते हैं, "प्राइवेट यूनिवर्सिटी कोई चैरिटी तो कर नहीं रही हैं और अगर वो चैरिटी नहीं कर रही हैं, तो उसके दिमाग़ में बौद्धिक सवाल के साथ-साथ व्यापारिक सवाल भी हैं और उन व्यापारिक सवालों में मैं नहीं जानता कि प्रताप भानु मेहता को किसी ने यह कहा होगा कि आप आर्टिकल ना लिखें."

रागी कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि भारत सरकार का किसी यूनिवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर पर इस तरह का दबाव होगा कि अगर वो सरकार के ख़िलाफ़ कुछ कहेंगे, तो सरकार यूनिवर्सिटी प्रबंधन के ख़िलाफ़ चली जाएगी.

लेकिन अशोका यूनिवर्सिटी प्रशासन ने माना है कि चूक हुई है, उसका क्या? रागी कहते हैं कि प्रक्रियागत चूक के आधार पर कोई आदमी यूनिवर्सिटी नहीं छोड़ सकता. वे कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि कोई अकादमिक कारण रहा, जिसकी वजह से प्रताप भानु मेहता को इस्तीफ़ा देने की आवश्यकता पड़ी."

क्या भारत के विश्वविद्यालयों में बौद्धिक स्वतंत्रता पर प्रहार हो रहा है?

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एक आरोप जो अक्सर सुनने में आता है, वो ये है कि केंद्र सरकार विश्वविद्यालयों की बौद्धिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही है.

पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले देखने को मिले, जहाँ दक्षिणपंथी गुटों ने विश्वविद्यालयों में उन विषयों पर विचार-विमर्श होने में बाधा डाली, जिनसे दक्षिणपंथ की असहमति है.

गत वर्षों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जादवपुर यूनिवर्सिटी, बर्दवान यूनिवर्सिटी और हैदराबद यूनिवर्सिटी में समय-समय पर छात्र प्रदर्शन होते रहे हैं.

अपूर्वानंद कहते हैं कि पिछले छह वर्षों में जो भारत की पब्लिक यूनिवर्सिटीज़ के साथ जो हो रहा है, अगर उसे देख लिया जाए, तो यह बहुत साफ़ तौर पर ज़ाहिर है कि अशोका यूनिवर्सिटी में जो अभी हुआ और हल्के ढंग से हुआ, वो पब्लिक यूनिवर्सिटीज़ में बहुत हिंसक तरीक़े से हुआ है.

वे जेएनयू में हुई हिंसा का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जिस हमले में दो शिक्षक और अनेक छात्र घायल हुए, उस हमले में शामिल गुंडों की पहचान हो जाने के बावजूद उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

अपूर्वानंद कहते हैं, "दिल्ली विश्वविद्यालय में आप कई विषयों पर सेमिनार अब नहीं कर सकते. इसके लिए आपको जगह नहीं मिलेगी. जैसे कश्मीर पर अगर आप सेमिनार करना चाहें, तो जगह नहीं मिलेगी, आर्टिकल 370 पर करना चाहें, तो जगह नहीं मिलेगी. कई विषय ऐसे हैं, जिन पर आप डीयू मे खुलेआम विचार विमर्श नहीं कर सकते."

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वे कहते हैं कि राज्यों के विश्वविद्यालय पहले ही ध्वस्त हो चुके हैं और उनमें अकादमिक स्वतंत्रता की बात करना ही बेमानी है. क्योंकि वहाँ अकादमिक ताक़त ही नहीं बची है. वे कहते हैं, "केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पिछले छह सालों में जो कुलपतियों की नियुक्तियाँ हुई हैं, वो भी या तो सत्ता के अनुयायी हैं या उनकी विचारधारा के लोग हैं. तो उनके ज़रिए भी विश्वविद्यालयों को नियंत्रित कर लिया गया है."

लेकिन प्रोफ़ेसर रागी कहते हैं कि यह एक गंभीर सवाल है, जिसका मंथन बहुत गहराई से होना चाहिए. उनके अनुसार पिछले 70 साल में राइट विंग के बुद्धिजीवियों को कभी भी यूनिवर्सिटी सिस्टम में आने नहीं दिया गया और ना ही काम करने दिया गया.

वे कहते हैं, "इसकी एक मिसाल देखी जा सकती है. इंडियन काउंसिल ऑफ़ सोशल साइंस रिसर्च में पीएचडी के पोस्ट-डॉक्टोरल फ़ेलो के रिसर्च टॉपिक का अगर एक आँकड़ा निकालें, तो आपको चौंकाने वाले तथ्य मिलेंगे. जितना भी काम हुआ है, वो वामपंथ आंदोलन पर और कांग्रेस से संबंधित रहा है. जितने भी बड़े-बड़े यूनिवर्सिटी सिस्टम थे, उनका राजनीतिकरण हो चुका था और वहाँ पेट्रन-क्लाइंट का संबंध रहा, जो एक ही विचारधारा का रहा और अपने विद्यार्थियों का पालन पोषण करता रहा."

रागी यह भी कहते हैं कि पिछले छह साल में भारत का राष्ट्रीय विमर्श और बौद्धिक विमर्श दोनों बदला है और लोगों ने इस बारे में एक वैकल्पिक तरीक़े से बात करने की कोशिश की है.

वे कहते हैं, "मेरा मानना है कि सबकी अपनी बौद्धिक ख़ेमेबाज़ी है, सबके अपने बौद्धिक अखाड़े हैं. इन अखाड़ों में 70 साल तक आपने काम किया. एक वैकल्पिक विमर्श खड़ा हो रहा है तो आपको डर सता रहा है या कुछ लोगों को यह परेशानियाँ हो रही हैं."

क्या बड़ा सवाल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का है?

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एक आरोप ये भी है कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता छीनने के प्रयास बढ़ा दिए हैं.

प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अब केंद्रीय ढंग से पाठ्यक्रम बना कर भेज रहा है.

वे कहते हैं, "दुनिया में कोई भी विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय तभी कहलाता है, जब वो अपने शिक्षकों की नियुक्ति ख़ुद करता है, अपने ढंग से छात्रों को दाख़िल कर सकता है और अपना पाठ्यक्रम ख़ुद बना सके. लेकिन भारत में अब पाठ्यक्रम ख़ुद बनाने की आज़ादी भी विश्वविद्यालयों से छीन ली गई है. सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ के लिए कॉमन एंट्रेन्स टेस्ट लाया जा रहा है, तो छात्रों को अपने ढंग से दाखिल करने की आज़ादी भी छीनी जा रही है."

उनका यह भी मानना है कि अकादमिक स्वतंत्रता के लिए अब जगह बहुत कम रह गई है. वे कहते हैं, "कुछ दिन पहले एक सर्कुलर में कहा गया कि अगर आप संवेदनशील विषयों पर कोई वेबिनार करना चाहें, तो पहले आपको विदेश मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ेगी. एक आदेश यह है कि अग हिंदी या ऐसे विषय पर विदेशी विद्वानों के साथ मिलकर आप कुछ करना चाहते हैं, तो उसके लिए भी सरकार की अनुमति लेनी पड़ेगी."

अपूर्वानंद कहते हैं कि परिसरों में अकादमिक स्वतंत्रता पूरी तरह से ख़त्म हो चुकी है और अगर शिक्षक और छात्र की बातचीत पर भी निगरानी होगी, तो वो भी ख़त्म हो जाएगी.

लेकिन एक दूसरी विचारधारा का यह मानना है कि विश्वविद्यालयों, ख़ासकर सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर कोई ख़तरा नहीं है और विश्वविद्यालयों में अशांति की वजहें कुछ और हैं.

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प्रोफेसर संगीत रागी कहते हैं कि यह बेचैनी उन्हीं विश्वविद्यालयों में है, जो पहले वामपंथ के गढ़ हुआ करते थे.

वे कहते हैं, "आज एक नया बौद्धिक विमर्श खड़ा हो रहा है, वो बात करने की कोशिश कर रहा है, आज उसको ताक़त भी मिल रही है तो आप परेशन हो रहे हैं. कल तक आप अपने काडर को नियुक्त कर देते थे, तो कोई दिक़्क़त नहीं होती थी. आज अगर राइट विंग की तरफ़ झुकाव वाले व्यक्ति को वाइस चांसलर बनाया जा रहा है, तो आपको परेशानी हो रही है."

अपूर्वानंद इस बात से सहमत नहीं हैं कि विश्वविद्यालयों में अशांति और बेचैनी की वजह वामपंथियों का क़ब्ज़ा दक्षिणपंथियों के हाथ में चला जाना है.

वे कहते है, "ऐसा कोई उदाहरण पिछले 70 वर्षों में नहीं है कि दक्षिणपंथी लोग नियुक्त नहीं हुए या वो वाइस चांसलर नहीं बने. यह कहना कि राइट-विंग के लोगों को जगह नहीं मिली, यह एक अजीब सा तर्क है, क्योंकि दिल्ली यूनिवर्सिटी के इतने सारे कॉलेजों में अचानक राइट विंग के लोग कहाँ से सामने आ गए. वे पहले से ही थे वहाँ पर."

उनका मानना है कि अकादमिक बहसों में कौन आगे निकल रहा है, कौन नहीं निकल रहा है, कौन कितनी किताबें लिख रहा है, किसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल रही है, वो अपनी विद्वता और मेधा के स्तर पर भी मिल सकती है.

वे कहते हैं, "षड्यंत्र या चापलूसी करके आप कुलपति बन सकते हैं, लेकिन चापलूसी और षड्यंत्र करके आप अंतरराष्ट्रीय जगत में विद्वान नहीं माने जाएँगे ना? तो अंतरराष्ट्रीय जगत में तो रोमिला थापर ही विदुषी मानी जाती हैं. अगर आप उनके बराबर का कोई विद्वान खड़ा कर दीजिए, तो ठीक है."

अपूर्वानंद के अनुसार सिर्फ़ यह कह देना काफ़ी नहीं है कि हमारे वेदों और पुराणों में सब कुछ था और हमने शून्य का आविष्कार किया. "वेद हों, या महाभारत हो या प्राचीन इतिहास हो, उस पर भी अगर दक्षिणपंथ ने काम नहीं किया, मेहनत नहीं की, पढ़ा नहीं, व्याख्या नहीं की, तो उसके लिए कौन दोषी है. आपको रोका किसने था इतने दिनों तक काम करने से. आप भी अध्यापन कर रहे थे, तो आप भी किताब लिख सकते थे,"

अपूर्वानंद का मानना है कि इन दो इस्तीफों पर नज़र गई क्योंकि ये बड़े नाम हैं. वे कहते हैं कि दिल्ली यूनिवर्सिटी से चर्चित अध्यापक चुपचाप निकल गए हैं, क्योंकि उन्हें घुटन महसूस हो रही थी.

वे कहते हैं, "पिछले छह-सात वर्ष में 90-100 सेमिनार रद्द हुए हैं, क्योंकि माना गया कि वो सुविधाजनक विषय नहीं थे. लोगों को आमंत्रित किया गया और फिर उस आमंत्रण को वापस ले लिया गया. हरियाणा सेंट्रल यूनिवर्सिटी में अँग्रेज़ी विभाग की युवा अध्यापिका स्नेहसता ने महाश्वेता देवी के नाटक का रूपांतर किया, जिसके चलते उन पर जाँच बिठा दी गई. जोधपुर यूनिवर्सिटी में अँग्रेज़ी विभाग के एक अध्यापक ने सेमिनार किया, जिसके चलते वो सस्पेंड हो गई और कई वर्ष सस्पेंड रही."

अशोका यूनिवर्सिटी के ताज़ा मामले ने ये बहस और तेज़ कर दी है कि शिक्षण संस्थाओं में सत्ता का दख़ल बढ़ता जा रहा है, हालाँकि सरकार इन आरोपों से इनकार करती है.

अशोका यूनिवर्सिटी

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अशोका यूनिवर्सिटी की स्थापना 2014 में की गई थी. विश्वविद्यालय के अनुसार उसके कुछ संस्थापकों ने इंडियन स्कूल ऑफ बिजनस (आईएसबी), मेकमाई ट्रिप .कॉम, नौकरी.कॉम, एप्टेक और सन फार्मा जैसे संस्थान स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

अशोका यूनिवर्सिटी का केम्पस हरियाणा के सोनीपत ज़िले के राई में स्थित राजीव गांधी एजुकेशन सिटी में है.

इसकी स्थापना हरियाणा निजी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2006 के तहत की गई थी और ये विश्वविद्यालय यूजीसी से मान्यता प्राप्त है. नवंबर 2014 में इस विश्वविद्यालय को यूजीसी अधिनियम की धारा 22 के तहत डिग्री देने के लिए अधिकृत किया गया था.

विश्वविद्यालय के अनुसार उसकी सभी डिग्रियों को मंज़ूरी दी जा चुकी है.

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