‘येदियुरप्पा फ़ॉर्मूला’ पश्चिम बंगाल, असम, केरल और तमिलनाडु में भी चलेगा या नहीं

  • इमरान क़ुरैशी
  • बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
येदियुरप्पा

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भारतीय जनता पार्टी ने हाल के वर्षों में यूपी और बिहार के विधानसभा चुनावों में बड़े ही आत्मविश्वास के साथ अपनी 'सोशल इंजीनियरिंग' का कमाल दिखाया है.

इस इंजीनियरिंग की मुख्य बात है ओबीसी या एससी ब्लॉक को मज़बूत बनाने वाले छोटे जातीय समूहों को अपनी ओर खींचना, जिससे, मिसाल के तौर पर, यादव नेतृत्व वाला ओबीसी ब्लॉक या जाटव नेतृत्व वाला एससी ब्लॉक कमज़ोर हो जाता है.

इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने यूपी में अपना दल के सोनेलाल लाल पटेल और बिहार में विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी जैसे जाति पर आधारित अनेक छोटे दलों से चुनावी साझीदारी की.

अब पाँच राज्यों के चुनावों में भी पार्टी की रणनीति में सोशल इंजीनियरिंग पर ख़ासा ध्यान दिया जा रहा है.

क्या है येदियुरप्पा फ़ॉर्मूला?

बीजेपी की इस रणनीति को पहली बार आज़माया था कर्नाटक के मौजूदा सीएम और पार्टी के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा ने.

उन्होंने ही उन वर्गों को अपने पाले में लाने की कोशिश शुरू की जिन्हें पिछली कांग्रेस सरकारों में कोई फायदा नहीं मिला था.

इसी नीति की बदौलत येदियुरप्पा 2008 में कर्नाटक में अकेले अपने दम पर बीजेपी को सत्ता में ले आए थे.

इस जीत के साथ दक्षिण में बीजेपी का खाता खुल गया था.

इस रणनीति के तहत येदियुरप्पा ने उत्तरी कर्नाटक के जिलों में एकछत्र राज कर रहे कांग्रेस को ध्वस्त करने के लिए अनुसूचित जाति के मादिगारु समुदाय को अपने पाले में मिलाया. मादिगारु समुदाय संख्याबल में होलेयारु से तो ज्यादा हैं, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक तौर पर उनसे पिछड़े हुए हैं.

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उन्होंने मादिगारु समुदाय की उप-जातियों से आने वाले उम्मीदवार खड़े किए और उन्हें अच्छी तरह संगठित होने में मदद की. फिर उनसे उत्तरी कर्नाटक के सबसे बड़े और वर्चस्व वाले जातीय समुदाय लिंगायतों की मदद करने को कहा गया.

इसके साथ ही येदियुरप्पा ने वादा किया कि इसके बदले लिंगायत सुरक्षित सीटों पर मादिगारु उम्मीदवारों के पक्ष में वोट देंगे. नतीजतन, कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास में पहली बार ज्यादातर सुरक्षित सीटों पर बीजेपी के मादीगारु समुदाय के उम्मीदवार जीते और कांग्रेस की दशकों पुरानी पकड़ खत्म हो गई.

इसके बाद बिहार और यूपी सहित कई राज्यों में इस फ़ॉर्मूले का लगातार कामयाबी के साथ इस्तेमाल होने लगा.

बीजेपी की राज्यवार रणनीति

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इस दौर के विधानसभा चुनाव में अलग-अलग राज्यों में बीजेपी ने अपना मकसद हासिल करने के लिए अलग-अलग पेशकश की है.

केरल में वह चर्च से जुड़ा दशकों पुराना एक विवाद हल करने की कोशिश में लगी है.

तमिलनाडु में इसने अलग-अलग सात उप-जातियों को मिलाकर एक समुदाय बनाने का ऐलान किया है.

वहीं असम में वह कांग्रेस की कमर तोड़ने के लिए उसने चाय बागानों के मजदूरों के लिए कई ऐलान किए हैं.

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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पश्चिम बंगाल में वह पूरे ज़ोर मतुआ वोटरों को अपनी ओर खींचने में लगी है. मतुआ संप्रदाय के लोग बांग्लादेश से आए शरणार्थी हैं. बड़ी तादाद में मतुआ लोगों के पास भारतीय नागरिकता नहीं है. बीजेपी ने कहा था कि वे धैर्य रखें, सत्ता में आते ही वह उन्हें भारत की नागरिकता दिलाएगी.

जाने-माने चुनाव विश्लेषक और सेंटर ऑफ स्टडीज़ ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के पूर्व निदेशक डॉ. संजय कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा, " बीजेपी के इन ऐलानों से पता चलता है कि वह किस कदर अपनी सोशल इंजीनियरिंग को लागू करने में जुटी हुई है. वह कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती. यह बिल्डिंग बनाने जैसा है. आप ऊपर से नीचे नहीं बना सकते. आपको नीचे से शुरुआत करनी पड़ेगी. बीजेपी की राजनीति को मैं इसी तरह देखता हूं."

लेकिन इस तरह की सोशल इंजीनियरिंग की अपनी सीमाएं भी हैं. तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में बीजेपी इन्हीं सीमाओं से जूझ रही है.

इन राज्यों में 27 मार्च से 29 अप्रैल तक चुनाव होंगे. आइए एक-एक करके राज्यों की राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग की कोशिशों को देखते हैं.

तमिलनाडु

तमिलनाडु में अनुसूचित जाति की आबादी में सात-उपजातियों की संख्या लगभग 27 लाख है.

अनूसूचित जातियों में सबसे अधिक वर्चस्व वाली जातियों के 90 लाख लोगों के बाद यही सात उपजातियां सबसे बड़ी हैं. ये सारी उपजातियां पिछले तीन दशकों से खुद को एक समुदाय 'देवेंद्रकुल वेल्लालार' के तहत रखने की मांग कर रही हैं.

बीजेपी और उसकी साझीदार पार्टी एआईडीएमके ने यह वादा निभाया भी और पिछले सप्ताह लोकसभा में इससे जुड़ा विधेयक पारित कर दिया. इसको लेकर 'देवेंद्रकुल वेल्लालार' नेताओं में उत्साह है.

लेकिन यहाँ एक बड़ा असमंजस भी है, सरकार ने 'देवेंद्रकुल वेल्लालार' समुदाय की एक मांग नहीं मानी है. उपजातियों के इस समूह ने कहा था कि उन्हें अनुसूचित जाति से निकाल कर ओबीसी समुदाय में शामिल किया जाए, लेकिन यह मांग पूरी नहीं हुई.

इसकी वजह क्या है? 1997 में इसी समुदाय के हितों के लिए बनाई गई राजनीतिक पार्टी पुथिया तमिलगम के डॉ. कृष्णस्वामी ने बीबीसी हिंदी में कहा, " पहली बात तो ये कि हमारे लोग किसान और सीमांत खेतिहर हैं. हम सिर पर मैला ढोने वाले या शौचालय साफ़ करने वाले लोग नहीं हैं. अनुसूचित जाति में होना हमारे समुदाय के लोगों की आर्थिक तरक्की में रोड़ा है. यही वजह है कि हमें अनुसूचित जाति की सूची से निकाल कर ओबीसी वर्ग में रखा जाए. हमें सामाजिक गरिमा चाहिए."

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इतिहासकार प्रोफेसर एआर वेंकटचलपति डॉ. कृष्णास्वामी से सहमत हैं. उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, " यह ठीक यूपी की तरह है जहां सारी अनुसूचित जातियों को जाटव मान लिया जाता है. सवाल ये है कि अगर कोई अनुसूचित जातियों की सूची से बाहर आना चाहता है तो क्या दिक्कत है?"

इस मुद्दे के राजनीतिक पहलू पर बात करते हुए प्रोफेसर वेंकटचलपति ने कहा, " बीजेपी ने अपने कार्ड बड़ी होशियारी से खेले हैं. वह तमिलनाडु में उन समुदायों को लेकर चल रही है जो गैर-जाटव और गैर-यादवों की तरह राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली नहीं हैं लेकिन उनका अपना संख्याबल है."

डॉ. कृष्णास्वामी ने कहा कि उनके समुदाय के लोगों को अनुसूचित जाति की लिस्ट से निकाल कर ओबीसी लिस्ट में नहीं डाला गया है, इसकी वजह से वे 'चिढ़े' हुए हैं. उन्होंने बुझे लहजे में कहा, "इस चुनाव में क्या करेंगे इस पर अभी हमें फैसला लेना है.''

देवेंद्रकुल वेल्लार समुदाय को एससी श्रेणी से उठाकर ओबीसी श्रेणी में ले जाना एक आसान राजनीतिक फ़ैसला नहीं होगा. ऐसा करके बीजेपी बतौर ओबीसी आरक्षण का लाभ ले रही जातियों को नाराज़ नहीं करना चाहती क्योंकि आरक्षण के लाभ के नए हक़दार जुड़ जाने से उनके अवसर कम होंगे.

केरल

केरल में आबादी का धार्मिक बँटवारा बीजेपी के आगे बढ़ने की राह में सबसे बड़ी अड़चन बनी हुई है. यहां 48 फीसदी आबादी मुसलमानों और ईसाइयों की है.

राज्य में हमेशा सीपीएम की अगुआई वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) और कांग्रेस की अगुआई वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ़) बारी-बारी से सत्ता में आते हैं.

पांच साल एक गठबंधन तो पांच साल दूसरा गठबंधन गद्दी पर बैठता है.

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केरल के चुनावी मैदान में इस बार बीजेपी ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी है. कैसा रहेगा प्रदर्शन?

केरल में भी बीजेपी ने अपना दांव खेला है. राज्य में बीजेपी के अध्यक्ष श्रीधरन पिल्लई को यहां चर्च से जुड़े 400 साल पुराने विवाद में दखल देने में राजनीतिक फ़ायदा दिख रहा है क्योंकि इससे ईसाइयों का एक तबक़ा उसके साथ आ सकता है.

2017 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने मालांकारा चर्च के दो गुटों में से एक को भारी मुश्किल में डाल दिया है.

कोर्ट ने फैसला दिया है कि मालांकारा चर्च के जैकोबियन धड़े को अपने चर्च को ऑर्थोडोक्स धड़े को सौंप देना चाहिए. दोनों धड़ों के बीच इस बात को लेकर झगड़ा चल रहा है कि आखिर उस चर्च का प्रमुख कौन होगा जिसके मातहत सब होंगे.

जैकोबियन धड़े के लोग पैट्रिआर्क ऑफ एंटोस और ऑल द ईस्ट में विश्वास करते हैं क्योंकि पैट्रिआर्क का मानना है कि अपोस्टोलिक परंपरा में उत्तराधिकार सेंटर पीटर के ज़रिए मिलता है. जबकि ऑर्थोडॉक्स गुट मेट्रोपोलिटन को रिपोर्ट करने में विश्वास करता है, जो कोट्टायम में है.

पिल्लई की इस पहलकदमी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए दोनों धड़ों से बात की. इसके बाद आरएसएस के बड़े नेता मनमोहन वैद्य ने कोच्चि में विवाद में उलझे धड़ों से बात की.

इससे पहले संघ के इतने बड़े पदाधिकारी ने चर्च के प्रतिनिधियों से इस तरह की मुलाकात नहीं की थी.

धीरे-धीरे राज्य में यह चर्चा ज़ोर पकड़ने लगी कि अगर यूडीएफ सत्ता में आ गया तो लव जिहाद शुरू हो जाएगा और ईसाई शिक्षण संस्थानों की तुलना में मुस्लिम शिक्षा संस्थानों को तवज्जो मिलने लगेगी.

बीजेपी नेताओं के केरल दौरे और ईसाई धार्मिक नेताओं से मुलाकात ने ईसाई धड़े के नेताओं को उत्साहित कर दिया. इन्हीं मुलाकातों में यह प्रस्ताव आया कि जैकोबियन धड़े के नेता दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मिलें.

जैकोबियन चर्च के चार बिशप दिल्ली पहुंचे लेकिन अमित शाह के व्यस्त होने की वजह से उनसे मुलाकात नहीं हो पाई. उनमें से एक ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बीबीसी हिंदी को बड़े बुझे मन से बताया कि सब लोगों को निराश होकर वापस लौटना पड़ा.

पश्चिम बंगाल

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पश्चिम बंगाल की गद्दी के लिए बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा मुकाबले को 'महायुद्ध' कहा जा रहा है.

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने मतुआ और नमोशूद्र समुदाय के वोटरों पर भरोसा किया था. दोनों समुदाय के लोगों की जड़ें पूर्वी बंगाल में हैं. लेकिन विभाजन के दौरान और बांग्लादेश बनने के बाद, बड़ी तादाद में उधर के लोग अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करके भारत की सीमा के अंदर आ गए.

मतुआ समुदाय में वो सब कुछ है, जिसकी वजह से बीजेपी उन्हें अपनी ओर खींच सकती है.

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बंगाल चुनाव: वामपंथी दल किस हाल में हैं और क्या है चुनावी रणनीति?

इसमें यह पहलू भी शामिल है वे मुस्लिम बहुल इलाकों को छोड़कर भारत आए हिंदू हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि ये लोग भारत आने के बाद पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में फैल गए. इससे लगभग 60 से 70 विधानसभा क्षेत्रों में उनके वोट निर्णायक बन गए हैं.

मतुआ और नमोशूद्र समुदायों को अपने पाले में करने की बीजेपी की स्ट्रेटजी कामयाब रही है. इनकी बदौलत 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने 18 सीटें जीत लीं, जो कि तृणमूल के 22 के आंकड़े के बहुत नज़दीक है.

मतुआ वोटरों को जो चीज सबसे ज्यादा लुभा रही है वह है उन्हें नागरिकता देने का वादा. बीजेपी कह रही है कि सत्ता में आए तो मतुआ वोटरों को भारतीय नागरिता मिलेगी.

बीजेपी ने मतुआ माता (वीणापाणि देवी) के पोते और ऑल इंडिया मतुआ महासंघ के अध्यक्ष शांतनु ठाकुर को लोकसभा चुनाव में टिकट दिया था और वे बनगांव से जीत भी गए थे.

मतुआ महासंघ के कार्यकारी अध्यक्ष सुकृति रंजन विश्वास ने कहा, " 2014 में कोई और नहीं बल्कि खुद प्रधानमंत्री ने हमें नागरिकता देने का वादा किया था. लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है."

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पश्चिम बंगाल में बीजेपी-टीएमसी के बीच तीखी बयानबाज़ी चल रही है.

राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी ने बीबीसी हिंदी से कहा, " यह सच है कि मतुआ वोटर इस बार परेशान हैं. जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह यहां आकर मतुआ महासंघ के मुख्यालय ठाकुरनगर पहुंचे तो वे उम्मीद कर रहे थे कि नागरिकता पर कोई साफ संकेत मिलेगा. लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा."

लेकिन बीजेपी सांसद शांतनु ठाकुर ने बीबीसी हिंदी से कहा, " मतुआ वोटरों ने कभी यह मांग नहीं रखी कि उन्हें चुनाव से पहले ही नागरिकता दे दी जाए. मतुआ वोटरों को इससे कोई दिक्कत नहीं है. मुख्य मुद्दा यह है कि नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) आ चुका है. हम इससे खुश हैं. यह सिर्फ वक्त की बात है. हमारी आबादी डेढ़ करोड़ है इसलिए बीजेपी ने नागरिकता को अहमियत दी है."

लेकिन मतुआ महासंघ के अध्यक्ष सुकृति रंजन विश्वास इससे इत्तेफाक नहीं रखते. वह कहते हैं, " हमारे समुदाय के लोगों को समझ में आ गया है कि नागरिकता मिलना अब संभव नहीं है. 2019 में इसे लेकर जो उत्साह था वह अब ठंडा पड़ता दिख रहा है."

लेकिन मतुआ लोगों को नागरिकता दिए जाने के सवाल पर एक दूसरा मत भी है.

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बंगाल चुनाव में बीजेपी-टीएमसी को टक्कर दे पाएगी लेफ्ट?

मिदनापुर स्थित विद्यासागर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर उज्जैन भट्टाचार्य कहते हैं, " इस बार मतुआ वोटर बीजेपी को वोट देंगे या नहीं कहा नहीं जा सकता क्योंकि पश्चिम बंगाल में इन्हें नागरिकता दी गई तो असम में बंगाली हिंदुओं को नागरिकता देनी होगी. वहां उनके पास नागरिकता नहीं है. यह बात तो पता ही है कि असमिया लोग बंगाली हिंदुओं को नागरिक बनाए जाने से खुश नहीं होंगे."

प्रोफेसर भट्टाचार्य कहते हैं कि बीजेपी की दुविधा साफ़ दिख रही है. राजनीतिक टिप्पणीकार शिखा मुखर्जी उनके इस नजरिये से इत्तेफाक रखती हैं.

शिखा मुखर्जी कहती हैं, "बंगाल के बारे में एक चीज़ ध्यान रखनी चाहिए. यहां जाति तो है लेकिन कास्ट की कोई वोट बैंक पॉलिटिक्स नहीं है. बीजेपी के लिए यह बड़ी चुनौती है."

वे कहती हैं, "यही वजह है कि बीजेपी ने यह कहकर सेफ गेम खेला है कि सीएए राज्य सरकार लागू करेगी जबकि यह सब जानते हैं कि यह केंद्र का कानून है".

असम

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पूर्वोत्तर के इस राज्य में भी बीजेपी ने अपने पत्ते बड़े होशियारी से खेले हैं लेकिन पार्टी कई चुनौतियों से घिरी है.

2014 में लोकसभा चुनाव में उसने ओबीसी समुदायों- मोरान, मटक, ताई, चुटिया, कोच और राजबंशी को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का वादा किया था. 2016 के विधानसभा चुनावों में भी इसने बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ़) के साथ गठजोड़ कर सत्ता हासिल कर ली थी.

2019 के लोकसभा चुनाव में सीएए इसके चुनावी अभियान का मुख्य नारा था. असम में 34 फीसदी आबादी मुसलमानों की है. इसमें ''अवैध प्रवासी'' भी जुड़े हुए हैं. इनमें बांग्लादेश से आए हिंदू भी हैं और मुसलमान भी.

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पीएम मोदी बोले- देश को बदनाम करने वाले भारत की चाय को भी नहीं छोड़ रहे

गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर अखिल रंजन दत्ता ने बीबीसी हिंदी को बताया, " दूसरे राज्यों की तरह बीजेपी ने असम में हिंदुत्व का मुद्दा नहीं छेड़ा. इसने यहां अब तक हर चुनाव में अपने अभियानों के बारे में बात की. और किसी भी चुनाव में पुराना मुद्दा नहीं दोहराया. इस बार पूरा फोकस चाय बागानों में काम करने वाली जनजातियों पर है. कभी यही लोग कांग्रेस के वोट बैंक हुआ करते थे."

असम की आबादी में चाय बागानों में काम करने वाली जनजातियों की संख्या 20 फीसदी है. लगभग 40 विधानसभा क्षेत्रों में इनकी खासी आबादी है. मुस्लिमों को साथ मिलाकर इन्हें ''अली-कुली'' कहा जाता है. अली मुसलमानों के लिए और कुली चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए.

लेकिन बीजेपी ने कांग्रेस के इस वोट बैंक में भी सेंध लगा दी. बीजेपी ने चाय बागान में काम करने वाली महिला श्रमिकों के नाम से आठ लाख बैंक खाते खुलवाए. प्राइमरी हेल्थ सेंटर खोले और उन्हें आकर्षित करने के लिए कई कदम उठाए. बीजेपी के इन कदमों की वजह से 2019 में बीजेपी की सीटें बढ़ गई हैं. जबकि 2014 में इसके पास लोकसभा की सिर्फ सात सीटें थीं.

कांग्रेस के सांसद गौरव गोगोई ने बीबीसी हिंदी से कहा, " चाय बागान के श्रमिक बीजेपी से काफी नाराज हैं. सरकार ने उन्हें दिहाड़ी 217 रुपये करने का वादा किया था लेकिन अब भी उन्हें इससे 50 रुपये कम मिल रहे हैं. बीजेपी ने समाज को बांटने के लिए सीएए का इस्तेमाल किया. अब यह सीएए पर एक शब्द भी नहीं बोल रही है."

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असम के चाय मज़दूरों के कैसे हालात हैं?

गोगोई ने बीजेपी के गठबंधन सहयोगियों की ओर इशारा करते हुए कहा, देखिए बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ़) कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन में शामिल हो गया है. इस गठबंधन में मौलाना बदरुद्दीन अजमल की अगुआई वाला ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआइयूडीएफ़) भी शामिल है.

बीपीएफ़ के नेता प्रवीण बोड़ो कहते हैं, " बीजेपी ने हमें बोडो टेरिटरियल काउंसिल (बीटीसी) के चुनावों में धोखा दिया. हमारे पास 17 सीटें थीं लेकिन बीजेपी ने दूसरे धड़े के साथ गठजोड़ कर काउंसिल पर कब्जा कर लिया''.

लेकिन असम के बीजेपी अध्यक्ष रंजीत दास का कहना है कि उनकी पार्टी की सरकार ने अपने वादे पूरे किए हैं. उन्होंने कहा, " छह ओबीसी समुदायों को अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल करने की प्रक्रिया जारी है. हमारा वादा है, हम इसे पूरा करेंगे. हमने चाय बागानों के श्रमिकों के लिए काफी काम किया है. जिन लोगों ने सीनियर सेकेंडरी की परीक्षा डिस्टिंक्शन के साथ पास की है, उन्हें टू-व्हीलर्स दिए गए".

कुल मिलाकर, बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति की कामयाबी और सीमाएँ दोनों दिख रही हैं, नतीजे बताएँगे कि कौन सा कार्ड चला, और कौन सा कार्ड चुक गया.

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