नरेंद्र मोदी का ओराकांडी दौरा: कौन हैं मतुआ लोग जिन्हें बंगाल चुनाव का निर्णायक फैक्टर बताया जा रहा है

ओराकांडी ठाकुरबाड़ी

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ओराकांडी ठाकुरबाड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

जब पश्चिम बंगाल के लोग राज्य विधानसभा के लिए हो रहे चुनावों के पहले चरण में वोट डाल रहे थे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पड़ोसी देश बांग्लादेश के दौरे पर थे.

ये दौरा इसलिए भी ख़ास है क्योंकि बांग्लादेश अपनी आज़ादी की 50वीं सालगिरह मना रहा है.

बंगबंधु कहे जाने वाले शेख मुजीबुर रहमान की कब्र के अलावा मोदी इस यात्रा के दौरान शनिवार को ओराकांडी के ठाकुरबाड़ी भी गए.

बांग्लादेश के गोपालगंज ज़िले के काशियानी पुलिस स्टेशन के अंतर्गत पड़ने वाला ओराकांडी ठाकुरबाड़ी को हिंदुओं के मतुआ समुदाय के लोग अपना तीर्थ स्थल मानते हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल चुनाव को देखते हुए नरेंद्र मोदी मतुआ मतदाताओं का दिल जीतने के लिए ओराकांडी गए. इस साल के पश्चिम बंगाल चुनाव में मतुआ समुदाय का वोट महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.

ओराकांडी में नरेंद्र मोदी ने कहा, "किसने सोचा था कि भारत का प्रधानमंत्री कभी ओराकांडी आएगा. मैं आज वैसा ही महसूस कर रहा हूं, जो भारत में रहने वाले 'मॉतुवा शॉम्प्रोदाई' के मेरे हजारों-लाखों भाई-बहन ओराकांडी आकर जो महसूस करते हैं. मैं आज यहां आया तो मैंने उनकी तरफ से भी इस पुण्य भूमि को चरण स्पर्श किया है."

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ओराकांडी ठाकुरबाड़ी

कौन हैं मतुआ लोग और ओराकांडी से उनका क्या संबंध है?

मतुआ संप्रदाय के लोगों को हिंदुओं की वर्ण व्यवस्था में निचले पायदान से जोड़कर देखा जाता है. मतुआ लोग पारंपरिक हिंदू समुदाय के एक विशेष संप्रदाय हैं, जो हरिचंद ठाकुर को अपना देवता मानते हैं.

हरिचंद ठाकुर के बारे में ही ये माना जाता है उन्होंने मतुआ समुदाय की नींव रखी थी. उनका जन्म लगभग 210 साल पहले गोपालगंज (अब बांग्लादेश) के ओरकांदी में हुआ था. मतुआ सिद्धांत बाद में उनके बेटे गुरुचंद ठाकुर के माध्यम से फैल गया.

ओराकांडी में हरिचंद ठाकुर और गुरुचंद ठाकुर के निवास और आसपास के क्षेत्र को मतुआ लोग पवित्र स्थान मानते हैं. मतुआ लोगों का का मुख्य मंदिर भी यहाँ स्थित है.

काशियानी उपज़िला परिषद के अध्यक्ष सुब्रत ठाकुर हरिचंद ठाकुर के वंशज भी हैं.

वे बताते हैं, "हरिचंद ठाकुर और गुरुचंद ठाकुर का 'लीलाक्षेत्र', यानी जहाँ वे रहते थे, उपदेश देते थे, उनका कार्यस्थल था. मतुआ लोगों के लिए ये तीर्थ स्थान है."

मतुआ लोग कैसे भारत में फैल गए

हालांकि मतुआ आंदोलन मुख्य रूप से ओरकांदी के आस-पास ही केंद्रित था लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कहा कि 1947 में भारत की आज़ादी और 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के बाद अलग-अलग समय में बड़ी संख्या में मतुआ लोग भारत आ गए.

भारत की स्वतंत्रता के बाद आम लोगों के साथ-साथ मतुआ समुदाय के नेताओं ने बड़ी संख्या में अपने शिष्यों के साथ भारत की ओर प्रस्थान किया और नॉर्थ चौबीस परगना ज़िले के ठाकुरनगर में अपना धार्मिक केंद्र स्थापित किया.

सुब्रत ठाकुर बताते हैं कि उनके पिता के भाइयों में से एक 1947 में भारत की आज़ादी के बाद पश्चिम बंगाल चले गए, जिनके उत्तराधिकारी अब मतुआ समुदाय के नेताओं के रूप में वहां की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.

कई स्थानीय मतुआ लोगों से बात करने पर पता चलता है कि उनके कई रिश्तेदार भारत चले गए और कई साल पहले वहां बस गए. हाल के वर्षों में मतुआ लोगों का बांग्लादेश से भारत पलायन हुआ है.

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बंगाल चुनाव और मोदी का ओराकांडी दौरा

भारत में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मतुआ समुदाय और उनके नेता आज़ादी के बाद से राजनीति में सक्रिय हैं. पश्चिम बंगाल में एक समय इन मतुआ लोगों के ज़्यादातर वोट वामपंथी पार्टियों या तृणमूल कांग्रेस के पास गए लेकिन 2019 के चुनाव के समय स्थिति बदल गई.

उस समय, मतुआ लोगों का एक वर्ग तृणमूल कांग्रेस के साथ था और एक अन्य तबका शांतनु ठाकुर की अगुवाई में भाजपा के साथ था. शांतनु ठाकुर भाजपा के टिकट पर संसद सदस्य बने.

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ओराकांडी ठाकुरबाड़ी में हरिचंद ठाकुर के जन्मदिन पर भक्त स्नान करते हैं

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ओराकांडी ठाकुरबाड़ी के इलाके में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के कार्यक्रम को देखते हुए प्रशासन ने कई विकास कार्य कराए

माना जा रहा है कि मतुआ लोगों का एक बड़ा वर्ग इस बात से निराश है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम को भाजपा ने अपने वादे के मुताबिक़ लागू नहीं किया. इसलिए नरेंद्र मोदी के ओरकांदी ठाकुरबाड़ी जाने को मतुआ लोगों का दिल जीतने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

कोलकाता में रहने वालीं राजनीतिक विश्लेषक तपश्री गुप्ता ने बीबीसी बांग्ला सेवा को बताया कि "इस बार का पश्चिम बंगाल चुनाव इतना कठिन होगा कि मतुआ वोट कई निर्वाचन क्षेत्रों में निर्णायक हो सकता है."

पश्चिम बंगाल के 294 विधानसभा क्षेत्रों में से 14 के परिणाम काफी हद तक मतुआ वोटों पर निर्भर करते हैं और कुल 60 से 70 विधानसभाओं में 5 से 10 हजार मतुआ मतदाता हैं, जिन्हें इस साल के चुनावों का निर्णायक फैक्टर कहा जा रहा है.

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