यूपी: 'जूतामार होली' की वजह से शाहजहांपुर में ढक दी गईं मस्जिदें

  • समीरात्मज मिश्रा
  • बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
शाहजहांपुर में ढंकी हुई मस्जिद
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शाहजहांपुर में ढंकी हुई मस्जिद

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर ज़िले में 'जूतामार' होली की एक अनोखी परंपरा चली आ रही है जिसमें क़रीब आठ किमी लंबा 'लाट साहब' का जुलूस निकलता है.

किसी तरह का कोई विवाद न होने पाए, इसलिए प्रशासन ने जुलूस के रास्ते में पड़ने वाली दर्जनों मस्जिदों और मज़ारों को तिरपाल से ढक दिया है. मस्जिदों को ढकने का काम पिछले कई सालों से होता आ रहा है.

होली के दिन शहर में लाट साहब के दो जुलूस निकलते हैं. मुख्य लाट साहब जुलूस क़रीब आठ किमी लंबा होता है जिसे तय करने में तीन घंटे से ज़्यादा समय लगता है.

जुलूस में एक व्यक्ति को लाट साहब के रूप में भैंसा गाड़ी पर बैठाया जाता है और फिर उसे जूते और झाड़ू मारते हुए पूरे शहर में घुमाया जाता है.

इस दौरान शहर के आम लोग भी लाट साहब को जूते फेंक कर मारते हैं. इसी तरह एक दूसरा छोटा लाट साहब जुलूस भी उसी दिन निकलता है.

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इस दौरान सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने न पाए, इसके लिए पुलिस और प्रशासन ने रास्ते में पड़ने वाले धर्मस्थलों, ख़ासकर मस्जिदों और मज़ारों को प्लास्टिक और तिरपाल से ढक दिया है और रास्ते भर में पुलिस बलों की तैनाती कर रखी है.

शाहजहांपुर के नगर पुलिस अधीक्षक संजय कुमार कहते हैं, "जुलूस के रास्ते में आने वाले क़रीब 25 मस्जिदों और मज़ारों को प्रशासन अपने ख़र्च पर ढक दिया है ताकि माहौल ख़राब करने के लिए कोई असामाजिक तत्व रंग या फिर कुछ और न फेंकने पाए.''

वो कहते हैं, ''हालांकि कभी यहां जुलूस की वजह से कोई तनाव नहीं हुआ है और न ही कोई ऐसी घटना हुई है लेकिन फिर भी एहतियात के तौर पर ऐसा हर साल किया जाता है. यह क़रीब आठ-दस साल से होता आ रहा है."

जुलूस के रास्ते में छह बड़ी मस्जिदों के अलावा कई छोटी मस्जिदें और कुछ मज़ारें पड़ती हैं.

दो दिन पहले ज़िले के आला अधिकारियों की स्थानीय लोगों के साथ बैठक हुई जिसमें सौहार्द बनाए रखने पर चर्चा हुई.

बरेली परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक राजेश कुमार पांडेय का कहना था कि मस्जिद के मौलवी और इलाक़े के मुस्लिम समुदाय के लोग प्रशासन की इस पहल का स्वागत करते हैं और ख़ुद ही मस्जिदों की सुरक्षा के लिए उन्हें ढकने को कहते हैं.

उनके मुताबिक, "शहर में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बल, पीएसी और कई ज़िलों की पुलिस फ़ोर्स भी बुलाई गई है जो मस्जिदों और पूरे शहर की सुरक्षा करेगी. इसके अलावा ड्रोन के ज़रिए भी जुलूस पर नज़र रखी जाएगी."

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शहर में मार्च करते अधिकारी

क्या होता है लाट साहब के जुलूस में?

लाट साहब जुलूस के आयोजकों का कहना है कि पहले इसे नवाब जुलूस कहा जाता था लेकिन बाद में यह लाट साहब जुलूस बन गया.

इस कार्यक्रम के आयोजन से जुड़े संजय वर्मा बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "जुलूस निकालने की परंपरा सौ साल से भी ज़्यादा पुरानी परंपरा है. इसमें एक व्यक्ति बग्घी पर बैठता है जिसे लाट साहब कहते हैं. लाट साहब पूरी सुरक्षा के साथ रहते हैं और कुछ लोग उनकी सुरक्षा में तैनात भी किए जाते हैं.''

जूता मारने की पंरपरा थी लेकिन अब लोग ऐसा कम ही करते हैं. जुलूस कूचा लाला मोहल्ले से निकलकर पहले मंदिर पर आता है फिर सराफ़ा मार्केट से होता हुआ कोतवाली पहुंचता है.

कोतवाली में कोतवाल परंपरा के हिसाब से लाट साहब को सैल्यूट करता है और फिर सदर बाज़ार से विश्वनाथ मंदिर पर होते हुए कूचा लाला पर ही ख़त्म हो जाता है."

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संजय वर्मा बताते हैं कि नवाब साहब या लाट साहब की पहचान गुप्त रखी जाती है और उसे इसके लिए पैसे भी दिए जाते हैं.

संजय वर्मा के मुताबिक यह राशि कम से कम 11 हज़ार होती है लेकिन कई बार लाख-दो लाख तक पहुंच जाती है.

एक स्थानीय नागरिक राशिद कमाल कहते हैं कि लाट साहब या फिर नवाब साहब किसी ग़रीब मुसलमान को बनाया जाता है और उसके ऊपर जूते बरसाए जाते हैं.

आयोजकों की ओर से उनकी पहचान गुप्त रखी जाती है.

संजय वर्मा कहते हैं, "यह ज़रूरी नहीं है कि किसे बनाया जाएगा लेकिन जिसे भी लाट साहब के रूप में बग्घी पर बैठाते हैं उसकी पहचान सार्वजनिक नहीं की जाती है. यह भी ज़रूरी नहीं है कि लाट साहब यहीं का होगा बल्कि बाहर के ही किसी व्यक्ति को अक़्सर बनाया जाता है.''

''होली के दो-तीन पहले से लेकर दो-तीन दिन बाद तक उसके रहने और खाने-पीने का इंतज़ाम भी आयोजकों की ओर से ही किया जाता है. पहचान गुप्त रखने का मक़सद सिर्फ़ यही है कि कोई उसका मज़ाक न उड़ा सके."

'अतीत में हो चुका है तनाव'

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पुलिस अब तक किसी सांप्रदायिक तनाव की बात से इनकार करती है लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार तनाव की स्थितियां आ चुकी हैं.

स्थानीय पत्रकार सुशील शर्मा कहते हैं, "इस जुलूस में भारी भीड़ होती है, हुड़दंग होता है. कई बार ऐसा हुआ है जब मस्जिद में लोगों ने रंग डाल दिया और विवाद की स्थिति पैदा हो गई. कई बार कुछ असामाजिक तत्वों ने भीड़ का फ़ायदा उठाते हुए मस्जिद पर जूते भी फेंक दिए. ऐसी घटनाओं के बाद ही जुलूस के रास्ते में पड़ने वाली क़रीब 40 मस्जिदें पूरी तरीके से ढक दी जाती हैं."

सुशील शर्मा कहते हैं कि होली के मौक़े पर निकलने वाले इस जुलूस में लाट साहब को भैंसा गाड़ी पर बीच में कुर्सी पर बैठा दिया जाता है और उन्हें हेलमेट पहना दिया जाता है. शर्मा बताते हैं कि लाट साहब पर फेंकने के लिए लोग अपने घरों में साल भर फ़टे-पुराने जूते-चप्पल इकट्ठा करके रखते हैं.

फ़िलहाल जुलूस को शांतिपूर्ण तरीक़े से निकालने के लिए ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक रोज़ाना समीक्षा कर रहे हैं और थाना स्तर पर पीस कमेटी की बैठकें आयोजित की जा रही हैं.

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