पश्चिम बंगाल चुनाव: क्या ममता बनर्जी को नंदीग्राम में घेरने में कामयाब रही बीजेपी?

  • प्रभाकर मणि तिवारी
  • नंदीग्राम (पश्चिम बंगाल) से, बीबीसी हिन्दी के लिए
ममता बनर्जी

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"ममता बनर्जी पाँच दिनों के लिए यहीं जमी हैं, लेकिन उनका जीतना मुश्किल है. उन्होंने इलाक़े के विकास के लिए तो कुछ काम किया ही नहीं, उल्टे नंदीग्राम के लोगों पर हमला करने का झूठा आरोप लगा दिया."

पश्चिम बंगाल की सबसे हाई प्रोफ़ाइल सीट बनी नंदीग्राम के रेयापाड़ा इलाक़े में रहने वाले बीरेन माइती यही दावा करते हैं.

हालांकि ममता ने चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन भांगाबेड़िया से सोनाचूड़ा तक क़रीब तीन किलोमीटर लंबी जो पदयात्रा की, उसमें शामिल मोहम्मद युसूफ़ और धीरेन दास कुछ अलग ही दावे करते नज़र आये.

युसूफ़ का कहना था कि ''शुभेंदु ग़द्दार हैं. उन्होंने दीदी ही नहीं बल्कि पूरे नंदीग्राम के लोगों के साथ विश्वासघात किया है. इलाक़े में हिंदू-मुसलमान कभी मुद्दा नहीं रहा. लेकिन अबकी चुनाव में पहली बार जाति और धर्म की बात हो रही है.''

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नंदीग्राम में दूसरे चरण में एक अप्रैल को मतदान होना है. उससे पहले ममता और बीजेपी ने यहाँ अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है.

स्थानीय आबादी में क़रीब 27 फ़ीसद मुसलमान हैं और बाक़ी हिंदू.

नंदीग्राम में कुछ देर घूमने और लोगों से बात करने पर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि क़रीब 14 साल भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के ज़रिए पूरी दुनिया में सुर्ख़ियाँ बटोरने वाले इस इलाक़े में धर्म के आधार पर ज़ोरदार ध्रुवीकरण हो चुका है.

इसके अपने ख़तरे हैं और शायद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और इस सीट से टीएमसी उम्मीदवार ममता बनर्जी को भी इस ख़तरे का अंदाज़ा है.

यही वजह है कि वे रविवार से ही रेयापाड़ा स्थित किराये के मकान में डेरा डालकर बैठ गई हैं.

तो क्या बीजेपी ने अपनी रणनीति के तहत ममता को नंदीग्राम में ही घेर लिया है. स्थानीय लोगों से बातचीत से तो ऐसा ही लगता है.

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रेयापाड़ा के सुबोध माइती कहते हैं, "ममता यहां घिर गई हैं. ध्रुवीकरण की वजह से उनकी राह आसान नहीं है. इसलिए उन्होंने पाँच दिनों तक यहां रहकर अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है."

ममता रविवार को नंदीग्राम पहुँचने से लेकर मंगलवार शाम प्रचार ख़त्म होने तक लगातार रोड शो और रैलियां करती रही हैं. इस दौरान उन्होंने अधिकारी परिवार के अलावा बीजेपी पर भी जमकर हमले किए हैं.

मंगलवार को क़रीब तीन किमी लंबी पदयात्रा के बाद सोनाचूड़ा बाज़ार की रैली में भी उन्होंने तमाम आरोप दोहराए और लोगों से ''पैसों के लालच में'' बीजेपी को वोट नहीं देने की अपील की.

सिर पर तपते सूरज के बीच उनकी पदयात्रा और रैली में उमड़ी भीड़ के उत्साह को देखकर यह ग़लतफ़हमी हो सकती है कि ममता के लिए नंदीग्राम में जीत बाएं हाथ का खेल है. रैली में शामिल तमाम लोगों को ममता की फ़ोटो लगी टोपी और टेबल कैलेंडर बांटे जा रहे थे.

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लेकिन सोनाचूड़ा से लगभग 16 किमी दूर रेयापड़ा में ममता बनर्जी के किराये के घर से कुछ ही दूर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रोड शो और उसमें शामिल समर्थकों के जोश से ममता की आसान जीत की ग़लतफ़हमी पलक झपकते दूर हो जाती है.

रैली में शामिल ज़्यादातर महिलाओं ने बीजेपी के चुनाव चिन्ह वाली साड़ी पहन रखी थी और युवकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर वाली बीजेपी की टी शर्ट.

एक महिला नीलमणि माइती बताती हैं, "हमें मोदी जी ने यह साड़ी भिजवाई है. इसे बांटा है हमारे दादा यानी शुभेंदु अधिकारी ने."

एक अन्य महिला नीलमणि मंडल कहती है, "यहाँ इस बार दादा जीतेंगे, दीदी नहीं. ममता ने सिर्फ़ मुसलमानों का विकास किया है, हमारे लिए कुछ नहीं किया."

नंदीग्राम में हाल के दिनों में तेज़ी से बदले समीकरणों ने ही ममता को यहाँ डेरा डालने पर मजबूर कर दिया है.

इससे पहले उनको अपने चुनाव क्षेत्र में कभी इतना ध्यान नहीं देना पड़ा था. यहां घिर जाने की वजह से वे राज्य के दूसरे इलाक़ों में चुनाव प्रचार के लिए नहीं जा पा रही हैं. वे टीएमसी की अकेली स्टार प्रचारक हैं. इसका पार्टी को नुक़सान हो सकता है.

दूसरी ओर, बीजेपी के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, जेपी नड्डा और राजनाथ सिंह समेत प्रचारकों की लंबी सूची है.

ममता के ख़िलाफ़ मैदान में उतरे शुभेंदु अधिकारी पहले ही एलान कर चुके हैं कि अगर उन्होंने ममता को कम से कम पचास हज़ार वोटों के अंतर से नहीं हराया तो राजनीति से संन्यास ले लेंगे.

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उनकी पार्टी यानी बीजेपी ने भी इलाक़े में पूरी ताक़त झोंक दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और बीजेपी प्रमुख जे.पी.नड्डा से लेकर पार्टी के तमाम नेता और अभिनेता इलाक़े में चुनावी सभाएं कर चुके हैं.

चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन मंगलवार को अमित शाह ने भी इस इलाक़े में रोड शो किया.

बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय कहते हैं, "शुभेंदु अधिकारी इस सीट पर ममता को आसानी से पराजित कर देंगे. ममता को ख़ुद भी यहाँ जीत की उम्मीद नहीं है."

उनका आरोप है कि दस साल तक मुख्यमंत्री रहते ममता ने इलाक़े में विकास के नाम पर कुछ भी नहीं किया है. इसलिए लोग चुनाव में उनको सबक सिखाने का इंतज़ार कर रहे हैं. इलाक़े में थोड़ा-बहुत जो विकास हुआ है, वह स्थानीय विधायक के नाते शुभेंदु ने ही किया है.

नंदीग्राम में कौन से मुद्दे ममता के पक्ष में और ख़िलाफ़ जा सकते हैं?

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टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि शुभेंदु ने ममता को सिर्फ़ नंदीग्राम से लड़ने की चुनौती दी थी. उनकी चुनौती स्वीकार कर ममता ने आधी लड़ाई तो पहले ही जीत ली है. यह ममता का मास्टरस्ट्रोक साबित होगा.

टीएमसी के नेताओं का कहना है कि ममता के सत्ता में पहुँचने का रास्ता नंदीग्राम में हुए अधिग्रहण विरोधी आंदोलन से ही निकला था.

ममता अपने चुनाव अभियान के दौरान नंदीग्राम के लोगों से भावनात्मक संबंध मज़बूत करने में कामयाब रही हैं. उन्होंने नंदीग्राम में वर्ष 2007 में हुए आंदोलन को मौजूदा किसान आंदोलन से भी जोड़ दिया है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि नंदीग्राम में 12 फ़ीसदी वोटर मुस्लिम हैं. यहां पीरज़ादा अब्बासी के नेतृत्व वाले इंडियन सेक्यूलर फ्रंट (आईएसएफ) का कोई उम्मीदवार नहीं होने की वजह से अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध की आशंका बहुत कम है.

ममता ने इलाक़े में रहने के लिए हिंदू-बहुल इलाक़े को चुना है और नियमित रूप से मंदिरों में जाती रही हैं. इससे वे यह संदेश देने में कामयाब रही हैं कि वे हिंदू विरोधी नहीं हैं जैसा कि बीजेपी उन पर आरोप लगाती रही है.

लेकिन ममता के ख़िलाफ़ भी कई चीज़ें हैं. मसलन इलाक़े में रोज़गार के अवसर और विकास नहीं होना.

बीजेपी ममता के ख़िलाफ़ इन मुद्दो पर ही ज़्यादा ज़ोर दे रही है. बीजेपी उम्मीदवार शुभेंदु को स्थानीय होने का लाभ मिल सकता है. वे ममता पर लगातार बाहरी होने के आरोप लगाते रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर समीरन पाल कहते हैं, "नंदीग्राम के नतीजे ही सबसे अहम और निर्णायक होंगे. इससे पता चलेगा कि ममता 14 साल बाद भी नंदीग्राम में पहले जैसी ही लोकप्रिय हैं या नहीं, और शुभेंदु के जाने से पार्टी को कितना नुक़सान पहुँचा. लेकिन उसके लिए फ़िलहाल दो मई तक इंतज़ार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है."

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