अनिल देशमुख के ख़िलाफ़ सीबीआई जाँच जारी रहेगी, सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज की अपील

अनिल देशमुख

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महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख के ख़िलाफ़ सीबीआई जाँच जारी रहेगी.

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अनिल देशमुख के ख़िलाफ़ सीबीआई जाँच के आदेश दिए थे जिसको चुनौती देते हुए अनिल देशमुख और महाराष्ट्र सरकार दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एक ख़त लिखकर कहा था कि तत्कालीन गृहमंत्री अनिल देशमुख ने शीर्ष पुलिस अधिकारियों को हर महीने 100 करोड़ रुपए की वसूली का टार्गेट दिया था.

परमबीर पहले सुप्रीम कोर्ट गए और अदालत से अपील की थी कि गृहमंत्री के ख़िलाफ़ सीबीआई की जाँच की जाए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट जाने के लिए कहा.

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मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पांच अप्रैल को गृहमंत्री अनिल देशमुख के ख़िलाफ़ सीबीआई जाँच के आदेश दे दिए. हाईकोर्ट के इस फ़ैसले के बाद अनिल देशमुख ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

लेकिन ख़ुद को बेगुनाह बताते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से राहत की माँग की थी. महाराष्ट्र सरकार भी अनिल देशमुख के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट पहुँची और सर्वोच्च अदालत से गुहार लगाई कि बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगाई जाए.

वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार की तरफ़ से पैरवी की जबकि एक और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अनिल देशमुख का सुप्रीम कोर्ट में बचाव किया.

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सुप्रीम कोर्ट के दो जजों जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हेमंत गुप्ता की खंडपीठ ने दलीलें सुनी.

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में ख़ूब बहस हुई

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख के ख़िलाफ़ उनके राइट हैंड यानी पुलिस कमिश्नर ने आरोप लगाए गए हैं और ये काफ़ी गंभीर हैं.

वहीं सुप्रीम कोर्ट के दो जजों जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हेमंत गुप्ता की खंडपीठ ने सबकी दलीलें सुनी.

बहस के दौरान राज्य सरकार के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सरकार को इस मामले में अपनी राय रखने का मौक़ा नहीं दिया गया. उन्होंने बताया कि इस बारे में जयश्री पाटिल ने 23 मार्च को एक रिट याचिका दायर की थी. यह सूची में शामिल नहीं था और बाद में 31 मार्च को इस पर सुनवाई हुई. सिंघवी ने बताया कि हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद अनिल देशमुख ने तत्काल अपना पद छोड़ दिया था.

इस पर जस्टिस कौल ने कहा, ''जिनके ख़िलाफ़ आरोप लगाए गए वे राज्य के गृहमंत्री थे और आरोप लगाने वाले पुलिस कमिश्नर थे. ये आरोप काफ़ी गंभीर क़िस्म के हैं.'' उन्होंने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने केस की गंभीरता और इस मामले में शामिल लोगों के पद देखते हुए अपना फ़ैसला दिया है.

वहीं अनिल देशमुख ने अपने वकील कपिल सिब्बल के ज़रिए अपना पक्ष रखा. सिब्बल ने कहा कि वे अपने निजी अधिकारों के लिए चिंतित हैं क्योंकि आरोप के ​बाद उन पर काफ़ी हमले हुए जिससे उनका काफ़ी नुक़सान हो गया है.

देशमुख के वकील ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने जिस तरह से बिना सुने सीबीआई जाँच के आदेश दिए हैं वह हैरान करने वाला है. अदालत सीबीआई जाँच का आदेश तभी दे सकती है जब मेरे ख़िलाफ़ कोई ठोस आधार हो. लेकिन सबने देखा कि हमारे ख़िलाफ़ कोई सबूत भी नहीं था तब भी ऐसा फ़ैसला दिया गया. यहां तक कि मुझे अपनी दलीलें पेश करने का मौक़ा दिए या सुने बिना ही ऐसा किया गया. यहां तक कि बिना नोटिस दिए ही इतना बड़ा नुक़सान कर दिया गया.

इसके बाद जस्टिस कौल ने साफ़ किया कि यह मामला राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का नहीं है. यह समझना होगा कि इस मामले में दो बड़ी शख्सियतें शामिल हैं. अनिल देशमुख के ख़िलाफ़ उनके ​किसी दुश्मन ने नहीं बल्कि उनके अत्यंत क़रीबी अधिकारी ने ये आरोप लगाए हैं. इसलिए दोनों के ख़िलाफ़ जाँच होनी चाहिए.

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