कूच बिहार: वो कौन से फ़ैक्टर हैं जिनके आधार पर बीजेपी का पलड़ा पड़ सकता है भारी?

  • भूमिका राय
  • बीबीसी संवाददाता, कूच बिहार (पश्चिम बंगाल)
कूच बिहार, पश्चिम बंगाल

इमेज स्रोत, BHOOMIKA/BBC

इमेज कैप्शन,

कूच बिहार की नौ विधानसभा सीटों का फ़ैसला 23 लाख 41,138 मतदाता करेंगे

कूच बिहार को लेकर चर्चा तो उसी समय शुरू हो गई थी जब गृहमंत्री अमित शाह ने यहां परिवर्तन रैली की थी. लेकिन जैसे-जैसे मतदान की तारीख़ क़रीब आती जा रही है हर रोज़ कुछ न कुछ ऐसा दिख रहा है जिससे ये चर्चा और पुख़्ता होती जा रही है.

बुधवार शाम को हमारे होटल के नीचे वह गाड़ी आकर खड़ी हुई जिसकी बायीं ओर का शीशा टूटा हुआ था. पूछने पर पता चला कि यह बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की गाड़ी है और उन पर हमला हुआ है. कुछ ही देर में होटल में स्थानीय नेताओं का जमघट था. जिस फ़्लोर पर दिलीप घोष रुके वहां काफ़ी सुरक्षाकर्मी तैनात थे.

कूच बिहार में 10 अप्रैल को वोट डाले जाने हैं, लेकिन एक अप्रैल से ही यहां के लगभग हर होटल के सभी कमरे बुक हैं. मतदान होने तक यहां किसी भी होटल का कोई कमरा ख़ाली नहीं है. किसी होटल में बीजेपी के कार्यकर्ता और नेता ठहरे हुए हैं तो किसी में टीएमसी के, तो किसी में चुनाव आयोग के कर्मचारी हैं. इसके अलावा मीडिया का भी जमावड़ा यहां है.

नौ विधानसभा सीटों वाले कूच बिहार ज़िले के महत्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि मतदान के चार दिन पहले प्रधानमंत्री ने यहां का दौरा किया. उसी दिन ममता बनर्जी भी ज़िले में मौजूद रहीं. उन्होंने तो रात इसी ज़िले में बिताकर अगले दिन भी कई जनसभाएं कीं.

अगर चुनावी झंडों और लाउडस्पीकर की आवाज़ से अंदाज़ा लगाने को कहा जाए तो न तो प्रचार करने में बीजेपी ने कोई कसर छोड़ी है और न ही टीएमसी ने. हर पाँच से दस किलोमीटर की दूरी पर संबंधित पार्टियों के स्थायी-अस्थायी दफ़्तर देखने को मिल जाएंगे.

लेफ़्ट की सहयोगी पार्टी फ़ॉरवर्ड ब्लॉक के बाघ की आकृति वाले लाल झंडे भी ज़िले में दिखते हैं.

इमेज स्रोत, BHOOMIKA/BBC

इमेज कैप्शन,

कूच बिहार में राजनीतिक हिंसा नई नहीं है, लेकिन चुनावों के समय इसमें तेज़ी आई है

सबका दावा कि हम जीतेंगे

ज़िले की नौ विधानसभा सीटों का फ़ैसला 23 लाख 41,138 मतदाता करेंगे. इनमें से 12 लाख 15,938 पुरुष हैं जबकि 11 लाख 25,182 महिलाएं हैं. ज़िले की पाँच सीटें सुरक्षित एससी कैटेगरी के तहत आती हैं.

2016 के विधानसभा चुनाव में इस ज़िले में 85.66 फ़ीसद मतदान हुआ था जो 2014 के लोकसभा चुनाव से दो फ़ीसद ज़्यादा था.

साल 2016 के चुनाव में टीएमसी ने नौ में से आठ सीटों पर जीत दर्ज की थी और एक सीट फ़ॉरवर्ड ब्लॉक के हिस्से गई थी. हालांकि वोट प्रतिशत का अंतर किसी भी सीट पर बहुत अधिक नहीं था. मेखलीगंज सीट पर तो विजयी रही टीएमसी और दूसरे स्थान पर रही फ़ॉरवर्ड ब्लॉक के बीच सिर्फ़ छह हज़ार वोटों का ही अंतर था.

हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी किसी भी सीट पर दूसरे स्थान पर तक नहीं थी. लेकिन इस बार वह इन नौ सीटों में कम से कम आठ सीटें जीतने का दावा कर रही है.

इमेज स्रोत, SANJAY DAS/BBC

इमेज कैप्शन,

निशिथ प्रामाणिक कूच बिहार से बीजेपी के लोकसभा सांसद हैं. वो विधानसभा चुनाव में भी दीनहाटा सीट से पार्टी के उम्मीदवार हैं.

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
पॉडकास्ट
दिन भर

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

ड्रामा क्वीन

समाप्त

बीजेपी के प्रत्याशी निशिथ प्रामाणिक कहते हैं, "बीजेपी इस बार पूरी तरह आ रही है. जनता बीजेपी को वोट देगी. सिर्फ़ एक या दो सीटों पर टक्कर है, लेकिन हम जीत रहे हैं."

वहीं टीएमसी का दावा है कि वो इस बार पूरे ज़िले में क्लीन-स्वीप करेगी.

टीएमसी नेता रबिंद्र नाथ घोष का कहना है कि बीजेपी न मज़बूत थी और न है. 2019 के लोकसभा चुनाव में 35 फ़ीसद लेफ़्ट वोट बीजेपी को चला गया था. इस बार हम नौ में नौ सीटें जीत रहे हैं.

वहीं 2016 में दूसरे नंबर की पार्टी लेफ़्ट का कहना है कि इस बार टीएमसी कहीं है ही नहीं. इस बार का मुक़ाबला सिर्फ़ लेफ़्ट और बीजेपी के बीच है.

फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता दीपक सरकार कहते हैं, "बीजेपी भले ही कह रही हो कि उसे समर्थन मिल रहा है लेकिन ऐसा नहीं है."

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राज्य में कुल 18 सीटें हासिल की थीं. और इसकी ख़ास बात यह थी इसमें से सात सीटें उत्तर बंगाल से थीं. कूच बिहार ज़िले की बात करें तो यहां की एकमात्र लोकसभा सीट पर बीजेपी ने ही जीत दर्ज की थी.

निशिथ प्रामाणिक कूच बिहार से बीजेपी के लोकसभा सांसद हैं. वो विधानसभा चुनाव में भी दीनहाटा सीट से पार्टी के उम्मीदवार हैं.

बीजेपी का दावा है कि जनता बदलाव चाहती है. उसका यह भी दावा है कि वो कूच बिहार में आठ सीटों पर आराम से जीत रही है, जबकि एक सीट पर उसे थोड़ी चुनौती मिल सकती है लेकिन वो वहां भी कामयाब होंगे.

बीजेपी के दावों की अगर ज़मीनी हक़ीक़त देखें तो स्पष्ट तौर पर कुछ भी कहना कठिन है. लेकिन यह ज़रूर है कि लोग बीजेपी को एक विकल्प के तौर पर देख-परख रहे हैं. लोग बीजेपी को लेकर बातें कर रहे हैं. और लोग कहीं न कहीं उसे टीएमसी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर भी देख रहे हैं.

इमेज स्रोत, BHOOMIKA/BBC

इमेज कैप्शन,

कूच बिहार में बीजेपी इस बार अच्छी स्थिति में है

बीजेपी के दावों का आधार क्या?

यूं तो हर चुनाव से पहले राजनीतिक पार्टियां ऐसे दावे करती ही हैं पर यदि कूच बिहार की बात करें तो इससे इनकार करना मुश्किल है कि बीजेपी कहीं नहीं है. लोग बीजेपी के बारे में बातें कर रहे हैं. इसका एक प्रमाण प्रधानमंत्री की जनसभा में जुटी भीड़ भी है. हालांकि उस जनसभा में बहुत अधिक ऐसे लोग भी थे जो सिर्फ़ भारत के प्रधानमंत्री को देखने आए थे.

अगर दावों से इतर देखें तो कुछ मुद्दे ऐसे ज़रूर हैं जिनका फ़ायदा बीजेपी को हो सकता है. पार्टी कार्यकर्ताओं, आम-नागरिकों और जानकारों से बातचीत के आधार पर यह संभावना हो सकती है कि कुछ मुद्दे बीजेपी के पक्ष में जा सकते हैं.

दावों के इतर कौन से मुद्दे हैं जो बीजेपी के पक्ष में जा सकते हैं?

विकास और भ्रष्टाचार

हर चुनाव की तरह कूच बिहार में भी विकास और भ्रष्टाचार एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. राज्य में टीएमसी की सरकार है और ज़िले की आठ सीटें भी टीएमसी के ही पास हैं.

स्थानीय लोग मानते हैं कि टीएमसी ने कुछ काम तो किया है लेकिन जिन दावों के साथ उसने पिछले चुनावों में जीत हासिल की थी वे सभी पूरे नहीं हुए हैं.

ख़ासतौर पर एम्स को कोलकाता के क़रीब शिफ़्ट किये जाने को लेकर लोगों में नाराज़गी है. कूच बिहार की बाज़ार में भेलपूरी बेचने वाले पप्पू का कहना है, "टीएमसी ने कुछ काम नहीं किया है, ये कहना झूठ है लेकिन उनकी बहुत सी नीतियां ऐसी रही हैं जो आम आदमी को रास नहीं आईं. आम आदमी को उसे लेकर क्षोभ है."

वो कहते हैं, "यहां पास में एम्स बन जाता तो हम लोगों को सहूलियत हो जाती. अभी कुछ बड़ी बीमारी हो जाती है तो कोलकाता या सिलीगुड़ी भागना पड़ता है. पहले एम्स उत्तर दिनाजपुर में आने वाला था लेकिन दीदी ने उसे कल्याणी भेज दिया."

प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की 134वीं रिपोर्ट में भी इस बात का ज़िक्र है कि उत्तर दिनाजपुर के रायगंज में एम्स बनना था. क्योंकि राज्य सरकार इसके लिए आवश्यक ज़मीन मुहैया नहीं करा पायी इसलिए इसकी लोकेशन बदल दी गई है. और अब यह पश्चिम बंगाल के दक्षिणी हिस्से में बनाया जाएगा. हालांकि इस नोटिस में साफ़ शब्दों में ये भी लिखा है कि इस प्रोजेक्ट को पश्चिमी बंगाल के उत्तरी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को देखते हुए मंज़ूरी दी गई थी.

कूच बिहार में हालांकि मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज और डिग्री कॉलेज हैं लेकिन स्थानीय लोगों की शिकायत है कि वहां इंफ्रास्ट्रक्चर का बड़ा अभाव है और कॉलेजों में शिक्षकों की कमी है.

इमेज स्रोत, BHOOMIKA/BBC

इमेज कैप्शन,

2016 के चुनाव में टीएमसी ने नौ में से आठ सीटों पर जीत दर्ज की थी

सड़कों की स्थिति पर ज़्यादातर लोग संतुष्ट ही हैं लेकिन बेरोज़गारी यहां भी मुद्दा है. जीविका के लिए एक बड़ा वर्ग खेती पर निर्भर है. 2011 की जनगणना के अनुसार, यहां की साक्षरता दर 74 फ़ीसद है लेकिन रोज़गार संकट यहां का बड़ा मुद्दा है. ज़िले के क़रीब 245 परिवार और 700 लोग बेघर भी हैं.

कूच बिहार में भ्रष्टाचार भी एक बड़ा मुद्दा है जिसका फ़ायदा बीजेपी उठा सकती है. कूच बिहार में टीएमसी के कई ज़मीनी नेताओं पर वित्तीय भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. सुक्ताबाड़ी में मिले अरविंद का कहना है, "दीदी योजनाएं लाती हैं, ग़रीबों का सोचती हैं पर उनके मंत्री उतने अच्छे नहीं है."

कूच बिहार के एक पत्रकार ने नाम न लिखने की शर्त पर बताया, "कूच बिहार में विकास हुआ है लेकिन करप्शन भी बहुत ज़्यादा हुआ है. इसलिए लोगों में ग़ुस्सा है. पंचायत स्तर से लेकर विधानसभा तक करप्शन की बातें आती है. सरकार के जितने भी प्रोजेक्ट हैं, हर जगह करप्शन हुआ है. इसका फ़ायदा बीजेपी को हो सकता है."

वो कहते हैं, "टीएमसी के नेताओं पर राहत योजनाओं और राहत पैकजों में हिस्सा या कहें कटमनी लेने की बात अक्सर सुनने को मिलती है."

राजनीतिक हिंसा

कूच बिहार में राजनीतिक हिंसा हालांकि नई नहीं है, लेकिन चुनावों के समय इसमें तेज़ी ज़रूर आई है. बीते छह अप्रैल को ही ज़िले के जीरानपुर बाज़ार में टीएमसी और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प हुई थी. सात अप्रैल को बीजेपी के दिलीप घोष पर हमला हुआ. आरोप है कि हमला टीएमसी ने करवाया था लेकिन टीएमसी ने इससे इनक़ार किया है.

कूच बिहार में अगर चुनावों के छह महीने पहले के आंकड़े देखें तो राजनीतिक हिंसा में दर्जन भर मौतें हुई हैं. दर्जनों लोगों के घायल होने की ख़बरें आयी हैं. इसमें बीजेपी के नेता अमित सरकार की मौत, टीएमसी के विधायक हितेन बर्मन पर हमला सबसे ताज़ा मामले हैं.

प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कई मौक़ों और रैलियों में राजनीतिक हिंसाओं का ज़िक्र कर चुके हैं.

कूच बिहार के एक स्थानीय पत्रकार ने ज़िले में राजनीतिक हिंसा को लेकर लोगों में डर की बात कही. उनका कहना है, "कूच बिहार में राजनीतिक हिंसा सिर्फ़ हमले तक सीमित नहीं है. यहां आम लोगों में डर का भी माहौल है."

वे कहते हैं, "राजनीतिक हिंसा चुनाव के समीप आते-आते बढ़ी ज़रूर है. सीपीएम का दावा है कि राजनीतिक हिंसा में दोनों ही पार्टियों के लोग शामिल हैं." उनके मुताबिक़, "पहले टीएमसी मज़बूत थी लेकिन हाल में बीजेपी ने जैसा आक्रामक चुनाव प्रचार किया है और कार्यकर्ताओं को जोड़ा है उससे यह पार्टी भी मज़बूत हो गई है."

इमेज स्रोत, Subhendu Ghosh/Hindustan Times via Getty Images

इमेज कैप्शन,

प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कई बार राजनीतिक हिंसाओं का ज़िक्र कर चुके हैं.

इसका फ़ायदा भी बीजेपी को हो सकता है. उन्होंने कहा, "राज्य में टीएमसी की सरकार है. ऐसे में यदि राज्य में कोई हिंसा होती है तो उसे संभालने और रोकने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की ही है. लेकिन इसमें हाल में कोई कमी नही आयी है. पहले भी कई लोग मरे हैं. प्रशासन चूंकि टीएमसी के हाथों में है और बीजेपी का आरोप है कि टीएमसी ने राजनीतिक हिंसा पर सख़्ती नहीं बरती है. राजनीतिक लाभ के लिए हिंसा करने वालों को रोकने की कोशिश नहीं की जा रही है. शांति बहाली का हवाला देकर बीजेपी इसका फ़ायदा ले सकती है."

राजनीतिक हिंसा से इतर जब हम कूच बिहार के गांवों में घूम रहे थे तो ज़्यादातर लोगों ने कैमरे के सामने बोलने से मना कर दिया. वहीं कैमरा और मोबाइल बंद करने के बाद वे हर बात के लिए राज़ी मिले. लोगों ने राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों से ख़तरे का हवाला दिया.

हिंदू बहुल ज़िला

कूच बिहार की कुल आबादी के 75 फ़ीसद हिंदू हैं जबकि बाक़ी की 25 फ़ीसद आबादी मुसलमानों की है.

राज्य में ध्रुवीकरण को लेकर पहले से ही चर्चा है. बीजेपी ममता सरकार पर 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का आरोप लगाती रही है. ऐसे में अगर बीजेपी ध्रुवीकरण करने में कामयाब होती है तो उसके वोट प्रतिशत बढ़ सकते हैं.

आकाशवाणी के पूर्व पत्रकार अरविंद भट्टाचार्य कहते हैं, "पश्चिम बंगाल की राजनीति में कम्यूनल लाइन देखने को मिल रही है. जिस तरह ममता बनर्जी पर बीजेपी ने तुष्टिकरण का आरोप लगाया है, उससे बीजेपी को फ़ायदा हो सकता है. इसके अलावा घुसपैठ भी एक मसला है जो बीजेपी के पक्ष में जा सकता है."

राजबंशी समुदाय

कूच बिहार की राजनीति पर क़रीब से नज़र रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि यहां राजबंशी समुदाय की भूमिका निर्णायक हो सकती है.

वे कहते हैं, "सरकारी आंकड़ों में भले उन्हें 30-32 फ़ीसद बताया जा रहा हो पर असल में वे क़रीब 40 फ़ीसद हैं."

उनके मुताबिक़, "राजबंशियों का एक बड़ा हिस्सा मौजूदा सरकार से नाराज़ है. उन्होंने अपनी परंपरागत बोली को भाषा के तौर पर शामिल करने की माँग की थी. लेकिन उनकी बोली के साथ कामतापुरी बोली को भी जगह दी गई. इसे लेकर राजबंशियों का आरोप है कि सरकार ने एक ही समुदाय में गतिरोध पैदा करने के लिए ऐसा किया है और यह ठीक नहीं है."

राजबंशी समुदाय का तर्क है कि कामतापुरी और राजबंशी एक ही हैं और उन्हें अलग-अलग नहीं रखा जाना चाहिए था.

इसके अलावा इस समुदाय का आरोप है कि वे इस जगह के मूलवासी हैं लेकिन ना तो उनके पास नौकरी है और ना ही जीवनयापन का कोई दूसरा विकल्प.

कोच राजबंशी एक प्राचीन जनजाति है जो प्राचीन कोच साम्राज्य से ताल्लुक़ रखता है. इस समुदाय की एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है और अपनी भाषा भी. 2100२ की जनगणना के अनुसार, देश में क़रीब एक करोड़ लोग राजबंशी भाषा बोलते हैं. पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, कूच बिहार, दार्जीलिंग और मालदा में इसे बोलने वाले काफ़ी संख्या में हैं.

राजबंशी समुदाय की कुछ महिलाओं से जब हमने बात की तो उनका कहना था कि उनके लिए किसी सरकार ने नहीं सोचा और सिर्फ़ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया.

एक महिला ने बीबीसी से कहा, "हमने वोट दिया था. सरकारों को हमारी संस्कृति सहेजनी चाहिए थी. लेकिन वोट के नाम पर केवल झूठे वादे किए गए और किसी ने भी सरकार में आने के बाद कुछ नहीं किया."

इमेज स्रोत, AFP

इमेज कैप्शन,

टीएमसी के कई नेता ममता बनर्जी के कथित खराब व्यवहार से नाराज होकर पार्टी छोड़ गए हैं.

टीएमसी का आंतरिक गतिरोध

टीएमसी और बाक़ी पार्टियों के आंतरिक गतिरोध का फ़ायदा भी बीजेपी को मिल सकता है.

कूच बिहार में बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा वहां के सांसद निशिथ प्रामाणिक हैं. वे इस बार विधायक का चुनाव भी लड़ रहे हैं. हालांकि वे पहले टीएमसी के नेता थे. कूच बिहार में बीजेपी के एक और बड़े चेहरे मिहिर गोस्वामी भी पहले टीएमसी में ही थे.

एक स्थानीय पत्रकार ने बताया, "फ़ॉरवर्ड ब्लॉक के उदयन गुहो के टीएमसी में जाने के बाद और पार्टी द्वारा उन्हें प्रत्याशी बनाने के बाद से टीएमसी में गतिरोध बढ़ गया था. इससे पार्टी के पुराने नेता नाराज़ होकर बीजेपी का रुख़ कर रहे हैं.''

हालां​कि वे कहते हैं कि निशिथ प्रामाणिक के बीजेपी में जाने से बीजेपी को फ़ायदा होगा. उनके मुताबिक़, "निशिथ प्रामाणिक कूच बिहार से बीजेपी के पहले एमपी हैं और युवाओं में उनकी एक अपील है. वे टीएमसी से जुड़े रहे हैं तो उधर की राजनीति भी समझते हैं. ऐसे में टीएमसी का आंतरिक गतिरोध और निशिथ प्रामाणिक का चेहरा बीजेपी को फ़ायदा पहुँचा सकता है."

वहीं अरविंद मजूमदार ने कहा कि ऐसा नहीं है कि लोगों ने ममता को बिल्कुल नकार दिया है, लेकिन ये ज़रूर है कि बीजेपी ने अपनी आक्रामक मौजूदगी दर्ज की है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)