वाराणसी: ज्ञानवापी परिसर का सर्वेक्षण कराने की अदालत से मिली मंज़ूरी

  • समीरात्मज मिश्र
  • बीबीसी हिंदी के लिए
ज्ञानवापी परिसर

काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद मामले में वाराणसी की फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने मस्जिद परिसर की पुरातात्विक जाँच कराने के आदेश जारी किए हैं. फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के सिविल जज सीनियर डिवीजन आशुतोष तिवारी की अदालत ने गत दो अप्रैल को इस मामले में सुनवाई पूरी की थी. गुरुवार को अदालत ने यह आदेश देते हुए आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ़ इंडिया यानी एएसआई को अपने ख़र्च पर खुदाई करने का निर्देश दिया. खुदाई का काम पाँच सदस्यीय एक कमेटी के नेतृत्व में होगा.

हालांकि सुन्‍नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड और ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन का कहना है कि वो इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अपील करेंगे.

पाँच सदस्यीय टीम करेगी सर्वेक्षण

ज्ञानवापी परिसर में प्राचीन मूर्ति स्वयंभू आदि विश्वेश्वर पक्ष के वकील विजय शंकर रस्तोगी ने बताया कि कोर्ट ने केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र के ज़रिए इस मामले में पुरातत्व विभाग की पाँच सदस्यीय टीम बनाकर पूरे परिसर के पुरातात्विक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया है. विजय शंकर रस्तोगी इस मामले में लंबे समय से सर्वेक्षण की माँग कर रहे थे और अदालत के इस आदेश को वो अपनी बड़ी जीत बता रहे हैं. अदालत ने उन्हें इस मामले में भगवान विश्वेश्वरानंद की ओर से वाद मित्र नियुक्त किया था.

इमेज स्रोत, BBC/samiratmaj mishra

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "अदालत ने बहुत बड़ा आदेश दिया है और पुरातात्विक सर्वेक्षण के बाद ये स्पष्ट हो जाएगा कि विवादित स्थल कोई मस्जिद नहीं, बल्कि आदि विश्वेश्वर भगवान महादेव का मंदिर है. अयोध्या के मामले में भी अदालत ने एएसआई से सर्वेक्षण कराने का आदेश दिया था और तभी सच्चाई सामने आ सकी जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अपना ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया."

क्या है मामला?

ज्ञानवापी परिसर के पुरातात्विक सर्वेक्षण की याचिका पर सिविल जज सीनियर डिवीजन फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में गत 2 अप्रैल को बहस पूरी हुई थी. दिसंबर 2019 में अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने सिविल जज की अदालत में स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर की ओर से एक आवेदन दायर किया था, जिसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा पूरे ज्ञानवापी परिसर का सर्वेक्षण करने का अनुरोध किया गया था. उन्होंने ख़ुद को भगवान विश्वेश्वर के 'वाद मित्र' के रूप में याचिका दायर की थी जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था. हालांकि पहली बार 1991 में वाराणसी सिविल कोर्ट में स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर की ओर से ज्ञानवापी में पूजा की अनुमति के लिए याचिका दायर की गई थी.

जनवरी 2020 में ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन यानी अंजुमन इंतज़ामिया मस्जिद समिति ने ज्ञानवापी मस्जिद और परिसर का एएसआई द्वारा सर्वेक्षण कराए जाने की माँग पर प्रतिवाद दाख़िल किया.

याचिकाकर्ता रस्तोगी ने दावा किया था कि काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण लगभग क़रीब दो हज़ार साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने कराया था, लेकिन मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब ने साल 1664 में मंदिर को नष्ट कर दिया था. विजय शंकर रस्तोगी कहते हैं, "इसके अवशेषों का इस्तेमाल मस्जिद बनाने के लिए किया था जिसे मंदिर भूमि पर निर्मित ज्ञानवापी मस्जिद के रूप में जाना जाता है. हमने वास्तविकता जानने के लिए अदालत से पूरे परिसर का सर्वेक्षण कराने के निर्देश देने की अपील की थी."

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फ़ैसले को देंगे चुनौती: वक़्फ़ बोर्ड

वहीं मस्जिद प्रबंधन और सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड का कहना है कि वो इस फ़ैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देंगे. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य और राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड की ओर से वकील रह चुके ज़फ़रयाब जिलानी कहते हैं कि यह कोई फ़ैसला नहीं है, बल्कि आदेश है और यह हाईकोर्ट में ख़ारिज हो जाएगा.

बीबीसी से बातचीत में ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा, "1991 के पूजा स्थल क़ानून का खुले तौर पर उल्लंघन है यह और कोर्ट में टिक नहीं पाएगा. मुझे तो इस बात पर भी आश्चर्य है कि यह मामला हाईकोर्ट में पेंडिंग है तो इस पर सिविल कोर्ट ने आदेश कैसे जारी कर दिया. ख़ैर, हम लोग क़ानूनी तौर पर आगे की कार्रवाई करेंगे."

साल 1991 में बने पूजा स्थल क़ानून के मुताबिक़, 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता. और यदि कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है.

यूपी सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन जफ़र अहमद फ़ारूक़ी ने भी कहा कि वो फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अपील करेंगे. उन्होंने अपने बयान में कहा, "कोर्ट में ऐसा कोई सबूत नहीं पेश किया गया जिससे यह साबित हो सके कि वहां पर मस्जिद की जगह कोई मंदिर था. अयोध्या मामले में भी एएसआई की खुदाई से कोई फ़ायदा नहीं हुआ. वो यह साबित नहीं कर पाए थे कि बाबरी मस्जिद मंदिर को गिरा कर बनाया गया था."

लेकिन विजय शंकर रस्तोगी कहते हैं कि विवादित स्थल की धार्मिक स्थिति 15 अगस्त 1947 को मंदिर की थी अथवा मस्जिद की, इसके निर्धारण के लिए साक्ष्य की आवश्यकता है और ये साक्ष्य परिसर की खुदाई से ही मिल सकते हैं. वो कहते हैं, "विवादित स्थल विश्वनाथ मंदिर का एक अंश है इसलिए एक अंश की धार्मिक स्थिति का निर्धारण नहीं किया जा सकता बल्कि ज्ञानवापी परिसर का भौतिक साक्ष्य लिया जाना ज़रूरी है जिसे पुरातत्व विभाग जाँच करने के बाद वस्तुस्थिति स्पष्ट कर सकता है."

दरअसल, इस मामले में सुनवाई के क्षेत्राधिकार को लेकर सुन्‍नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड और ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन यानी अंजुमन इंतज़ामिया मसाजिद ने सिविज जज सीनियर डिवीजन फ़ास्‍ट ट्रैक के कोर्ट में सुनवाई करने के लिए अदातल में क्षेत्राधिकार को चुनौती दी थी. 25 फ़रवरी 2020 को सिविल जज सीनियर डिवीजन ने इस चुनौती को ख़ारिज कर दिया तो इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ ज़िला जज के यहां निगरानी याचिका दाख़िल की गई. इस पर आगामी 12 अप्रैल को सुनवाई होनी है.

वहीं दूसरी ओर, इस मुक़दमे को लेकर इलाहाबाद हाइकोर्ट में भी सुनवाई चल रही है. हाईकोर्ट में इस मामले में दोनों पक्षों की ओर से बहस पूरी हो चुकी है लेकिन हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुरक्षित रखा है.

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