तौक्ते तूफ़ान: डूबता बार्ज, इंजन रूम में आग, गरजता समुद्र और बचने की आख़िरी उम्मीद लाइफ़ बोट भी पंक्चर

  • राघवेंद्र राव
  • बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
नौसेना का बचाव अभियान

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"क़रीब पाँच बजे पूरा बार्ज डूबने ही वाला था. ठीक वैसे ही जैसे टाइटैनिक के साथ हुआ था. हमने एक दूसरे का हाथ थाम लिया और सब लोग कूद पड़े. बार्ज पूरी तरह पानी के नीचे जा रहा था. जो हिम्मत जुटा सके वे कूद गए. कुछ ने उम्मीद खो दी थी और वे बार्ज के साथ ही डूब गए. समुद्र के पानी में हम ज़िंदा रहने की कोशिश करते रहे. लेकिन आख़िरकार हमने उम्मीद खो दी और इस बात को स्वीकार कर लिया कि हम वहीं मर जाएंगे. हममें से कुछ लोगों ने लाइफ़ जैकेट उतारकर मौत को गले लगा लिया."

16 मई की रात को विशाल केदार अपने जीवन में कभी भुला नहीं पाएँगे. ये वो रात थी जिसमें उन्होंने मौत से आँखें मिलाईं, उससे डरे भी पर आख़िरकार उसे चकमा देकर बच निकले.

क्या होता है बार्ज?

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केदार बार्ज पी-305 पर वेल्डिंग सहायक का काम करते थे. बार्ज या बजरा नहरों और नदियों में माल ढोने के लिए इस्तेमाल होने वाली एक लंबी सपाट तल वाली नाव को कहा जाता है. कुछ बार्ज इंजन वाले होते हैं, दूसरों को किसी दूसरी बोट से खींचकर चलाया जाता है.

बार्ज पी-305 मुंबई के तट पर तेल और प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) के लिए काम कर रहा था. इस बार्ज को हीरा तेल क्षेत्रों में तैनात किया गया था. ये तेल क्षेत्र अरब सागर में ओएनजीसी के सबसे तेल के भंडारों में से एक है.

16 मई की आधी रात के तुरंत बाद चक्रवात तौक्ते के तेज़ थपेड़ों के कारण यह बार्ज अपने लंगर से छूट गया और 17 मई की शाम मुंबई से लगभग 60 किलोमीटर दूर अरब सागर में डूब गया.

इस बार्ज पर कुल 261 लोग सवार थे. लापता कर्मियों का पता लगाने के लिए 17 मई से खोज और बचाव कार्य अब भी जारी है. आख़िरी समाचार मिलने तक भारतीय नौसेना ने इस बार्ज से 186 लोगों को बचा लिया था और 15 लापता लोगों को ढूंढने की कोशिश जारी थी. इस बार्ज पर काम कर रहे 60 लोगों की मौत हो चुकी है.

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केदार के साथ बच निकलने वालों में उनके दोस्त अभिषेक अवध भी हैं. केदार और अवध की उम्र 20 साल है और वे नासिक ज़िले के एक गाँव के रहने वाले हैं.

दोनों दोस्त मार्च के महीने में इस बार्ज पर वेल्डिंग असिस्टेंट के तौर पर काम करने आए थे. पर शायद उन्होंने कभी न सोचा होगा कि इस 20,000 रुपये महीने की नौकरी में उन्हें इतने बड़े जोखिम का सामना करना पड़ सकता है.

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विशाल केदार और अभिषेक अवध

आपबीती

केदार और अवध ख़ुश हैं कि उनकी जान बच गई लेकिन उस रात जो उनके साथ हुआ उसकी भयावह यादें उनके ज़हन में अब भी ताज़ा हैं.

अवध कहते हैं कि 14 तारीख़ को उनके बार्ज के कप्तान को बताया गया कि एक चक्रवात समुद्रतट से टकराएगा और आपको सभी क्रू मेंबर्स के साथ बार्ज पर वापस मुंबई लौट जाना चाहिए और किसी सुरक्षित स्थान पर लंगर डालना चाहिए.

वो कहते हैं, "लेकिन, बार्ज के कप्तान और कंपनी प्रभारी ने इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने सोचा कि अगर लहरों की ऊंचाई सात या आठ मीटर है तो बार्ज को कोई ख़तरा नहीं होगा, इसलिए वे बार्ज को उस प्लेटफॉर्म से 200 मीटर दूर ले गए जहाँ हम काम कर रहे थे."

अवध कहते हैं कि पानी बहुत तेज़ी से बहने लगा और तूफ़ानी बारिश की मार इतनी ज़ोरदार थी कि बार्ज अपना संतुलन खोने लगा और पानी के बहाव के साथ बहने लगा.

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तौक्ते तूफ़ान में समंदर की लहरों के बीच फंसे रहे दो लोगों की आपबीती

केदार कहते हैं कि उस रात इतनी तेज़ हवा चल रही थी कि बार्ज बेकाबू हो चुका था.

वो कहते हैं, "इससे लंगरों पर दबाव बन गया और वे अत्यधिक दबाव में आ गए. रात के 12 बजते ही लंगर टूटने लगे और एक-एक करके सभी लंगर 3.30 बजे तक टूट गए. साथ ही ओएनजीसी के प्लेटफॉर्म पर बार्ज टकरा गया और उसमें एक छेद हो गया जिससे एक तरफ़ से पानी अंदर जाने लगा."

"कुछ देर बाद बार्ज का पिछला हिस्सा डूब गया और इंजन रूम में पानी भर गया और रेडियो और लोकेशन ऑफ़िस दोनों पूरी तरह जल गए."

अवध बताते हैं कि रेडियो अधिकारी ने तुरंत मुंबई कार्यालय से संपर्क करने की कोशिश की और मदद माँगी.

अवध के अनुसार उनमें से 20 लोग उसी समय समुद्र में कूद गए और उनमें से 17-18 लोग लहरों के साथ डूब गए. वो कहते हैं, "उन्होंने हम पर लाइफ़ राफ्ट (जीवनरक्षक बेड़ा) गिराया लेकिन जब हम उनके ऊपर से कूदे तो वे पंक्चर हो गए. ऐसे में हमें बचना मुश्किल हो रहा था."

वक़्त बीतता जा रहा था. कुछ घंटों में बचाव दल पहुँच तो गया लेकिन वो इन लोगों के पास नहीं जा सका.

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अवध कहते हैं, "उन्होंने कहा कि अगर उनकी नावें हमारे पास आती हैं और वे बार्ज से टकरा सकती हैं तो इससे दोनों तरफ नुक़सान होगा. उन्होंने हमें मौसम के थोड़ा साफ़ होने तक इंतज़ार करने का सुझाव दिया ताकि वे ठीक से देख सकें और हमें बचा सके. हमारे पास इंतज़ार करने के लिए ज़्यादा समय नहीं था. हमने चार बजे तक इंतज़ार किया. फिर सबकी उम्मीद टूट गई और हमें लगा कि हम सब मर जाएँगे."

केदार कहते हैं कि बार्ज की बिजली चली गई थी और इसलिए रेस्क्यू टीम को उन्हें ढूंढना मुश्किल हो गया था. उनके अनुसार जहाँ बार्ज ने लंगर डाला हुआ था, वो वहां से 90 किलोमीटर दूर तक भटक गया था.

वो कहते हैं, "समय बीतता जा रहा था. सुबह के चार बज रहे थे. हम बस रेस्क्यू बोट का इंतज़ार करते रहे. जैसे ही पानी पीछे की ओर से अंदर गया, बार्ज लगातार डूबने लगा. बार्ज का केवल एक किनारा ही पानी के ऊपर था. कर्मी दल के सभी सदस्य उस तरफ जमा हो गए. फिर क़रीब पाँच बजे पूरा बार्ज डूबने की कगार पर था. ठीक वैसे ही जैसे टाइटैनिक के साथ हुआ था."

अवध कहते हैं कि "जैसे ही बार्ज डूबने लगा, सबने एक-दूसे के हाथ थाम लिए और कूदने का मन बना लिया ताकि बचाव दल हमें एक साथ एक स्थान पर हमें ढूंढ सकें. फिर हम तीन या चार के समूह में समुद्र में कूद गए. हमने 10-15 समूह बनाए और एक दूसरे को थामे रखा. लगभग तीन-चार घंटे तक हम पानी के साथ बहते रहे. पानी नाक और मुंह के अंदर जा रहा था. हमने बहुत कुछ सहा."

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कुछ देर बाद पानी में कूद चुके लोगों को भारतीय नौसेना का एक और जहाज़ अपने पास आता दिखा. उसे देख उनकी उम्मीदें तो जागीं कि शायद अब उन्हें बचा लिया जाएगा. लेकिन तेज़ बहाव वाली पानी की लहरें उस उम्मीद पर भारी पड़ रही थीं. अवध कहते हैं कि "उस क्षण मैंने मौत को चखा."

केदार कहते हैं कि समुद्र में छलांग लगाने के बाद वे सभी लोग चार घंटे तक पानी में रहे. उनके अनुसार जब-जब वे भारतीय नौसेना के जहाज़ की ओर बढ़ने की कोशिश करते तो कभी-कभी जहाज़ को छू भी लेते थे पर पानी का बहाव इतना तेज़ था कि उन्हें 100-200 मीटर दूर फेंक देता था.

वो कहते हैं, "हम कोशिश करते रहे लेकिन आख़िरकार हमने उम्मीद खो दी और इस बात को स्वीकार कर लिया कि हम वहीं मरेंगे. हममें से कुछ लोगों ने लाइफ़ जैकेट उतारकर मौत को गले लगा लिया. यहां तक कि मैंने भी ऐसा करने के बारे में सोचा."

इस दौरान नौसेना का बचाव दल भी कड़ी मेहनत कर रहा था. उन्होंने ऊपर से रस्सियाँ और लाइफ़ राफ्ट फेंके. अवध कहते हैं कि जब उनका दल नौसेना की नाव के पास पहुंचा तो उनमें से कोई उस नाव के नीचे चला गया, कोई नाव के पंखे में फंस गया और कोई नाव से टकरा गया.

वो कहते हैं, "मैंने तैरने की कोशिश की और फिर रस्सी पकड़कर ऊपर चढ़ गया. मैं लगभग बेहोश हो गया था. धीरे-धीरे वे सभी को बचा रहे थे. हम यह भी नहीं समझ पाए कि उस वक़्त दिन था या रात."

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अवध कहते हैं कि हर इंसान जीने की कामना करता है और वो उम्मीद नहीं खोना चाहता लेकिन जब वो समुद्र में गिरे तो लगा कि मरना तय है.

वो कहते हैं, "लेकिन, हमारे सहयोगियों ने एक-दूसरे को हौसला दिया और कहा कि हम उम्मीद न खोएं. उन्होंने हमसे कहा कि हम बच जाएँगे. यह वैसा ही है, जैसा हम फ़िल्मों में देखते हैं."

केदार का कहना है कि पहले चार घंटों में उन्हें उम्मीद थी कि वो बच जाएंगे, लेकिन जैसे-जैसे पानी का बहाव और तेज़ होने लगा उनकी उम्मीद टूटने लगी और आने वाली मौत साफ़ दिखने लगी.

वो कहते हैं, "लेकिन जब कुछ देर बाद हमें बचा लिया गया तो यह जानकर राहत मिली कि हम ज़िंदा हैं."

कहाँ हुई चूक?

मौसम विभाग ने 11 मई की शाम को अरब सागर में तूफ़ान आने की चेतावनी दी थी और सभी नावों को 15 मई तक तट पर पहुंचने का निर्देश दिया था. भारतीय कोस्ट गार्ड के अनुसार 4,000 से अधिक मछली पकड़ने वाली नौकाएं बंदरगाह पर लौट आई थीं. कोस्ट गार्ड के अधिकारियों ने ओएनजीसी को बंदरगाह में सभी जहाज़ों को सुरक्षित ले आने की चेतावनी दी थी.

लेकिन इन चेतावनियों के बाद भी बार्ज पी-305 अभी भी समुद्र में ही था और बॉम्बे हाई ऑयल फ़ील्ड के पास एक तेल रिग के प्लेटफ़ॉर्म से बंधा हुआ था.

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दास ऑफ़शोर के संस्थापक और समुद्री इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कार्यरत अशोक खाड़े ने बीबीसी मराठी को बताया कि "जब भी हमें चक्रवात की चेतावनी या तेज़ हवा की गति के बारे में चेतावनी मिलती है तो हमारे लिए यह अनिवार्य होता है कि हम आयल रिग प्लेटफ़ॉर्म के पास कोई तैरती हुई संपत्ति न रखें क्योंकि यह प्लेटफ़ॉर्म पर दुर्घटनाग्रस्त हो सकती है और एक बड़ी दुर्घटना हो सकती है".

वो कहते हैं कि पहले चक्रवात की चेतावनी जारी होने के बाद अगर बार्ज को किनारे पर ले आया जाता तो कोई जानोमाल का नुक़सान नहीं होता. उनके अनुसार ओएनजीसी को सभी को वापस ले आना चाहिए था.

खाड़े कहते हैं कि पिछले सप्ताह उनकी कंपनी के तीन बार्ज समुद्र में थे. इनमें से एक एफ़कॉन के साथ काम कर रहा था और 2 एलएनटी के साथ काम थे. "लेकिन जैसे ही हमें चेतावनी मिली, हम उन्हें समुद्र से वापस ले आए और सुरक्षित स्थान पर लंगर डाल दिया. इस तरह सभी सुरक्षित थे."

खाड़े के अनुसार आमतौर पर 15 मई मानसून से पहले समुद्र में काम करने का आख़िरी दिन होता है.

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वो कहते हैं, "गाइडलाइंस का कहना है कि इसके बाद गहरे समुद्र में कोई नहीं होना चाहिए. लेकिन अगर समुद्र की लहरें बहुत ऊँची-नीची नहीं है तो कई बार काम ख़त्म करने के लिए कुछ और दिनों तक वहाँ रहने का एक छोटा-सा जोख़िम लिया जाता है."

भारतीय नौसेना के पूर्व प्रवक्ता कैप्टन डीके शर्मा का कहना है कि अगर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य देखें तो पश्चिमी तट पर सभी चक्रवात मूल रूप से विलुप्त हो चुके हैं. शर्मा कहते हैं कि अतीत में देखें तो पश्चिमी तट पर यह तूफ़ान या तो मुड़ जाते हैं या कमज़ोर हो जाते हैं.

वो कहते हैं, "बार्ज के कप्तान के पास भी अनुभव था. वे नौसिखिया नहीं होंगे जो समुद्र में आ गए. शायद उन्होंने ऐतिहासिक आधार पर फ़ैसला लिया. यह ग़लत आकलन या ग़लत निर्णय का मामला हो सकता है."

नौसेना का बचाव अभियान

भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस कोच्चि, आईएनएस कोलकाता, आईएनएस ब्यास, आईएनएस बेतवा, आईएनएस तेग, पी8आई समुद्री निगरानी विमान और चेतक और सीकिंग हेलीकॉप्टर खोज और बचाव संचालन में शामिल हैं और विषम और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में जूझ रहे हैं.

नौसेना पानी के भीतर जाकर विशेष टीमों और उपकरणों का उपयोग करके बार्ज पी-305 के मलबे के बारे में पता लगाने के लिए एक सर्वेक्षण जहाज़ को भी भेज रही है.

नौसेना स्टाफ़ के उप-प्रमुख (डीसीएनएस) वाइस एडमिरल एमएस पवार ने कहा है कि पिछले चार दशकों में देखा गया ये सबसे चुनौतीपूर्ण बचाव अभियानों में से एक है.

पवार के अनुसार मुख्य चुनौती मौसम ही है. उन्होंने कहा कि इस चक्रवाती तूफ़ान में 80-90 समुद्री मील (148-166 किलोमीटर) प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाएं, आठ मीटर तक की ऊंचाई वाली लहरें, लगातार बारिश में कुछ दिखाई नहीं देता, ये वो चुनौतियाँ हैं जिनका सामना करना पड़ता है.

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पवार का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में जहाज़ को संभालना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. वो कहते हैं कि सामान्य मानक प्रक्रिया के अनुसार ऐसे हालात में जहाज़ों के ऊपरी डेक किसी को जाने की इजाज़त नहीं होती क्योंकि डेक गीले होते हैं.

वो कहते हैं, "इसलिए जब आपके पास बाहर निकलने का भी अवसर नहीं होता है तो लोगों को बचाना बड़ी चुनौतियाँ और कठिनाइयाँ पेश करता है. लेकिन इसके बावजूद यह तथ्य कि हमने लोगों को सफलतापूर्वक बचाया है इस बात का प्रमाण है कि हमारे जहाज़ इन चुनौतियों के लिए तैयार हैं."

उनके अनुसार किसी भी आकार के किसी भी जहाज़ को मौसम से ख़तरा होता है और एक अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफ़ान में यह ख़तरा बढ़ जाता है.

वो कहते हैं, "ये ऐसी बात है की शेर के मुंह में हाथ डालना और सुरक्षित तरीक़े से बाहर निकलना. ये काफ़ी चुनौतीपूर्ण रहता है."

कौन है ज़िम्मेदार?

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मुंबई पुलिस ने इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कर ली है. इस एफ़आईआर में बार्ज के कप्तान और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (II) (जान-बूझकर किया गया काम जिससे मृत्यु की आशंका हो), 338 (दूसरों के जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को ख़तरे में डालने वाले कार्य से गंभीर चोट पहुंचाना) और 34 लगाई गई हैं.

ये एफ़आईआर बार्ज के चीफ़ इंजीनियर रहमान शेख़ के एक बयान के आधार पर दर्ज की गई है. शेख़ ने अपनी शिकायत में कहा है कि मौसम विभाग ने एलर्ट जारी किया था लेकिन कप्तान और अन्य लोगों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया.

दूसरी तरफ़ केंद्र सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने चक्रवात तौक्ते के दौरान ओएनजीसी के जहाज़ों के फंसे होने के घटनाक्रम की जांच करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर दी है.

मंत्रालय के अनुसार 600 से अधिक लोगों के साथ ओएनजीसी के कई जहाज़ चक्रवात तौक्ते के दौरान समुद्रतट से दूर के क्षेत्रों में फंसे हुए थे.

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पूरे घटनाक्रम की जांच करने के साथ ये समिति इस बात का भी पता लगाएगी कि क्या मौसम विभाग और अन्य वैधानिक प्राधिकरणों की चेतावनियों पर पर्याप्त रूप से विचार किया गया और उन पर कार्रवाई की गई. साथ ही, इस बात की भी जाँच होगी कि क्या जहाज़ों की सुरक्षा और आपदा प्रबंधन से निपटने के लिए मानक संचालन प्रक्रियाओं का पर्याप्त रूप से पालन किया गया.

समिति सिस्टम में उन ख़ामियों का भी अध्ययन करेगी जिनकी वजह से जहाज़ बह जाते हैं या फँस जाते हैं. पी-305 बार्ज जैसे प्रकरण को भविष्य में होने से रोकने के लिए समिति सिफ़ारिशें भी करेगी.

ओएनजीसी प्रबंधन ने जीवित बचे लोगों को एक लाख रुपये और मृत और लापता व्यक्तियों के परिवारों के लिए 2 लाख रुपये की तत्काल राहत देने का फ़ैसला किया है.

एफकॉन्स ने भी मृतकों के परिवारों के लिए मुआवज़े की घोषणा की है. कंपनी ने कहा है कि वो सुनिश्चित करेगी कि मृतक के परिवारों को 10 साल के वेतन के बराबर कुल मुआवज़ा मिल सके.

(बीबीसी मराठी से इनपुट्स के साथ)

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