एक विधानसभा सीट पर चुनाव और कोरोना से कम से कम तीन दर्जन मौतें

  • शुरैह नियाज़ी
  • भोपाल से बीबीसी हिंदी के लिए
दमोह

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मध्यप्रदेश के दमोह विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए अजय टंडन ने शुक्रवार को भोपाल में विधायक के तौर पर शपथ ली.

लेकिन भोपाल से लगभग 250 किलोमीटर दूर बैठे दमोह के कई परिवार यही सोच रहे हैं कि अगर यह चुनाव नहीं होते तो अच्छा होता. ये वो परिवार हैं जिन्होंने इस चुनाव की वजह से अपने सदस्यों को खो दिया है. इन परिवार के लोगों की चुनाव ड्यूटी लगाई गई थी और वहीं से इन्हें कोरोना संक्रमण ने पकड़ लिया. बाद में कोरोना ने उनकी जान भी ले ली.

चुनाव डयूटी करने के दौरान मरने वाले लोगों में सबसे ज़्यादा तादाद शिक्षकों की है. 28 शिक्षक चुनाव में लगी डयूटी की वजह से संक्रमित हुए और फिर उनकी जान चली गई.

57 साल के भरत चौरसिया दमोह में शिक्षक थे और उनकी भी डयूटी चुनाव में लगाई गई थी. भरत चौरसिया को लगातार चुनाव से संबधित कार्य के लिए जाना पड़ रहा था जबकि उनकी सेहत ठीक नहीं थी. भरत चौरसिया डायबिटिज़ के साथ-साथ हार्ट पेशेंट भी थे.

उनकी बेटी सुभारती चौरसिया ने बीबीसी से कहा, "पिताजी लगातार चुनाव से सबंधित काम में लगे थे. 9 अप्रैल को चुनाव का लेकर प्रशिक्षण था और उस दिन वो गये थे. लेकिन 11 अप्रैल की हुई जांच में पता चला की उन्हें कोरोना है."

सुभारती ने बताया, "उसके बाद दो तीन दिन वो घर पर ही रहे और उनका इलाज होता रहा लेकिन जब कोई फ़ायदा नहीं हुआ तो हम उन्हें भोपाल लेकर गए."

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क्या कहना है पीड़ित परिवारों का

दमोह में 17 अप्रैल को चुनाव होना था जिसमें भरत चौरसिया की डयूटी लगी थी लेकिन उसी दिन उन्होंने भोपाल में कोरोना से दम तोड़ दिया. उनकी पत्नी, दो बेटियां और एक पुत्र अब यही सोच रहे हैं कि चुनाव नहीं होता तो उनके पिता आज उनके बीच होते.

इसी तरह एक अन्य शिक्षक 53 साल के बोधन सिंह लोधी भी चुनाव के दौरान कोरोना की वजह से इस दुनिया से चले गये.

उनके पुत्र जितेंद्र लोधी ने बताया, "पिताजी पूरी तरह स्वस्थ थे. उनकी डयूटी मतदान के लिए लगी और उन्हें 16 अप्रैल को हम दमोह छोड़ आए. 17 अप्रैल को मतदान के बाद वो 2-3 बजे रात को घर पहुंचे. उस वक्त उन्हें थोड़ा बुख़ार था."

जितेंद्र ने बताया, "उनका इलाज़ स्थानीय डाक्टर से करवाया लेकिन उन्हें आराम नहीं मिला. उसके बाद उन्हें ज़िला चिकित्सालय में दिखाया. वहां से दवा लेने के बाद उन्हें घर ले गये. लेकिन उसके बाद भी उन्हें आराम नहीं मिला तो जांच के लिए 29 अप्रैल को दमोह ला रहे थे. लेकिन उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया."

लोधी परिवार भी इस समय सदमे में है और यही सोच रहा है कि अगर चुनाव नहीं हुए होते तो परिवार का मुखिया आज ज़िंदा होता.

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मध्यप्रदेश शासकीय अध्यापक संगठन के प्रांतीय अध्यक्ष आरिफ़ अंजुम का कहना है, "चुनाव डयूटी के दौरान 28 शिक्षकों की कोरोना से मौत हुई है. कोरोना की वजह से पूरे ज़िले में अब तक 58 शिक्षकों की मौत हो चुकी है."

मध्यप्रदेश शासकीय अध्यापक संगठन ऐसे शिक्षकों के काग़ज़ तैयार करने में लगे हैं जिनकी मौत चुनाव के दौरान कोरोना की वजह से हुई है ताकि वो उन्हें मुआवज़ा दिलवा सकें.

दमोह के ज़िलाधिकारी कृष्ण चैतन्य ने बताया कि अभी कोरोना संक्रमण के कारण जान गंवाने वाले शिक्षकों के परिजनों से आवेदन लिए जा रहे हैं.

उन्होंने कहा, "एक बार आवेदन मिल जाएगा तो उनकी जांच करके उन्हें चुनाव आयोग को भेजा जाएगा. इस बारे में आगे की कार्रवाई चुनाव आयोग करेगा. शिक्षकों की अस्पताल की तमाम रिपोर्ट की जांच भी की जानी है."

निर्वाचन आयोग ने दमोह विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव ड्यूटी में लगे अधिकारियों व कर्मचारियों की मौत होने के बाद अनुग्रह राशि देने का आदेश जारी किया है.

वैसे तो चुनाव आयोग द्वारा प्रत्येक चुनाव कर्मचारियों के लिए पीपीई किट, सैनेटाइजर, हैंड ग्लव्स की व्यवस्था कराई थी लेकिन जब कोरोना फैला तो यह सारी चीज़ें काम नहीं आ पाईं.

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कई नेताओं की मौत भी हुई

दमोह में चुनाव काग्रेंस के टिकट पर जीते राहुल लोधी के भाजपा में शामिल होने की वजह से हो रहे थे. राहुल लोधी ने अक्तूबर, 2020 को भाजपा का दामन थाम लिया था.

मतदान की तारीख़ 17 अप्रैल तय की गई थी यह वह समय था जब पूरे प्रदेश में कोरोना को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन लगाया गया था. उन दिनों हर रोज़ प्रदेश में हज़ारों लोग कोरोना संक्रमित पाए जा रहे थे और बड़ी तादाद में लोगों की जानें भी जा रही थी.

पूरे प्रदेश में सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया था लेकिन दमोह को चुनाव के लिए खुला रखा गया था और नेता अपनी अपनी पार्टियों के प्रचार में लगे हुये थे. चुनाव में कांग्रेस के अजय टंडन ने भाजपा के राहुल सिंह लोधी को पराजित किया था.

लेकिन ऐसा नहीं है कि चुनाव की भेंट सिर्फ़ शिक्षक ही चढ़े हों बल्कि इस दौरान कांग्रेस के नेता और भाजपा के नेता भी कोरोना संक्रमित हुए और उन्हें भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. एक पत्रकार भी दमोह में चुनाव कवरेज में संक्रमित हुए और बाद में उन्होंने भोपाल में दम तोड़ दिया.

ब्रजेंद्र सिंह राठौर, जो कि कांग्रेस सरकार में मंत्री थे और दमोह में कांग्रेस के प्रभारी भी थे वो भी कोरोना संक्रमित हुए और दो मई को भोपाल में उनकी मौत हो गई.

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इसी तरह महिला कांग्रेस की अध्यक्ष मांडवी चौहान भी दमोह गई थी और आख़िर में संक्रमित होकर लौटी. बाद में उनकी भी मौत हो गई.

स्थानीय नेता गोकुल पटेल और दमोह कांग्रेस के उपाध्यक्ष लाल चंद राय की पत्नी वंदना राय की जान भी कोरोना से गई.

इसी तरह भाजपा ने भी अपने छह नेताओं को चुनाव की वजह से गंवा दिया. दमोह भाजपा के पूर्व अघ्यक्ष देव नारायण श्रीवास्तव, बीना शहर अध्यक्ष अनिता खटीक, किसान मोर्च के ज़िला अध्यक्ष किशोरी पटेल, पार्षद महेंद्र राय, युवा मोर्च के संदीप पंथी और सरपंच हेमराज राठौर भी कोरोना की भेंट चढ़ गए.

दमोह में जो स्थिति बनी है उसके लिये लोग नेताओं को ही ज़िम्मेदार बता रहे हैं जिनका मानना है कि चुनाव को शहर पर थोप दिया गया. वहीं जिन लोगों ने अपनो को खोया है अब उनके हाल चाल जानने के लिए कोई भी उनके घर नहीं जा रहा है.

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