भारत में इसराइल का समर्थन क्या मुसलमानों से टकराव के कारण है?

  • रजनीश कुमार
  • बीबीसी संवाददाता
इसराइल

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2018 में इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू भारत आए थे और पीएम मोदी 2017 में इसराइल के दौर पर गए थे

इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू 2018 के अपने भारत दौरे में 17 फ़रवरी को अहमदाबाद में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे. संबोधन का समापन उन्होंने 'जय हिंद, जय भारत और जय इसराइल' से किया.

हॉल तालियों से गूंज उठा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ख़ुश होकर ताली बजाते रहे. बीजेपी ने इसका वीडियो क्लिप अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट किया और लिखा कि पीएम नेतन्याहू ने जय हिंद, जय भारत और जय इसराइल का नारा लगाया.

इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 1973 में बनी और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी 1980 में. दोनों दक्षिणपंथी पार्टी हैं. दोनों ख़ुद को राष्ट्रवादी पार्टी कहती हैं.

लिकुड पार्टी ग्रेटर इसराइल की बात करती है और भारतीय जनता पार्टी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के भीतर से भी अखंड भारत की आवाज़ उठती रहती है. लेकिन क्या इस आधार पर भारत और इसराइल में वैचारिक समानता खोजना ठीक है?

दोनों देशों के निर्माण बिल्कुल अलग हालात में हुए हैं.

यहूदियों के लिए एक मुल्क और सुरक्षित ठिकाने के रूप में इसराइल का जन्म हुआ, लेकिन इसका संबंध केवल दुनिया भर में सताए गए यहूदियों से नहीं है. इसराइल की पहचान के भीतर राष्ट्रीय और धार्मिक अवधारणा निहित है.

ऐसे तो इसराइल लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मुल्क है, लेकिन इसराइल को यहूदियों से ही जोड़कर देखा जाता है. इस स्थिति में आरोप लगता है कि इसराइल में अरबी अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक हो जाते हैं.

दूसरी तरफ़ भारत आज़ादी के बाद धार्मिक, भाषाई और जातीय विविधता आधारित लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना. इस विचारधारा के कारण राष्ट्रीय पहचान पर मजहब दशकों तक भारी नहीं पड़ा.

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भारत की राजनीति में 1980 के दशक में वोट बैंक की राजनीति के कारण सांप्रदायिकता में तेज़ी आई. भारतीय जनता पार्टी का उभार भी इस राजनीति से सीधा जुड़ा है. लेकिन भारत अब भी इतना नहीं बदला है कि उसकी तुलना इसराइल या पाकिस्तान से की जा सके.

पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बना, यह एक तथ्य है. इसराइल यहूदियों का है, इसमें भी कोई झूठ नहीं है. लेकिन भारत हिंदुओं का है, यह किसी पार्टी का एजेंडा हो सकता है, लेकिन भारत जिस विचारधारा से बना है, उसकी जड़ में ये बात नहीं है.

तो फिर बीजेपी नेता या भारत की बहुसंख्यक हिंदू आबादी इसराइल के पक्ष में क्यों खड़े दिखते हैं? पिछले 11 दिनों तक इसराइल और हमास के बीच चले हिंसक संघर्ष में अधिकतर भारतीयों का समर्थन और विरोध धार्मिक लाइन पर बँटा दिखा.

बीजेपी नेता सोशल मीडिया पर खुलकर इसराइल के पक्ष में बोलते दिखे. ऐसा प्रतीत होता है कि सोशल मीडिया पर इसराइल का समर्थन करने वाले ज़्यादातर लोग हिंदू थे. वहीं बड़ी संख्या में मुसलमानों का समर्थन फ़लस्तीनियों के साथ रहा.

बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने 10 मई को इसराइल के समर्थन में एक ट्वीट किया, ''इसराइल के भाइयों और बहनों को पूरा समर्थन है. दुनिया आपके साहस और दमखम को देख रही है. आप राह दिखा रहे हैं. सभी सकारात्मक और ईश्वरीय ताक़तें इसराइल के साथ हों. हम इसराइल के साथ खड़े हैं- आज और हमेशा.''

हालाँकि केंद्र में भी बीजेपी की सरकार है, लेकिन सरकार की तरफ़ से इसराइल के समर्थन में कुछ नहीं कहा गया.

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दूसरी तरफ़ 21 मई को ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रवक्ता सैयद आसिम वक़ार ने फ़लस्तीनियों के समर्थन में अपने ट्वीट में लिखा, ''अल्हम्दो लिल्लाह फ़लस्तीन की जीत हम सबको मुबारक. जो आतंकवादी थे, वो सब के सब इसराइल के साथ थे. जो इंसानियत के पैरोकार थे, वो फ़लस्तीनियों के साथ थे. इंसानियत ज़िंदाबाद, इसराइल के हामी मुर्दाबाद, आतंकवादी मुर्दाबाद.''

आसिम वक़ार ने इसराइल और हमास के बीच हुए युद्धविराम को फ़लस्तीनियों की जीत कहा है. लेकिन क्या आम लोगों के बीच भी इसराइल और फ़लस्तीनियों को लेकर इसी तरह हिंदू बनाम मुसलमान दिखा?

एआईएमआईएम के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने भी पिछले दिनों फ़लस्तीनियों के समर्थन में ट्विटर पर ख़ूब लिखा. उनसे पूछा कि वे फ़लस्तीनियों का समर्थन क्यों कर रहे हैं?

वारिस पठान कहते हैं, ''मुसलमान तो फ़लस्तीनियों के साथ ही रहेगा. वहाँ हमारा पहला क़िबला है और मक्का-मदीना के बाद हमारे लिए सबसे पवित्र स्थल है. भला कोई मुसलमान इसराइल का समर्थन क्यों करेगा?''

वारिस पठान कहते हैं कि जो मुसलमान विरोधी हैं, वही इसराइल का समर्थन कर रहे हैं.

29 साल के अंशुल सक्सेना सोशल मीडिया पर हिंदुओं और यहूदियों के साथ की ख़ूब वकालत करते हैं. ट्विटर पर अंशुल को इसराइली विदेश मंत्रालय से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक फॉलो करते हैं. इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू जनवरी 2018 में जब भारत आने वाले थे, तो अंशुल सोशल मीडिया पर इसराइल की वकालत में कई चीज़ें लिख रहे थे.

सात दिसंबर, 2017 को उन्होंने अपने एक ट्वीट में लिखा था, ''भारत को अपना दूतावास तेल अवीव से यरुशलम शिफ़्ट कर देना चाहिए. भारत को यह भी कहना चाहिए कि टेंपल माउंट केवल यहूदियों का है जैसे, अयोध्या में राम मंदिर हिंदुओं के लिए है.'' इस ट्वीट के साथ अंशुल ने भारत के पीएमओ को भी टैग किया था.

भारत में इसराइल और फ़लस्तीनियों का मुद्दा इतना सांप्रदायिक क्यों है? जेएनयू में सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज के प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, ''1980 के दशक में आडवाणी ने जो राजनीति शुरू की, ये उसी राजनीति का परिणाम है. बीजेपी हिंदुओं के बीच यह नैरेटिव सेट करने में कामयाब रही है कि हिंदू बड़ी तादाद में हैं फिर भी मुसलमानों का दबदबा है, इसलिए उन्हें सबक़ सिखाने की ज़रूरत है. इसराइल की एक छवि मुसलमान विरोधी बनी है और बीजेपी भी मुसलमानों की उपेक्षा वाली राजनीति करती है. ऐसे में बीजेपी समर्थकों को इसराइल रास आता है.''

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पाशा कहते हैं कि भारत में इसराइल का समर्थन मुसलमान विरोधी भावना के कारण है. वे कहते हैं, ''हिंदू इसराइल का समर्थन मुसलमान विरोधी भावना के कारण कर रहे हैं. लेकिन भारत के जो मुसलमान फ़लस्तीनियों का समर्थन कर रहे हैं, ये इसलिए नहीं है कि मुसलमान मानवाधिकारों को लेकर चिंतित हैं बल्कि यहाँ भी मजहबी कारण ही है. मुसलमान इस्लाम के पहला क़िबला अल-अक़्सा मस्जिद के कारण फ़लस्तीनियों का समर्थन कर रहे हैं.''

20 मई को पाकिस्तान की एक हिंदू लड़की सुरक्षा डोडाई ने अपने मुल्क में फ़लस्तीनियों के समर्थन को लेकर ट्वीट कर तीखा सवाल पूछा था. अपने ट्वीट में सुरक्षा ने लिखा था, ''पाकिस्तानियो, अपने ही मुल्क में ग़ैर-मुस्लिम लड़कियों के साथ रेप और ज़बरन धर्मांतरण को लेकर कभी विरोध किया? लेकिन तुमलोग फ़लस्तीनियों को लेकर इसराइल का विरोध कर रहे हो. क्या फ़लस्तीनी मुसलमान हैं इसलिए? ग़ज़ब आपका पाखंड है. लानत है."

''अभी देख रही हूँ कि कई सेलिब्रिटी फ़लस्तीनियों के समर्थन में इसराइल का विरोध कर रहे हैं लेकिन ज़बरन धर्मांतरण और रेप को लेकर कोई सामने नहीं आता है.''

एके पाशा कहते हैं कि हिंदुत्व की राजनीति का प्रेम असल में यहूदियों से नहीं रहा है. वे कहते हैं, ''मुसलमानों के विरोध के नाम पर ये इसराइल का समर्थन करते हैं लेकिन यहूदियों की रा़जनीति और हिंदुत्व की राजनीति में कोई मेल नहीं है. इसराइल में चाहे जितनी दक्षिणपंथी सरकार रहे, उनकी वैज्ञानिक सोच पर धार्मिक रूढ़ि और कट्टरता हावी नहीं होती. लेकिन भारत में हिंदुत्व की राजनीति की पोस्टर महिला और सांसद कहती हैं कि गो मूत्र पीने से कोरोना ठीक हो जाएगा और वो भी इसका सेवन करती हैं.''

पाशा कहते हैं कि यहूदी दक्षिणपंथ और हिंदुत्व में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है. वे कहते हैं, ''इसराइल अपने जीडीपी का 20 फ़ीसदी से अधिक शिक्षा पर ख़र्च करता है. हिंदुत्व की सरकार ढाई से तीन फ़ीसदी में ही अटकी है. साइंस और अर्थशास्त्र में सबसे ज़्यादा नोबेल सम्मान पाने वाले यहूदी हैं. हिंदू आपको गिने-चुने मिलेंगे, वो भी हिंदुत्व की राजनीति के घोर विरोधी लोग हैं.''

''हिंदुत्व की राजनीति मध्यकालीन सोच से आगे नहीं बढ़ पा रही है. जबकि यहूदियों के बनाए तकनीक से अरब के देश समंदर से पानी साफ़ करके पी रहे हैं. पूरी दुनिया इसराइली तकनीक का लोहा मान रही है. हिंदुत्व की राजनीति से भला किसका जीवन आसान हुआ है? इसलिए दोनों की तुलना कई मोर्चों पर तार्किक नहीं है.''

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हिंदुत्व की राजनीति और यहूदी प्रेम

लेकिन क्या वाक़ई हिंदुत्व की राजनीति यहूदियों की समर्थक रही है? अगर ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को उठाकर देखें, तो ऐसा नहीं है. विनायक दामोदर सावरकर को उनके आलोचक और समर्थक दोनों हिंदू राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के जनक के तौर पर देखते हैं.

जेल में रहने के दौरान ही 1923 में सावरकर की किताब 'हिंदू नेशनलिज़म: हिंदुत्व; हू इज अ हिंदू' प्रकाशित हुई थी. ब्रिटिश सरकार ने इन्हें जेल में डाला था. इस किताब के प्रकाशन के बाद 'हिंदुत्व' टर्म आगे चलकर बहुत लोकप्रिय हुआ. बीजेपी और आरएसएस ने भी सावरकर के हिंदुत्व को स्वीकार किया और आडवाणी भी इसी आधार पर भारतीयों की जन्मभूमि और पुण्यभूमि की बात करते थे.

सावरकर राजनीति परिदृश्य में 1930 के दशक में आते हैं. यह वक़्त दूसरे विश्व युद्ध का था. इस दौरान सावरकर ने इटली और जर्मनी का जमकर बचाव किया था. सावरकर को 1937 में हिंदू महासभा का अध्यक्ष बनाया गया था और वे 1942 तक अध्यक्ष रहे थे. उनका अध्यक्षकाल भारत और अंतरराष्ट्रीय इतिहास के लिए काफ़ी संवेदनशील दौर था. वैचारिक स्तर पर आरएसएस और हिंदू महासभा में बहुत गहरा संबंध था.

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संबंधों को इससे भी समझा जा सकता है कि आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार 1926 से 1931 तक हिंदू महासभा के सचिव रहे थे.

सावरकर के भाषण मुख्य रूप से दो विषयों पर केंद्रित रहते थे. एक अंतरराष्ट्रीय स्थिति और दूसरा हिंदू-मुस्लिम संबंध. जेल से निकलने के बाद सावरकर जब राजनीति में आए, तो वो दौर रोम-बर्लिन एक्सिस और इसमें जापान के शामिल होने का था.

मतलब इटली और जर्मनी की फासीवादी सरकारों और जापान के साथ आने के लिए 1936 में समझौता हुआ था. कहा जाता है कि इस अहम घटना को हिंदू महासभा और हिंदू अतिवादी राष्ट्रवादियों ने अपने पक्ष में लिया.

सावरकर ने एक अगस्त, 1938 को पुणे में क़रीब 20 हज़ार लोगों की भीड़ के सामने भाषण दिया. इस भाषण में उन्होंने जर्मनी में नाज़ीवाद और इटली में फासीवाद का समर्थन करते हुए कहा, ''भारत को किसी वाद को लेकर विरोध या समर्थन नहीं करना चाहिए. जर्मनी को नाज़ीवाद और इटली को फासीवाद की राह पर जाने का पूरा हक़ है. उन्हें वर्तमान हालात में जो भी उनके हक़ में लग रहा है, उसे चुना है. बोल्शेविक रूस को अच्छा लग रहा है और ब्रिटेन को लोकतंत्र.'' (हिंदू महासभा के बॉम्बे ऑफिस से जारी प्रेस नोट)

जर्मनी में नाज़ीवाद और इटली में फासीवाद के बचाव में सावरकर ने नेहरू पर भी हमला बोलना शुरू कर दिया था. सावरकर ने पुणे के ही भाषण में कहा था, ''जर्मनी, जापान, रूस या इटली को बताने वाले हम कौन होते हैं कि वहाँ की सरकार किस नीति को अपनाए. क्या केवल इसलिए कि हमारा एक ख़ास नीति से अकादमिक प्रेम है? ज़ाहिर सी बात है कि जर्मनी के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा, इसके बारे में पंडित नेहरू से हिटलर को ज़्यादा पता है. यह तथ्य है कि जर्मनी और इटली, नाज़ीवाद और फासीवाद के बाद ज़्यादा ताक़तवर हुए हैं. दोनों विचारधारा उनके लिए जादू की छड़ी और उनकी सेहत के हिसाब से टॉनिक साबित हुई हैं.''

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सावरकर ने अपने भाषण में कहा था, ''अपनी ज़रूरत के हिसाब से भारत किसी ख़ास तरह की सरकार को स्वीकार या नकार सकता है. लेकिन पंडित नेहरू जर्मनी और इटली के ख़िलाफ़ सभी भारतीयों के प्रतिनिधि बनकर खड़े होने लगते हैं. पंडित नेहरू कांग्रेस के एक तबके की तरफ़ से भले विरोध कर सकते हैं. नेहरू को इस मामले में स्पष्ट कर देना चाहिए कि वे जर्मनी, इटली, जापान और अन्य देशों के बारे में अपनी दुर्भावना व्यक्त करते हैं तो देश के करोड़ों सनातनी हिंदू उनके साथ नहीं होते हैं.''

सावरकर की अध्यक्षता में हिंदू महासभा का मुस्लिम विरोधी एजेंडा खुलकर सामने आया था. दूसरी तरफ़ जिस नाज़ीवाद का सावरकर समर्थन कर रहे थे, वो अल्पसंख्यक यहूदियों के ख़िलाफ़ अत्याचार और नफ़रत को बढ़ावा दे रहा था. सावरकर ने अपने कई भाषणों में हिटलर के यहूदी विरोधी एजेंडे का समर्थन किया.

14 अक्तूबर, 1938 को सावरकर ने भारत में मुसलमानों की समस्या के समधान के रूप में कहा था, ''एक देश वहाँ की बहुसंख्यक आबादी से बनता है. जर्मनी में यहूदी क्या कर रहे हैं? वे अल्पसंख्यक हैं और उन्हें जर्मनी छोड़ देना चाहिए. जर्मनी में जर्मनों का राष्ट्रवादी आंदोलन है, लेकिन यहूदी वहाँ सांप्रदायिक हैं. राष्ट्रीयता साझे भौगोलिक क्षेत्र पर निर्भर नहीं हो सकती बल्कि इसका संबंध वैचारिक, धार्मिक, भाषिक और सांस्कृतिक एकता से है. ऐसे में एक राष्ट्र के तौर पर जर्मन और यहूदी साथ नहीं रह सकते.''

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2003 में भारत के दौरे पर आए तत्कालीन इसराइली प्रधानमंत्री एरियल शरोन अटल बिहारी वाजपेयी के साथ

जिस सावरकर ने यहूदियों पर अत्याचार करने वाले हिटलर का समर्थन किया था, उनकी बीजेपी और आरएसएस में काफ़ी प्रतिष्ठा है. इन्हीं सावरकर की तस्वीर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संसद के सेंट्रल हॉल में नेहरू जैसी हस्तियों के साथ लगवाई थी.

उसके बाद से बीजेपी की सरकारों ने सावरकर की जयंती और पुण्यतिथि पर सेंट्रल हॉल में श्रद्धांजलि अर्पित करना शुरू किया. सावरकर को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के मन में भी अपार श्रद्धा है.

खाड़ी के कई देशों में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं कि बीजेपी नेताओं या भारत की घरेलू राजनीति में इसराइल को लेकर जो भी सोच हो, लेकिन विदेश नीति के तौर पर देखें तो इसराइल के साथ भारत के संबंध में एक किस्म की निरंतरता है.

वे कहते हैं, ''बीजेपी की जो विचारधारा है, उसके आधार पर वैसी विचारधारा वाली पार्टियों से संबंध जोड़ सकते हैं. ऐसा वामपंथी पार्टियों के साथ देखेंगे, तो मिलेगा. संभव है कि सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी से भी किसी का कोई संबंध निकल आए. लेकिन दो देशों का संबंध पारस्परिक हितों से आगे बढ़ता है न कि सांप्रदायिक एंगल से संबंध आगे बढ़ते हैं.''

तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''सांप्रदायिक एंगल ही कारगर होता तो पाकिस्तान खाड़ी के देशों का सबसे लाडला होता लेकिन ऐसा नहीं है. खाड़ी के देशों को पता है कि तेल भारत ही ख़रीदेगा. पाकिस्तान उनके लिए बोझ है और बोझ कोई नहीं उठाना चाहता है. भारत और इसराइल के संबंधों को केवल इस्लामिक चरमपंथियों के ख़िलाफ़ गठजोड़ के रूप में नहीं देख सकते. दोनों देशों का संबंध समय और हालात की मांग के हिसाब से आगे बढ़ रहा है. आप देखें कि मोदी जी हिंदूवादी नेता हैं, लेकिन उनके कार्यकाल में अरब देशों से कारोबार और बढ़े हैं. उन्हें सऊदी और यूएई ने अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान भी दिया.''

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इसराइल का जन्म

मध्य-पूर्व में यहूदी मुल्क इसराइल का गठन संयुक्त राष्ट्र के ज़रिए 1948 में किया गया. यानी भारत की आज़ादी के लगभग एक साल बाद. इसराइल बनने के पहले फ़लस्तीनी इलाक़े में यहूदी शरणार्थी के तौर पर रह रहे थे.

इसराइल के गठन में अमेरिका और ब्रिटेन की भी अहम भूमिका रही. यहूदी मूल रूप से फ़लस्तीनी इलाक़े के थे, लेकिन 71 ईस्वी में रोमन-यहूदी युद्ध में उन्हें बेदख़ल होना पड़ा था. पहले विश्व युद्ध के बाद फ़लस्तीन ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया. इसके बाद बड़ी संख्या में यहूदी वापस आने लगे जबकि यहाँ अरब के लोग रह रहे थे.

अरबों के बीच डर पैदा होने लगा कि उनकी ज़मीन पर यहूदी बस रहे हैं. अरबों ने यहूदियों के आने का विरोध किया और उन्होंने अपने लिए स्वतंत्र फ़लस्तीन की मांग की. लेकिन 1933 के बाद जर्मनी में यहूदियों पर अत्याचार के कारण उनका आना जारी रहा और 1940 के अंत तक फ़लस्तीनी आबादी में आधे यहूदी हो गए.

1937 में ब्रिटिश शासन ने पील कमिशन का गठन किया ताकि इस समस्या को दो मुल्कों का गठन कर सुलझाया जा सके. एक मुल्क अरबों के लिए और एक यहूदियों के लिए. लेकिन अरबों ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह से नकार दिया.

1939 में ब्रिटिश सरकार ने समस्या को सुलझाने के लिए अगले 10 साल में अरबों के लिए एक मुल्क का गठन और यहूदियों के आने पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा लेकिन इस बार यहूदियों ने इसे नकार दिया.

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दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश शासन कमज़ोर हो चुका था और उसे लगा किया यह समस्या अब उससे नहीं सुलझेगी. ऐसे में उसने संयुक्त राष्ट्र से कहा कि वही इस जटिल समस्या को सुलझाए.

इसका नतीजा यह हुआ कि नवंबर, 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने फ़लस्तीन के विभाजन का प्रस्ताव पास किया और एक यहूदी मुल्क बनाने का रास्ता साफ़ हुआ. मई 1948 में डेविड बेन ग्युरियन ने स्वतंत्र देश इसराइल की घोषणा की और वही इसराइल के पहले प्रधानमंत्री बने.

इस नए-नवेले देश पर बनने के बाद ही मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, इराक़ और लेबनान ने हमला कर दिया. अपने गठन के बाद से इसराइल प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अरब देशों से युद्ध में शामिल रहा. इसराइल बनने के बाद से मध्य-पूर्व इसराइल और अरब के देशों के बीच का जंग का मैदान बन गया.

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भारत की ना

भारत और इसराइल के राजनयिक संबंधों का इतिहास बहुत लंबा नहीं है. भारत ने इसराइल के बनने के तुरंत बाद एक स्वतंत्र मुल्क के रूप में मान्यता नहीं दी थी. भारत इसराइल के गठन के ख़िलाफ़ था.

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इसके ख़िलाफ़ वोट किया था. भारत के समर्थन के लिए मशहूर वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने नेहरू को ख़त लिखा था. लेकिन नेहरू ने आइंस्टाइन के ख़त को भी नकार दिया था.

आइंस्टाइन ने नेहरू को लिखे खत में कहा था, ''सदियों से यहूदी दरबदर स्थिति में रहे हैं और इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ रहा है. लाखों यहूदियों को तबाह कर दिया गया है. दुनिया में कोई ऐसी जगह नहीं है, जहाँ वे ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सकें. एक सामाजिक और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के नेता के रूप में मैं आपसे अपील करता हूँ कि यहूदियों का आंदोलन भी इसी तरह का है और आपको इसके साथ खड़ा रहना चाहिए.''

नेहरू ने आइंस्टाइन को जवाब में लिखा था, ''मेरे मन में यहूदियों को लेकर व्यापक सहानुभूति है. मेरे मन में अरबों को लेकर भी सहानुभूति कम नहीं है. मैं जानता हूँ कि यहूदियों ने फ़लस्तीन में शानादार काम किया है. लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में बड़ा योगदान दिया है, लेकिन एक सवाल मुझे हमेशा परेशान करता है. इतना होने के बावजूद अरब में यहूदियों के प्रति भरोसा क्यों नहीं बन पाया?''

आख़िरकार 17 सितंबर 1950 को नेहरू ने इसराइल को मान्यता दी. नेहरू ने कहा था कि इसराइल एक सच है. उन्होंने कहा था कि तब इसलिए परहेज़ किया था क्योंकि अरब देश भारत के गहरे दोस्त थे और उनके ख़िलाफ़ नहीं जा सकते थे.

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आइंस्टाइन ने नेहरू को लिखी थी चिट्ठी

हालाँकि इसके बावजूद राजनयिक संबंध स्थापित नहीं हुए. भारत ने आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण इसराइल से दूरी बनाई रखी. भारत को 1947 में आज़ादी के बाद आर्थिक और औद्योगिक विकास के लिए अमेरिका और यूएसएसआर दोनों से फंड की ज़रूरत थी.

दूसरी तरफ़ अपने गठन के बाद से ही इसराइल अमेरिकी खेमे में था. वहीं भारत गुटनिरपेक्ष की नीति को लेकर आगे बढ़ रहा था.

यह नीति किसी भी खेमे में शामिल होने के ख़िलाफ़ थी. तब भारत का अरब वर्ल्ड से अच्छा संबंध था. भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतें अरब वर्ल्ड से ही पूरी कर रहा था और बड़ी संख्या में भारत के लोग भी अरब के देशों में नौकरी कर रहे थे और इन्हें भारत में विदेशी मुद्रा भेजने का अहम स्रोत माना जाता था.

भारत में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी भी है और इसराइल से दूरी बनाए रखने में एक कारण इसे भी माना जाता है. लेकिन 1991 में खाड़ी के युद्ध के बाद स्थिति बदली और इसराइल मध्य-पूर्व में एक ताक़तवर मुल्क बनकर उभरा.

दूसरी तरफ़ शीत युद्ध के अंत के बाद भी दुनिया की तस्वीर बदल गई थी. तब तक भारत के सैनिकों को हथियारों की आपूर्ति सोवियत यूनियन से ही होती थी. सोवियत यूनियन के पतन के बाद भारत को भी सैन्य आपूर्ति के लिए एक भरोसेमंद साथी की तलाश थी.

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तब इसराइल और अमेरिका भारत की ज़रूरतें पूरी कर सकते थे. लेकिन भारत का संबंध अमेरिका के साथ शीत युद्ध से ही सामान्य नहीं था. अमेरिका की दोस्ती तब पाकिस्तान से थी क्योंकि शीत युद्ध में पाकिस्तान अमेरिका के साथ था. ऐसे में भारत यूएसएसआर के पतन के बाद भी रूस का क़रीबी रहा.

तब भारत का इसराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं था जबकि इसराइल का अमेरिका से बहुत ही क़रीबी रिश्ता था. अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपने वीटो पावर का इस्तेमाल कम से कम 33 बार इसराइल के लिए किया है.

इसराइल सैन्य हथियारों की आपूर्ति भारत में कर सकता था, लेकिन इसके लिए अमेरिकी मंज़ूरी ज़रूरी होती थी क्योंकि दोनों देश मिलकर उत्पादन करते थे.

मध्य-पूर्व मामलों के जानकार क़मर आग़ा कहते हैं, ''सोवियत यूनियन के बिखरने के बाद भारत को अंतरराष्ट्रीय मसलों पर सुपरपावर के समर्थन की ज़रूरत थी. शीत युद्ध के अंत के बाद दुनिया में एक ही सुपर पावर बचा था और वो अमेरिका था.''

''ऐसे में भारत ने इसराइल के साथ राजनयिक रिश्ते क़ायम करने का फ़ैसला किया और यह अमेरिका के लिए एक संदेश के तौर पर देखा गया कि भारत शीत युद्ध के बाद अपनी विदेश नीति की समीक्षा कर रहा है.''

दिलचस्प यह है कि अरब देशों से अच्छे संबंध होने के बावजूद अरब लीग से भारत को कश्मीर के मसले पर समर्थन नहीं मिला. हमेशा इस मामले में अरब लीग पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा.

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1978 में इसराइल का मिस्र और अन्य अरब देशों के साथ कैंप डेविड समझौता हुआ. इसके तहत अरब के कुछ देशों ने इसराइल से राजनयिक रिश्ता स्थापित करने का फ़ैसला किया. भारत को कैंप डेविड समझौते से भी इसराइल को लेकर अपनी नीति बदलने में मदद मिली.

इसके बाद पश्चिम एशिया शांति प्रक्रिया शुरू हुई और भारत इसमें हिस्सा लेना चाहता था. इसके लिए अमेरिका और इसराइल ने भारत के सामने शर्त रखी थी कि वो जब तक पूरी तरह राजनयिक संबंध क़ायम नहीं कर लेता है, तब तक इसमें शामिल नहीं हो सकता.

इसराइल के विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत के लिए पश्चिम एशिया शांति प्रक्रिया में शामिल होना प्रतिष्ठा का विषय बन गया था. ऐसे में 23 जनवरी, 1992 को भारत के तत्कालीन विदेश सचिव जेएन दीक्षित ने इसराइल के साथ राजनयिक रिश्ते क़ायम करने की घोषणा की.

जेएन दीक्षित ने इस घोषणा को लेकर कहा था, ''मुझे इसराइल के साथ पूर्ण राजनयिक रिश्ते क़ायम करने और दोनों देशों में एक दूसरे के दूतावास खोलने की औपचारिक घोषणा के लिए कहा गया था. मैंने इसकी घोषणा 24 जनवरी को की.'' इसराइल के साथ राजनयिक रिश्ते क़ायम करने में तीन कारकों को सबसे अहम माना जाता है.

24 जनवरी, 1992 को चीन ने इसराइल से राजनयिक रिश्ता क़ायम कर लिया था.

मॉस्को में तीसरे चरण की मध्य-पूर्व शांति वार्ता शुरू हुई थी, जो 1992 में 28 जनवरी से 29 जनवरी तक चली.

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में शामिल होने अमेरिका के आधिकारिक दौरे पर 1991 के फ़रवरी महीने में गए थे. इस दौरे को इसराइल से राजनयिक रिश्ता क़ायम करने की शुरुआत माना जाता है.

जेएनयू में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफ़ेसर पीआर कुमारस्वामी ने 2002 में एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि 1947 के बाद से ही अमेरिका ने इसराइल को भारत से रुख़ बदलने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया था. यह कोई संयोग या हादसा नहीं था. नरसिम्हा राव के अमेरिकी दौरे से ही स्पष्ट हो गया था.''

इंडिया इसराइल पॉलिसी नाम की अपनी किताब में कुमारस्वामी ने लिखा है कि भारत को डर था और आशंका थी कि इसराइल से पूर्ण राजनयिक रिश्ते क़ायम करने से मध्य-पूर्व के और देश नाराज़ न हो जाएँ, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

हालाँकि जेएन दीक्षित ने लिखा है कि उन्हें प्रधानमंत्री राव ने निर्देश दिया था कि अरब देशों में भारत के सभी राजदूतों को समझा दिया जाए ताकि वे अपनी बात ठीक से रख सकें.

जेएन दीक्षित ने अरब देशों की नाराज़गी को लेकर अपनी किताब 'माई साउथ ब्लॉक इयर्स: मेमोरिज ऑफ़ अ फ़ॉरेन सेक्रेटरी' में लिखा है, ''अरब देशों के कुछ राजदूतों ने भारत के इस फ़ैसले को लेकर आपत्ति जताई और कहा कि भारत को इसका ख़मियाज़ा भुगतना पड़ेगा. हमने फ़ैसला किया कि जो आपत्ति जता रहे हैं, उन्हें सीधा जवाब देना है, झुकना नहीं है.''

''मैंने कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मसलों पर कई इस्लामिक देशों का समर्थन किया लेकिन कश्मीर के मामले में हमे समर्थन नहीं मिला. मैंने ये भी कहा कि भारत अपनी संप्रभुता में किसी किस्म की दख़लअंदाज़ी के सामने नहीं झुकेगा और अपने हितों के लिए काम करना जारी रखेगा. अरब के मीडिया में भारत की आलोचना हुई. कुछ लोगों ने भारत के इस फ़ैसले पर सवाल उठाए. लेकिन इससे भारत और अरब के संबंध प्रभावित नहीं हुए.''

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आज़ादी के बाद से भारत के संबंध मध्य-पूर्व और अरब के मुस्लिम देशों से संबंध काफ़ी गहरे रहे लेकिन कश्मीर के मामले में इनका रुख़ पाकिस्तान के साथ ही रहा. 1969 में मोरक्को के रबात में इस्लामिक देशों के शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया और इसमें शामिल होने के लिए भारत को भी बुलाया गया था. लेकिन पाकिस्तान के विरोध के बाद भारत से आमंत्रण वापस ले लिया गया.

1971 में ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी का गठन हुआ तो इसका भी कश्मीर को लेकर रुख़ पाकिस्तान के पक्ष में ही रहा. 1991 में ओआईसी के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन कराची में हुआ और इसमें जम्मू-कश्मीर में फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग मिशन भेजने का प्रस्ताव पास किया गया. भारत ने इस मिशन को अनुमति नहीं दी. इसके बाद ओआईसी ने भारत की निंदा की.

कई लोग मानते हैं कि भारत ने मध्य-पूर्व के इस्लामिक देशों के पाकिस्तान परस्त रुख़ को देखते हुए इसराइल को गले लगाया. भारत के पास एक तर्क ये भी था कि इसराइल एक लोकतांत्रिक देश है.

हालांकि तलमीज़ अहमद कहते हैं कि ओआईसी प्रेस रिलीज़ जारी करने से ज़्यादा की हस्ती नहीं रखता है इसलिए ओआईसी के बयान के आईने में भारत-अरब के संबंधों को नहीं देखना चाहिए.

तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''शुरू में हमलोग ओआईसी के बयान का जवाब भी देते थे लेकिन बाद में अरब के देशों ने ही कहा कि ओआईसी के बयान को उनका आधिकारिक बयान न मानें. इसलिए इससे परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. बाद में हमने तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह से कहा कि ओआईसी के बयान पर प्रतिक्रिया देने की ज़रूरत नहीं है और तब से हमने नोटिस करना भी बंद कर दिया था.''

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बीजेपी सरकारें और इसराइल

केंद्र में पहली बार बीजेपी के नेतृत्व में सरकार आई और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो इसराइल के साथ रिश्ते में और गहराई आई. वाजपेयी के शासन काल में इसराइल के साथ आर्थिक, सामरिक, विज्ञान-तकनीक और कृषि के क्षेत्र में कई अहम समझौते हुए.

वाजपेयी सरकार में दोनों देशों के बीच कई द्विपक्षीय दौरे हुए. 1992 में इसराइल से राजनयिक संबंध क़ायम होने के बाद भारत की ओर से पहली बार 2000 में तत्कालीन गृह मंत्री आडवाणी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने इसराइल का दौरा किया.

लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब 'माई कंट्री माई लाइफ़' में अपने इसराइल दौरे को लेकर लिखा है, ''जून 2000 में इसराइल की मेरी पाँच दिवसीय यात्रा से उस देश के साथ मेरे पुराने संबंध फिर से ताज़ा हो गए. नई परिस्थितियों में मित्रता बढ़ाने और द्विपक्षीय सहयोग को सशक्त करने में बड़े उपयोगी साबित हुए. 1995 में भाजपा अध्यक्ष के रूप में मैं इसराइल गया था. दोनों देशों, जिनमें कई बातों में समानता है, के बीच राजनयिक संबंधों के पूर्ण सामान्यीकरण में अपनी भूमिका पर मुझे गर्व है.''

इस दौरे में आडवाणी ने फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात से ग़ज़ा में मुलाक़ात की थी. इस दौरे में आडवाणी ने इसराइल से परमाणु सहयोग बढ़ाने की वकालत की थी.

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इसके बाद इसराइल के प्रधानमंत्री एरिएल शरोन 2003 में भारत दौरे पर आए और यह दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए काफ़ी अहम साबित हुआ. रूस के बाद आज की तारीख़ में इसराइल भारत के लिए सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता देश है.

2017 जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसराइल के दौरे पर गए और यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला इसराइल दौरा था. अब तक कोई भी भारत से उच्चस्तरीय नेता इसराइल जाता था. तो फ़लस्तीनी क्षेत्र में ज़रूर जाता था, लेकिन मोदी इस दौरे में फ़लस्तीनी इलाक़े में नहीं गए और न ही इस दौरे में फ़लस्तीनियों का एक बार भी नाम लिया था.

हालाँकि 2018 में मोदी अलग से फ़लस्तीनी इलाक़े गए. कहा जाता है कि भारत को अमेरिका के क़रीब लाने में इसराइल का सबसे बड़ा हाथ है. अमेरिका में यहूदी लॉबी को बहुत शक्तिशाली माना जाता है और बीजेपी शासन में भारत की इस लॉबी से क़रीबी रहती है.

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