यूपी में बीते छह दिनों से अटकी हुई हैं एंबुलेंस सेवाएं, चालक और टेक्नीशियनों की हड़ताल

  • समीरात्मज मिश्र
  • लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
यूपी

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उत्तर प्रदेश में क़रीब बीस हज़ार एंबुलेंस चालक और मेडिकल टेक्नीशियन पिछले छह दिन से हड़ताल पर हैं.

पांच हज़ार से ज़्यादा एंबुलेंस सभी ज़िलों में खड़ी हैं, मरीज़ इधर-उधर भटक रहे हैं और सरकार कर्मचारियों की मांगों पर विचार करने के बजाय एंबुलेंस संचालन के दूसरे विकल्पों पर विचार कर रही है.

राज्य में तीन तरह की एंबुलेंस सेवाएं 108 नंबर, 102 नंबर और एडवांस्ड लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम यानी एएलएस संचालित होती हैं और ये सभी सेवाएं निजी हाथों में हैं.

एएलएस एंबुलेंस सेवा देने वाली पुरानी कंपनी का टेंडर ख़त्म होने के बाद सरकार ने नई कंपनी को टेंडर दिया है और कर्मचारियों का आरोप है कि नई कंपनी उन्हें नौकरी से निकालकर नए सिरे से भर्ती कर रही है.

कर्मचारियों की इसके अलावा भी कई मांगें हैं जिनके लिए वो पिछले क़रीब एक हफ़्ते से लखनऊ के ईको गार्डन में प्रदर्शन कर रहे हैं. वहीं सरकार ने हड़ताली कर्मचारियों के ख़िलाफ़ सख़्त रुख़ अपनाते हुए कंपनी से उनकी बर्ख़ास्तगी की प्रक्रिया शुरू करने को कहा है.

हड़ताल में शामिल 570 कर्मचारियों को दो दिन पहले ही बर्ख़ास्त कर दिया गया और यह प्रक्रिया अभी भी जारी है. कंपनी ने यह क़दम सरकार के निर्देश के बाद उठाया है और सबसे पहले संघ के पदाधिकारियों पर बर्ख़ास्तगी की कार्रवाई की है.

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क्या कहना है हड़ताली कर्मचारियों का

राज्य के लगभग सभी ज़िलों में एंबुलेंस संघ के पदाधिकारियों को नौकरी से हटा दिया गया है. वहीं कर्मचारियों का कहना है कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, वो हड़ताल के अपने फ़ैसले पर डटे रहेंगे.

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लखनऊ के ईको गार्डन में धरना दे रहे एंबुलेंस कर्मी आदित्य पाठक कहते हैं, "जनता की परेशानियों को देखकर कई जगह हम लोग एंबुलेंस चला रहे हैं. सारे ज़िलों में वहां की संख्या के हिसाब से कुछ स्टाफ़ मौजूद है ताकि इमर्जेंसी सेवाएं बाधित न होने पाएं. लेकिन सरकार और एंबुलेंस संचालन करने वाली कंपनी हम लोगों को लगातार धमका रही हैं और हड़ताल ख़त्म करने का दबाव बना रही हैं."

"नई कंपनी ने हमारे साथ मौखिक रूप से समझौता किया था कि बीस हज़ार रुपये हम लोगों को नहीं देने होंगे और हमें वो नौकरी पर रखेंगे, लेकिन बाद में कंपनी इस समझौते से मुकर गई. हमारे नेताओं को जेल भेज दिया गया है. यूनियन के अध्यक्ष हनुमान पांडेय का पता ही नहीं चल रहा है कि वो उन्हें कहां रखा गया है."

राज्य में एएलएस एंबुलेंस सेवाओं का संचालन अब तक जीवीके एमआरआई कंपनी कर रही थी लेकिन पिछले दिनों राज्य सरकार ने यह काम जिगित्ज़ा हेल्थ केयर नामक कंपनी को दे दिया. एंबुलेंस कर्मियों का आरोप है कि नई कंपनी ने क़रीब 1200 पुराने कर्मचारियों को नौकरी से हटाकर नई भर्ती शुरू कर दी है.

आदित्य पाठक कहते हैं कि नए कर्मचारियों के साथ ही पुराने कर्मचारियों से भी बीस-बीस हज़ार रुपये जमा करने को कहा जा रहा है. इसी के विरोध में कर्मचारियों ने 26 जुलाई से ही एंबुलेंस खड़ी करके हड़ताल शुरू कर दी.

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हड़ताल से मरीज़ों का नुकसान

आंदोलन कर रहे एंबुलेंस कर्मचारियों की यह भी मांग है कि उन्हें सरकारी कर्मचारी बनाया जाए और ठेके की प्रथा ख़त्‍म कर दी जाए क्योंकि निजी कंपनियां हर समय उनका शोषण करती हैं और शिकायत करने पर नौकरी से निकालने की धमकी देती हैं.

कर्मचारियों को सबसे ज़्यादा पीड़ा इस बात की है कि कोरोना काल में अपनी और अपने परिवार की जान की परवाह न करते हुए एंबुलेंसकर्मियों ने अपना कर्तव्य निभाया और उसके बाद उन्हें नौकरी से निकाला जा रहा है.

रघुवीर सिंह भी एक एंबुलेंस चालक हैं. वो कहते हैं, "हमें अभी सरकार की तरफ से कोई सुविधा नहीं मिलती है. शासन की ओर से निर्धारित न्‍यूनतम वेतनमान भी हमें नहीं दिया जाता और अब हमें नौकरी से भी निकालने की साज़िश की जा रही है."

"सरकार ने कोरोना वॉरियर्स के लिए 50 लाख रुपये की घोषणा की है लेकिन हम लोग उसमें शामिल नहीं हैं. आज हमें कुछ हो जाता है तो हमारे परिवार के पास कोई सुरक्षा की गारंटी नहीं है. इसलिए हम चाहते हैं कि हमें भी नियमित कर्मचारी बनाया जाए और ठेका प्रथा ख़त्म की जाए."

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योगी का बयान

एंबुलेंस कर्मचारियों के हड़ताल पर चले जाने से सबसे ज़्यादा नुक़सान मरीजों को हो रहा है. एंबुलेंस न मिलने की वजह से मरीजों की मौत की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

कई स्‍थानों पर तो हालत यह है कि लोग ठेले और खाट पर मरीजों को लेकर आ रहे हैं. पूरे राज्य में क़रीब पांच हज़ार एंबुलेंस बंद पड़ी हैं. हालांकि हर ज़िले में कुछ एंबुलेंस का संचालन जारी है ताकि इमर्जेंसी सेवाएं बाधित न होने पाएं.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि एंबुलेंस सेवाओं को किसी भी दशा में बाधित नहीं होना चाहिए. एंबुलेंस सेवाएं बाधित करने की स्थिति में मुख्यमंत्री ने संबंधित एंबुलेंस सेवा प्रदाता के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. राज्य सरकार का दावा है कि इमर्जेंसी सेवाओं का सुचारू रूप से संचालन हो रहा है लेकिन एंबुलेंस के लिए भटकते और दम तोड़ते मरीजों की ख़बरें राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लगातार आ रही हैं.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह एंबुलेंस सेवाओं को बाधित करने के लिए कर्मचारी संघ के नेताओं को दोषी ठहराते हैं. बीबीसी से बातचीत में जय प्रताप सिंह कहते हैं, "यूनियन के नेताओं ने कर्मचारियों को उकसाया है ताकि नई कंपनी को कोई मैनपॉवर न मिले. जीवीके के मालिकों को भी नोटिस भेजा है कि कंपनी का पेमेंट रोक दिया जाएगा और उनके एग्रीमेंट को भी टर्मिनेट कर देंगे."

"उसके बाद जीवीके ने अपने 11 कर्मचारियों को बर्ख़ास्त कर दिया, कुछ के ख़िलाफ़ एफ़आईआर भी की गई है. ज़िला प्रशासन से कह दिया गया है कि हड़ताली कर्मचारियों से एंबुलेंस की चाबियां लेकर उन्हें संचालित करने की व्यवस्था कराएं."

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प्रशासन की कार्रवाई

स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह के मुताबिक एंबुलेंस चालकों की व्यवस्था के लिए ज़िला प्रशासन को कहा गया है लेकिन एंबुलेंस के संचालन के लिए कम से कम चार लोगों की ज़रूरत पड़ती है जिसमें मेडिकल टेक्नीशियनंस भी होते हैं. ऐसी स्थिति में आपातकालीन एंबुलेंस संचालन के लिए प्रशिक्षित स्टाफ़ का मिलना आसान नहीं है.

इस बीच, कई ज़िलों में ज़िला प्रशासन ने एंबुलेंस चालकों से चाबियां लेकर एंबुलेंस खड़ी करा ली हैं.

लखनऊ में भी ज़िला प्रशासन ने हड़ताल कर रहे एम्बुलेंस ड्राईवरों से गाडियाँ लेकर लालबाग गर्ल्स कॉलेज में जमा करा ली हैं जहां बड़ी संख्या में एंबुलेंस खड़ी हैं. कुछ जगहों पर रोडवेज कर्मचारियों की मदद से एंबुलेंस का संचालन किया जा रहा है लेकिन यह ज़्यादा दिनों तक संभव नहीं है.

एक ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "रोडवेजकर्मी और निजी चालकों से एंबुलेंस का संचालन कराया जा रहा है. लेकिन ये चालक एंबुलेंस चलाने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं. साथ ही, एंबुलेंस संचालन सिर्फ़ ड्राइवर के भरोसे नहीं रहता बल्कि उसमें प्रशिक्षित मेडिकल टेक्नीशियन भी होते हैं. यही वजह है कि एंबुलेंस होने के बावजूद फ़ोन आने पर तुरंत सेवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं."

कोविड की तीसरी लहर

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि एंबुलेंस जैसी ज़रूरी सेवाओं का इतने दिनों तक बाधित रहना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है.

लखनऊ में निजी अस्पताल चलाने वाले डॉक्टर सुरेश किशोर कहते हैं, "कोविड की तीसरी लहर को देखते हुए जहां सरकार को अपनी तैयारी और सुव्यवस्थित करनी चाहिए थी, वहीं एंबुलेंस जैसी ज़रूरी सेवाएं ठप पड़ी हैं. कोरोना की दूसरी लहर के दौरान इन्हीं एंबुलेंस चालकों और स्टाफ़ ने दिन-रात मेहनत की थी. उनकी ज़रूरी मांगें मान ली जानी चाहिए."

डॉक्टर सुरेश किशोर कहते हैं कि सरकारी एंबुलेंस सेवाओं की ज़रूरत सबसे ज़्यादा ग़रीब तबके को पड़ती है और उसी तबके को ही इस हड़ताल से सबसे ज़्यादा नुक़सान भी हो रहा है.

उनके मुताबिक, "सक्षम लोग प्राइवेट अस्पतालों में जाते हैं और प्राइवेट अस्पतालों के पास अपनी एंबुलेंस होती हैं. ऐसे में इन सरकारी एंबुलेंस सेवाओं के ठप रहने का उन पर कोई असर नहीं होगा. मुझे लगता है कि यही वजह है कि हड़ताली कर्मचारियों को काम पर वापस लाने की कोई ख़ास कोशिश भी नहीं हो रही है."

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