डॉ. कफ़ील ख़ान को इलाहाबाद हाई कोर्ट से राहत, भड़काऊ भाषण वाले मामले में कार्यवाही रद्द

  • समीरात्मज मिश्र
  • बीबीसी हिंदी के लिए
डॉ. कफील खान

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज में अध्यापक रहे डॉ कफ़ील ख़ान के ख़िलाफ़ सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर भड़काऊ भाषण के मामले में लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है.

कफ़ील ख़ान के ख़िलाफ़ साल 2019 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दिए गए भाषण के ख़िलाफ़ यह केस दर्ज किया गया था.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए उनके कथित भड़काऊ भाषण के बाद शुरू की गई पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है. अदालत ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अलीगढ़ के संज्ञान आदेश को भी रद्द कर दिया.

इसी मामले में यूपी सरकार ने डॉक्टर कफ़ील ख़ान के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून यानी एनएसए भी लगाया गया था और इसी आधार पर हाईकोर्ट ने एनएसए की कार्यवाही को भी रद्द कर दिया था.

डॉ कफ़ील ख़ान के वकील मनीष सिंह ने बीबीसी को बताया, "कोर्ट का कहना था कि मुक़दमा चलाने से पहले ज़रूरी अनुमति भी नहीं ली गई. इसीलिए इस मामले को पूर्ण रूप से अपास्त यानी ख़त्म कर दिया है. कोर्ट ने यह भी कहा है कि इस मामले में जब तक अभियोजन पूर्व स्वीकृति नहीं लेंगे, तब तक यह मामला नहीं चलेगा. जिस आधार पर एनएसए को रद्द किया था, उसी आधार पर इसे भी रद्द कर दिया है."

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क्या था मामला

13 दिसंबर 2019 को अलीगढ़ में डॉ कफ़ील ख़ान के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के मामले में धारा 153 ए के तहत केस दर्ज किया गया था.

आरोप था कि 12 दिसंबर को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों के सामने दिए गए संबोधन में उन्होंने धार्मिक भावनाओं को भड़काया और एक ख़ास समुदाय के प्रति नफ़रत फैलाने की कोशिश की.

इसी केस के आधार पर 29 जनवरी 2020 को डॉ कफ़ील ख़ान को यूपी एसटीएफ़ ने मुंबई से गिरफ़्तार किया था. उसी साल 10 फ़रवरी को अलीगढ़ की सीजेएम कोर्ट ने इस मामले में ज़मानत के आदेश दिए थे लेकिन उनकी रिहाई से पहले ही राज्य सरकार ने उन पर एनएसए लगा दिया गया.

डॉ कफ़ील ख़ान की ओर से हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा गया था कि उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दाख़िल करने से पहले सरकार की पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी. कफ़ील के वकील मनीष सिंह कहते हैं कि सीआरपीसी की धारा 196 अनुसार, आईपीसी की धारा 153 ए, 153 बी, 505 (2) के तहत अपराध का संज्ञान लेने से पहले, केंद्र सरकार या राज्य सरकार या ज़िला मजिस्ट्रेट से अभियोजन स्वीकृति की पूर्व अनुमति लेनी होती है.

उनके मुताबिक, याचिका में इसी आधार पर डॉक्टर कफ़ील के ख़िलाफ़ दर्ज एफ़आईआर और एनएसए को चुनौती दी गई थी.

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इस आदेश के बाद अपनी प्रतिक्रिया देते हुए डॉक्टर कफ़ील ने ख़ुशी जताते हुए कहा कि उन्हें शुरू से न्यायपालिका पर भरोसा रहा है और आगे भी रहेगा.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "अफ़सोस की बात है कि जिस भाषण के आधार पर मुझ पर एनएसए लगाया गया, देशद्रोही तक बताने की कोशिश की गई, उसमें मैंने राष्ट्रीय एकता की बात कही थी. मुझे बिना किसी अपराध के जेल में रखा गया, प्रताड़ित किया गया लेकिन हर क़दम पर अदालत सरकार की कार्रवाई को ख़ारिज कर रहा है."

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में प्राध्यापक रहे डॉ कफ़ील को साल 2017 में ऑक्सीजन की कमी से कई बच्चों की मौत के बाद निलंबित कर दिया गया था. हालांकि जांच के बाद डॉक्टर कफ़ील को छोड़कर उनके साथ निलंबित किए गए अन्य सभी अभियुक्तों को बहाल कर दिया गया है.

इस मामले में डॉ कफ़ील ख़ान को सितंबर 2017 में गिरफ़्तार किया गया और अप्रैल 2018 में उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया गया था.

इस केस में भी उन्हें उच्च न्यायालय की ओर से ज़मानत दी गई थी और अदालत ने कहा था कि डॉ कफ़ील ख़ान के ख़िलाफ़ लापरवाही के आरोपों को स्थापित करने के लिए कोई साक्ष्य मौजूद नहीं हैं. साल 2019 में विभागीय जांच की एक रिपोर्ट ने भी डॉ कफ़ील को क्लीन चिट दे दी थी लेकिन अभी तक उनका निलंबन वापस नहीं लिया गया है. डॉ कफ़ील इसके लिए कई बार सरकार को पत्र भी लिख चुके हैं.

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