तालिबान से बातचीत में भारत के सामने दुविधा क्या है?

  • दिलनवाज़ पाशा
  • बीबीसी हिंदी
काबुल, भारत

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भारत सरकार ने गुरुवार को अफ़ग़ानिस्तान के हालात पर सभी दलों से चर्चा की. सर्वदलीय बैठक के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत अफ़ग़ानिस्तान से अपने सभी नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए प्रतिबद्ध है.

सरकार ने 31 विपक्षी दलों के साथ हुई बैठक में कहा कि भारत की पहली प्राथमिकता अफ़ग़ानिस्तान में फंसे अपने नागरिकों को बाहर निकालना है. भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि भारत ने अफ़ग़ानिस्तान से अधिकतर भारतीयों को सुरक्षित निकाल लिया है, लेकिन कुछ अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में हैं.

इसी बीच अफ़ग़ानिस्तान संकट को लेकर भारत ने जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी बात की है.

इस सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और अधीर रंजन चौधरी के अलावा एनसीपी प्रमुख शरद पवार, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा और डीएमके के नेता टीआर बालू भी शामिल थे. केंद्रीय मंत्रियों में विदेश मंत्री एस जयशंकर के अलावा पीयूष गोयल और संसदीय कार्य मंत्री प्रल्हाद जोशी भी शामिल थे.

बैठक के दौरान विपक्ष ने सरकार को भरोसा दिया कि अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर वह सरकार के साथ है और ये पूरे देश की चिंता का विषय है.

भारत अफगानिस्तान सरकार का क़रीबी मित्र रहा है और भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में भारी निवेश किया है. अफ़ग़ानिस्तान में अचानक हुए सत्ता परिवर्तन ने भारत के सामने मुश्किल हालात पैदा किए हैं. भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने नागरिकों और अपने सहयोगियों को अफ़ग़ानिस्तान से सुरक्षित निकालने की है. वहीं अफ़ग़ानिस्तान में अपने हितों को बचाए रखना भी भारत के सामने एक दीर्घकालिक चुनौती है.

अभी भारत का पूरा ध्यान अफ़ग़ानिस्तान से अपने नागरिकों और भारत के अभियानों में मदद करने वाले अफ़ग़ानी लोगों को निकालने पर है.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेसंश की प्रोफ़ेसर डॉ. स्वास्ति राव कहती हैं, ''अभी तक भारत ऑपरेशन दैवीय शक्ति के ज़रिए अपने नागरिकों और सहयोगियों को निकालने में कहीं हद तक कामयाब रहा है. भारत अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगी देशों की मदद भी ले रहा है.''

स्वास्ति राव कहती हैं, 'भारत के सामने बड़ी चुनौती अपने निवेश और मध्य एशिया में अपने हितों को सुरक्षित करना भी है. भारत के लिए एक अच्छा पहलू ये है कि तालिबान ने सत्ता में आने से पहले या 2019 में कश्मीर का विशेषाधिकार ख़त्म करने के बाद से कश्मीर को लेकर कोई स्टैंड नहीं लिया है और तालिबान इसे भारत का अंदरूनी मामला मानता रहा है.''

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क्या सभी को निकाल पाएगा भारत?

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अमेरिकी सैन्यबल 31 अगस्त को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ देंगे. अभी काबुल हवाई अड्डा अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा में हैं और काबुल हवाई अड्डे के रास्ते ही लोगों को निकाला जा रहा है.

अमेरिका ने कहा है कि वह 31 अगस्त की समय सीमा तक अपने अभियान को पूरा कर लेगा. इसी बीच फ़्रांस ने कहा है कि वह शुक्रवार शाम को अफ़ग़ानिस्तान से लोगों को निकालने के अपने अभियान को समाप्त कर देगा.

ऐसे में सवाल ये उठता है कि यदि 31 अगस्त तक भारत काबुल से अपने लोगों को नहीं निकाल पाया तो क्या वो आगे निकाल पाएगा. इसे लेकर संदेह है.

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन से जुड़े शोधकर्ता कबीर तनेजा कहते हैं, ''काबुल से लोगों को अमेरिकी सुरक्षा के दायरे में निकाला जा रहा है. जब अमेरिकी सैनिक वापस लौट जाएंगे तो काबुल हवाई अड्डा तालिबान के हाथ में होगा. तालिबान कह भी चुका है कि 31 अगस्त की समयसीमा नहीं बढ़ाई जाएगी. 31 अगस्त के बाद किसी भी देश के लिए काबुल से अपने नागरिकों के निकालना बहुत मुश्किल होगा, भारत के लिए पश्चिमी देशों के मुकाबले और अभी अधिक मुश्किल होगा.''

ऐसे में यदि 31 अगस्त के बाद भी भारत को लोगों को अफ़ग़ानिस्तान से निकालने का अभियान चलाना पड़ा तो उसका रूट क्या हो सकता है? तनेजा कहते हैं, 'भारत के पास सीमित विकल्प बचेंगे. भारत या तो ताजिकिस्तान के दुशानबे के ज़रिए या फिर ईरान के रास्ते लोगों को निकाल सकता है.''

तालिबान ने कहा है कि वह 31 अगस्त के बाद भी उन लोगों को देश से बाहर जाने की अनुमति देगा जिनके पास वीज़ा और ज़रूरी दस्तावेज होंगे. 31 अगस्त के बाद काबुल हवाई अड्डा चल पाएगा या नहीं इसे लेकर अभी संशय है. तुर्की ने काबुल हवाई अड्डे की सुरक्षा अपने हाथ में लेने का इरादा ज़ाहिर किया था, लेकिन तुर्की अब काबुल से जा चुका है.

तनेजा कहते हैं, ''हो सकता है तालिबान की अनुमति से भारत उन लोगों को निकाल पाए जिनके पास देश से बाहर जाने की अनुमति हो, लेकिन यदि भारत ख़ुफ़िया तरीके से अपने सहयोगियों को वहां से निकालना चाहेगा तो इसके दो ही रास्ते बचेंगे एक ताजिकिस्तान और दूसरा ईरान.''

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भारत के रूस के ज़रिए ताजिकिस्तान के साथ नज़दीकी संबंध हैं. रूस के भारत से भी क़रीबी रिश्ते हैं और विश्लेषकों को उम्मीद है कि रूस भारत के तालिबान से रिश्ते बनाने में भी मदद कर सकता है.

वहीं प्रोफ़ेसर स्वास्ति राव कहती हैं, ''अफ़ग़ानिस्तान से इस समय चार बड़े देशों के हित जुड़े हैं. ईरान, रूस, चीन और भारत. पाकिस्तान वहां पहले से ही बड़ा प्लेयर है और तालिबान पर उसका प्रभाव है. भारत को ईरान और रूस की मदद से अपने रूट खुले रखने चाहिए. ईरान और रूस के दूतावास अभी भी वहां चल रहे हैं. ऐसे में ये देश भारत के लिए बड़े मददगार साबित हो सकते हें.''

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क्या भारत तालिबान से बात कर रहा है?

भारत ने अभी ये स्पष्ट नहीं किया है कि वह तालिबान से बात कर रहा है या नहीं. वहीं तालिबान नेताओं ने मीडिया को दिए बयानों में कहा है कि भारत और तालिबान के बीच कोई सीधी वार्ता नहीं हुई है.

हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि भारत अफ़ग़ानिस्तान से भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी को लेकर तालिबान के संपर्क में होगा. ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन से जुड़े कबीर तनेजा कहते हैं, ''अगर भारत तालिबान से बात नहीं कर रहा होगा तो ये आश्चर्य की बात होगी. किसी ना किसी स्तर पर भारतीयों को सुरक्षित निकालने को लेकर तालिबान से ज़रूर बात हो रही होगी.''

भारत नीतिगत तौर पर तालिबान का विरोध करता रहा है. अफ़ग़ानिस्तान के पंजशीर से तालिबान के ख़िलाफ़ चल रहे रेसिस्टेंस को लेकर भी भारत में समर्थन हैं. आम भारतीयों का नज़रिया तालिबान के प्रति नकारात्मक है. ऐसे में क्या भारत को तालिबान से सीधी वार्ता करनी चाहिए और इसका ज़रिया क्या हो सकता है.

इस सवाल पर तनेजा कहते हैं, ''भारत अगर बात कर भी रहा हो तो उसे सार्वजनिक नहीं करना चाहिए. ये सच्चाई है कि तालिबान अब सत्ता में हैं, आज नहीं तो कल भारत को तालिबान से बात करनी होगी. मुझे लगता है कि यदि भारत तालिबान से बात कर भी रहा है तो अभी उसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने का ये सही समय नहीं हैं.''

काबुल पर क़ाबिज़ होने से पहले ही तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय संबंध बनाने शुरू कर दिए थे. तालिबान नेता ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचे थे, उन्होंने चीन की यात्रा की थी और क़तर में भी कई देशों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात की थी.

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मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर के साथ चीनी विदेश मंत्री

चीन काबुल में काफ़ी सक्रिय है. रूस भी बाहरी तौर पर तालिबान का समर्थन कर रहा है. शिया बहुल ईरान जो पारंपरिक रूप से कट्टर सुन्नी संगठन तालिबान का विरोधी रहा है, वह भी अपने रिश्ते तालिबान से बेहतर कर रहा है.

भारत के हित अफ़ग़ानिस्तान से जुड़े हैं, ऐसे में क्या भारत अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए कोई ठोस क़दम उठा रहा है? कबीर तनेजा कहते हैं, 'भारत के सामने चुनौती ये है कि यदि वो तालिबान से बात करे तो किससे करे. इस समय काबुल हक्कानी नेटवर्क के हाथ में है जो भारत के हितों पर हमले करता रहा है. भारत के कॉन्सुलेट उसके निशाने पर रहे हैं. ऐसे में भारत यदि हक्क़ानी नेटवर्क को नज़रअंदाज़ करके तालिबान से बात करना चाहेगा तो ये बहुत आसान नहीं होगा.''

वहीं स्वास्ति राव कहती हैं, ''सिर्फ़ भारत ही नहीं रूस के हित भी अफ़ग़ानिस्तान से जुड़े हैं. अफ़ग़ानिस्तान के सुरक्षा हालात पूरे मध्य एशिया को प्रभावित कर सकते हैं और रूस नहीं चाहेगा कि ये इलाक़ा अस्थिर हो. ऐसे में रूस अफ़ग़ानिस्तान में भारत का बड़ा मददगार हो सकता है, भारत की मदद करने में उसके अपने राष्ट्रीय हित भी जुड़े होंगे.''

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