महाश्वेता देवी की लघु कथा 'द्रौपदी' पर दिल्ली यूनिवर्सिटी में क्यों उठा विवाद?

  • सुशीला सिंह
  • बीबीसी संवाददाता
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दिल्ली यूनिवर्सिटी की ओवरसाइट कमेटी ने महाश्वेता देवी की लघु कथा 'द्रौपदी' और दो तमिल महिलावादी दलित लेखक बामा और सुकरिथरणी की रचनाओं को बीए (ऑनर्स) पाठ्यक्रम से हटा दिया, जिस पर कुछ शिक्षिकों ने नाराज़गी जताई है.

इस फ़ैसले पर डीयू की अकादमी परिषद या एकेडमी काउंसिल के 15 सदस्यों ने विरोध दर्ज कराया है.

डीयू की ओवरसाइट कमेटी ने बीए(ऑनर्स) अंग्रेज़ी के पाठ्यक्रम में रामाबाई रनाडे की रचना को पढ़ाते रहने की सिफ़ारिश की, वहीं महाश्वेता देवी की 'द्रौपदी' के साथ-साथ सुकरिथरणी के नए लेखों और बामा के 'संगति' को हटाने की अनुशंसा की है.

एकेडमी काउंसिल के सदस्य और हंसराज कॉलेज में अंग्रेज़ी विभाग के शिक्षक मिथुराज धूसिया इस प्रक्रिया को अलोकतांत्रिक बताते हैं.

वे सवाल उठाते हैं कि छात्र महिलाओं से जुड़े पेपर में अगर नारीवादी और दलित लेखन के बारे में नहीं जानेंगे, तो पेपर में क्या पढ़ेंगे? ये कौन लोग हैं, जिन्हें ये लग रहा है कि छात्र इस तरह का लेखन पढ़ेंगे तो दिक्कतें होंगी?

क्या है आपत्ति?

उनके अनुसार, ''हमारे विभाग ने पूरी प्रक्रिया के तहत पूरा सिलेबस और पेपर रिवर्क किया. जो फिर जनरल बॉडी मीटिंग में गया लेकिन अचानक से ओवरसाइट कमेटी बना दी गई. इसके पीछे शायद एक राजनीतिक दबाव रहा हो, लेकिन ओवरसाइट कमेटी में विषय से जुड़ा कोई विशेषज्ञ ही नहीं है और जो लोग हैं, वे विज्ञान विषय से जुड़े हुए हैं.''

वे कहते हैं कि ये असंवैधानिक है, जहाँ एक ओर शिक्षक और छात्र हैं, तो दूसरी तरफ़ कुछ वो लोग हैं, जो फ़ैसला करेंगे कि शिक्षक क्या पढ़ाएँ और छात्र क्या पढ़ें. ये ख़तरनाक है और ये एक तरह से सेंसरशिप की ओर ले जाता है.

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इस बात से डॉ वीएस नेगी असहमत दिखते हैं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में कार्यकारी परिषद के सदस्य और शहीद भगत सिंह कॉलेज में प्रोफ़ेसर डॉ वीएस नेगी कहते हैं कि पाठ्यक्रम को लेकर ये अनुशंसा नई नहीं है.

उनके अनुसार साल 2017-2018 में लर्निंग ऑउटकम्स बेस्ड करिकुलम फ़्रेमवर्क (LOCF) के तहत नई व्यवस्था में पाठ्यक्रम में संशोधन किया गया था और इसमें नया पाठ्यक्रम लाया गया.

उस समय डॉ योगेश त्यागी वाइस चांसलर थे. पाठ्यक्रम एकेडमिक काउंसिल के ज़रिए आते थे लेकिन अंग्रेज़ी में कुछ लेखन को लेकर आपत्ति दर्ज की गई. इसका संज्ञान लेते हुए वीसी ने अंग्रेज़ी के पाठ्यक्रम को रोक दिया.

वे आगे बताते हैं कि ये पाठ्यक्रम साल 2018 में लागू होना था. ऐसे में दो साल के चार सेमेस्टर के अलावा जिसमें आपत्ति थी, उस समेस्टर का पाठ्यक्रम रोक दिया गया.

वे कहते हैं, ''इसी बीच योगेश त्यागी ने अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यूनिर्सिटी के 11जी नियम के तहत ओवरसाइट कमेटी बना दी. जिसने विषयों का विश्लेषण किया और आपत्तियों का निराकरण किया. इसी के तहत ओवरसाइट कमेटी ने अनुशंसा की और एकेडमिक काउंसिल की ओर से उसे लागू किया गया क्योंकि पाँचवाँ सेमेस्टर जो अगस्त से शुरू हो चुका है, उसके लिए ऐसा करना अनिवार्य था.''

उनका कहना है कि पाठ्यक्रम से कुछ विषयों को घटाना और बढ़ाना नई बात नहीं है और ना ही यहाँ लेखिका या लेखन पर कोई सवाल उठाया जा रहा है.

वे इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति से जोड़ते हुए आरोप लगाते हैं कि इस नीति का विरोध कर रहे लोग अब इस मामले को तूल देकर जाति का रंग देने की कोशिश कर रहे हैं और ये बताने का प्रयास कर रहे हैं कि ये बदलाव दलित समाज और नारीवादी विचारधारा के ख़िलाफ़ है.

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अनीता रामपाल

डीयू की स्वायत्तता कहाँ?

दिल्ली विश्वविद्यालय की फ़ैकल्टी ऑफ़ एजुकेशन की पूर्व डीन अनीता रामपाल इस फ़ैसले पर आश्चर्य जताते हुए कहती हैं कि एक ओर तो यूनिर्सिटी की स्वायत्तता की बात की जा रही है और दूसरी तरफ़ ऐसे फ़ैसले किए जा रहे हैं.

वो कहती हैं, ''ऐसा ही विवाद सामने आया था, जब जाने-माने लेखक एके रामानुजन के रामायण लेखन को इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल करने को लेकर नाराज़गी ज़ाहिर की जा रही थी. अब यहाँ दलित लेखन हटाया जा रहा है, तो क्या ये बताने की कोशिश है कि हिदुत्व की राजनीति में किसे आवाज़ मिलेगी और किसे नहीं.''

वहीं राष्ट्रीय जनतांत्रिक शिक्षक मोर्चा ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि वो सेमेस्टर पाँचवें (V) और छठे (VI) के लिए बीए (ऑनर्स) अंग्रेज़ी पाठ्यक्रम में संशोधन का पूरी तरह से समर्थन करता है. यह संशोधन अकादमिक परिषद ने उचित प्रक्रिया के बाद जारी किया है.

विज्ञप्ति में बताया गया है कि साल 2019 में डीयू कार्यकारी परिषद की ओर से नियुक्त अधिकार प्राप्त ओवरसाइट कमेटी यानी निरीक्षण समिति ने मामूली लेकिन सार्थक बदवाव किए थे.

इसने सभी संबंधित शैक्षणिक स्टेकहोल्डर से सलाह ली गई है और उन बदलावों का सुझाव दिया, जो लगभग 125 शिक्षाविदों के एक निकाय, अकादमिक परिषद ने स्वीकार किए थे, जिनमें से 87 निर्णय के समय बैठक में उपस्थित रहे और केवल 15 ने ही असहमति जताई.

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अनामिका

उपन्यास में क्या है?

साहित्‍य अकादमी अवॉर्ड से सम्मानित लेखिका अनामिका इस बारे में कहती हैं कि केवल द्रौपदी को ही नहीं फ़ेमिनिस्ट थ्योरी ही हटा दी गई यानी स्त्री पक्ष के पंख ही कतर दिए गए हैं.

वे कहती हैं, ''यूनिवर्सिटी छात्रों के लिए ऐसा पडाव होता है, जहाँ उसके चित्त का विस्तार होता है. उसमें कई पूर्वाग्रह होते हैं जो वर्ग, वर्ण, जाति और जेंडर को लेकर होते हैं. जो धूल की परत की तरह बिठाए जाते हैं वो इन्हीं पाठों से दूर किए जा सकते हैं. ऐसे में पाठों का सही चयन ज़रूरी है, क्योंकि वो छात्रों की मनोभूमि रचते हैं और इस तरह उनके लिए नए आर्दश तैयार किए जा सकते हैं और पूर्वाग्रहों को तोड़ा जा सकता है.''

द्रौपदी की कथा बताते हुए वे कहती हैं कि ये कहानी जंगल में आदिवासी महिलाओं के बीच जो पुलिस का रवैया होता है और उनके दैहिक शोषण के बारे में बताती है. कहानी बताती है कि जैसे औरत की देह सभी अपराधों की भूमि हो गई हो.

वे नाराज़गी से कहती हैं कि इस कहानी को हटाना ग़लत है, क्योंकि इससे आदिवासी महिला के जीवन की दृष्टि समझ में आती है, उनकी तेजस्विता, प्रतिरोधक क्षमता समझ में आती है. ये कहानी कविता के बिम्ब के साथ ख़त्म होती है. देश काल की समस्या से जूझना सिखाती है.

कौन थी महाश्वेता देवी?

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महाश्वेता देवी

महाश्वेता देवी का जन्म अविभाजित बंगाल के ढाका शहर में 1926 में हुआ था. उनके पिता मनीष घटक ख़ुद एक मशहूर उपन्यासकार थे और चाचा ऋतिक घटक आगे चलकर एक फ़िल्मकार के रूप विख्यात हुए.

महाश्वेता देवी 1940 के दशक में बंगाल के कम्युनिस्ट आंदोलन से प्रभावित हुईं और हमेशा दबे-कुचले शोषित समाज की न्याय की लड़ाई में शामिल रहीं.

महाश्वेता देवी को ज्ञानपीठ, पद्म विभूषण, साहित्य अकादमी और मैगसेसे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था.

उन्होंने तीन दशक से ज़्यादा समय तक आदिवासियों के बीच काम किया. उनके साहित्य का काफ़ी हिस्सा आदिवासियों के जीवन पर आधारित था.

वैसे तो महाश्वेता देवी बांग्ला में उपन्यास लिखा करती थीं, लेकिन अंग्रेज़ी, हिंदी और अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद के ज़रिए उनके साहित्य की पहुँच काफ़ी व्यापक स्तर पर थी.

उनकी चर्चित किताबों में हज़ार चौरासी की माँ और ब्रेस्ट स्टोरीज़ शामिल हैं. उनकी कई किताबों पर फ़िल्में भी बनाई गई हैं.

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