मुज़फ़्फ़रनगर: सरकार को चेतावनी के साथ किसानों ने दिखाई अपनी ताक़त - ग्राउंड रिपोर्ट

  • समीरात्मज मिश्र
  • मुज़फ़्फ़रनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
मुज़फ़्फ़रनगर में किसान महापंचायत

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रविवार को मुज़फ़्फ़रनगर के राजकीय इंटर कॉलेज मैदान यानी जीआईसी ग्राउंड में क्या होने वाला है, इसकी झलक शनिवार को ही मिलने लगी थी.

शहर को जोड़ने वाले तमाम रास्तों से आने वाली बसों, ट्रैक्टरों और निजी गाड़ियों के काफ़िले देर रात तक आते रहे और रविवार सुबह दस बजे के आस-पास एक लाख की क्षमता वाले जीआईसी ग्राउंड में भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि 'तिल रखने की भी जगह नहीं' मुहावरे का बेहिचक प्रयोग किया जा सकता है.

ग्राउंड के आस-पास की सड़कें और गलियों में भी भीड़ दिख रही थी. बड़ी संख्या में लोग पैदल भी चले आ रहे थे. पूरा शहर संयुक्त किसान मोर्चा और भारतीय किसान यूनियन के पोस्टरों, बैनरों और होर्डिंग्स से पटा पड़ा था.

राजनीतिक दलों, ख़ासकर राष्ट्रीय लोकदल के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी महापंचायत को अपने समर्थन देने जैसी ढेरों होर्डिंग्स लगा रखी थी.

ग्राउंड के प्रवेश द्वार पर बाग़पत से आए किसान चौधरी यशपाल सिंह काफ़ी प्रसन्न दिख रहे थे. कहने लगे, "हमने आज तक इस ग्राउंड में इतनी भीड़ नहीं देखी. जितने लोग ग्राउंड में हैं, उससे ज़्यादा तो ग्राउंड के बाहर हैं."

मैंने पूछा कि लगभग कितने लोग आए हैं? उनका जवाब था- "लाखों में."

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दो लाख वर्ग फ़ुट का पंडाल

शनिवार को मुज़फ़्फ़रनगर में ठीक-ठाक बारिश हुई थी जिसकी वजह से जीआईसी ग्राउंड में भी जो खुली जगहें थीं, वहां की ज़मीन दलदली हो गई थी.

ग्राउंड के बड़े हिस्से में लोगों के बैठने के लिए दो लाख वर्ग फ़ुट का पंडाल तैयार किया गया था और पंडाल के ठीक सामने संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं के बैठने के लिए क़रीब साढ़े तीन हज़ार वर्ग फ़ुट का विशाल मंच बनाया गया था.

पंडाल और मंच के बीच का स्थान मीडिया के लिए था.

हरियाणा के अलग-अलग हिस्सों से क़रीब एक दर्जन महिलाओं का समूह पंडल के नीचे दिखा. इस समूह में जींद की रहने वाली बुज़ुर्ग महिला रागेश्वरी भी थीं जो काफ़ी ग़ुस्से में थीं.

अपने आने का मक़सद उन्होंने कुछ यूं बताया, "दस महीने से हम बॉर्डर पर बैठे हैं. जाड़ा, गर्मी, बरसात सब झेल लिया. कोरोना भी झेल लिया. अब भी सरकार को ना सूझ रही कि हमारी बात मान ले. हम सरकार बनाना जानै हैं तो उतारना भी जानै हैं."

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किसान यूनियन का झंडा

कोरोना संक्रमण की आशंकाओं के बावजूद इस भीड़ में सोशल डिस्टेंसिंग जैसी बात की कल्पना भी बेमानी है और जहां तक सवाल मास्क का है तो महापंचायत में पहुंचे किसानों के रुमाल और गमछे ही इसके विकल्प के तौर पर दिख रहे थे, लेकिन लोगों को उसकी भी ज़रूरत महसूस नहीं हो रही थी.

अपने साथियों के साथ हाथ में किसान यूनियन का झंडा लेकर बिना मास्क लगाए चले आ रहे कुछ नौजवानों से जब हमने यह सवाल किया तो उन्होंने बेहद दिलचस्प जवाब दिया, "पश्चिम बंगाल चुनाव में जो रैलियां हो रही थीं, वहां सबने मास्क लगा रखे थे?"

इस युवक की बात को पूरा करते हुए उसके दूसरे साथी ने कहा, "और तब तो कोरोना भी इतना ज़्यादा था. अब तो ख़त्म हो गया है."

किसान महापंचायत में भाग लेने आए लगभग सभी किसानों की मांग यही थी कि सरकार तीन कृषि क़ानूनों को जिन्हें वो अब काले क़ानून कहते हैं, वापस ले.

मंच पर भाषण दे रहे संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं की भी मुख्य मांग यही थी. इसके अलावा न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की गारंटी देने वाले क़ानून और बिजली की दरों में कमी की मांग भी शामिल थी.

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केंद्र सरकार से शिकायतें

इन सभी लोगों को मौजूदा केंद्र सरकार से तमाम शिकायतें तो थीं ही, लेकिन निशाने पर मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा अंबानी और अडानी थे.

ज़्यादातर किसान मुज़फ़्फ़रनगर के आस-पास के ज़िलों और यूपी के अन्य हिस्सों के थे, लेकिन हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश के अलावा तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों से भी किसान आए थे.

मुज़फ़्फ़रनगर में वैसे तो बाज़ारों में गुरुवार को साप्ताहिक बंदी रहती है, लेकिन रविवार को किसान महापंचायत की वजह से बाज़ार बंद रहे.

शहर के प्रमुख बाज़ार शिव चौक के रहने वाले सुनील मलिक एक मेडिकल स्टोर के मालिक हैं.

उनका कहना था, "व्यापारियों ने स्वेच्छा से बंद कर रखा है और बाहर से आने वाले बहुत से लोगों के रहने और खाने-पीने का भी इंतज़ाम कर रहे हैं. वैसे तो रविवार को छुट्टी का दिन होने की वजह से बाज़ारों में काफ़ी भीड़ रहती है."

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क्या सरकार किसानों की बात मान लेगी?

पंचायत स्थल के नज़दीक महावीर चौक के आस-पास कई लोग ज़मीन पर बैठे हुए लाउड स्पीकर से अपने नेताओं के भाषण सुन रहे थे. यहीं बिजनौर से आए आठ-दस किसान एक दरी बिछाकर बैठे थे. बीच में हुक्का रखे ये लोग ताश खेल रहे थे.

चौधरी हरजीत सिंह बोले, "गर्मी बहुत है. मंच के पास सुबह जाकर लौट आए. पेड़ के नीचे हम भाषण भी सुन रहे हैं और ताश भी खेल रहे हैं."

तो क्या इस तरह की पंचायत से सरकार उनकी बात मान लेगी?

इस सवाल पर वहां बैठे एक बुज़ुर्ग भड़क गए, "तो तुम्हीं बता दो कैसे मानेगी? वही करें हम जिससे कि सरकार हमारी बात मान जाए. हम कोशिश कर रहे हैं, बॉर्डर पर बैठे हैं. पंचायत कर रहे हैं. और क्या करें?"

जीआईसी ग्राउंड के बाहर बाग़पत से आए कुछ किसान अपने ट्रैक्टर पर ही लंगर बांट रहे थे.

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पंचायत ख़त्म होने के बाद

वहां मौजूद कुछ लोगों से जब इस बात पर प्रतिक्रिया जाननी चाही कि चुनावी सर्वेक्षणों के मुताबिक, यूपी में बीजेपी की सरकार एक बार फिर बनने वाली है, तो वहां मौजूद लोगों ने एक स्वर से ऐसे सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता को ही नकार दिया.

हालांकि इस सवाल का जवाब वहां मौजूद किसी भी व्यक्ति ने नहीं दिया कि 'बीजेपी को हराने के लिए आख़िर वो किस पार्टी के पक्ष में वोट करेंगे?'

महापंचायत सुबह नौ बजे से ही शुरू हो चुकी थी और मंच से किसान नेताओं के भाषण होने लगे थे.

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत क़रीब बारह बजे ग़ाज़ीपुर बॉर्डर से सीधे मंच पर पहुंचे और फिर पंचायत ख़त्म होने के बाद ग़ाज़ीपुर बॉर्डर वापस लौट गए. हालांकि उनका घर वहां से महज़ कुछ मीटर की ही दूरी पर था.

बीबीसी से बातचीत में बोले, "घर तो छोड़िए मुज़फ़्फ़रनगर की धरती पर भी तब तक पांव नहीं रखेंगे, जब तक कि काले क़ानून वापस नहीं हो जाते."

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धरने से उठाने की प्रशासन की कोशिश

बाद में उन्होंने इस बात को अपने भाषण में भी कहा और बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और यूपी सरकार पर जमकर बरसे.

राकेश टिकैत ने किसान यूनियन के राजनीति से दूर रहने की बात दोहराई, लेकिन यह संकेत भी दिया कि राजनीति में हस्तक्षेप भरपूर करेंगे.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट-मुस्लिम एकता की बात दोहराते हुए उन्होंने कहा, "चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के समय में लगने वाला 'अल्ला हो अकबर- हर हर महादेव' का नारा फिर लगेगा."

राकेश टिकैत ने इसी साल 28 जनवरी को ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर किसानों को धरने से उठाने की प्रशासन की कोशिश का भी ज़िक्र किया और कहा, "28 जनवरी को आंदोलन का क़त्लेआम करने की तैयारी थी. कुछ सौ किसानों को भगाने के लिए आठ हज़ार फ़ोर्स लगाई गई थी."

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ख़ास रणनीति बनाने की तैयारी

यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए किसान मोर्चा एक ख़ास रणनीति बनाने की तैयारी में भी है और इसके लिए मोर्चे के नेताओं की 9 और 10 सितंबर को लखनऊ में एक बैठक भी बुलाई गई है.

मुज़फ़्फ़रनगर में किसान महापंचायत को देखते हुए सुरक्षा के भी कड़े बंदोबस्त किए गए थे और क़रीब चार हज़ार जवानों की तैनाती की गई थी.

भारतीय किसान यूनियन का दावा है कि व्यवस्था बनाए रखने और बाहर से आने वालों की मदद के लिए यूनियन की ओर से पांच हज़ार स्वयंसेवी यानी वॉलंटियर्स की टीम भी तैनात की गई थी.

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