किसान आंदोलन यूपी की चुनावी राजनीति में कितना असरदार होगा?

  • समीरात्मज मिश्र
  • बीबीसी हिंदी के लिए
किसान आंदोलन

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मुज़फ़्फ़रनगर में रविवार को हुई किसान महापंचायत उन सवालों के जवाब में थी, जो दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसानों के धरने की धार को कुंद मान रहे थे.

महापंचायत में किसानों की मौजूदगी ने इसका जवाब देने की भरपूर कोशिश की और क़ामयाब भी रहे लेकिन किसान नेता राकेश टिकैत के "वोट पर चोट" की अपील यूपी और उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव में कितना असर दिखाएगी, यह विषय राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है.

न सिर्फ़ किसान नेताओं के राजनीतिक बयानों बल्कि महापंचायत के तुरंत बाद बीजेपी के कई नेताओं की प्रतिक्रियाओं से भी यह साफ़ पता चलता है कि किसान आंदोलन के राजनीतिक निहितार्थ से बीजेपी भी अनजान नहीं है.

यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने उसी दिन मीडिया से बातचीत में किसान आंदोलन में विपक्षी राजनीतिक दलों के शामिल होने का आरोप लगाते हुए इस आंदोलन का हश्र शाहीन बाग जैसा होने की भविष्यवाणी कर दी, तो मुज़फ़्फ़रनगर के ही बीजेपी सांसद डॉक्टर संजीव बालियान ने आत्मविश्वास के साथ कहा कि साल 2022 के विधानसभा चुनाव में कोई भी महापंचायत बीजेपी को नहीं हरा सकती है.

लेकिन पीलीभीत से बीजेपी सांसद वरुण गांधी ने महापंचायत में किसानों की भीड़ का वीडियो शेयर करते हुए ट्वीट किया कि सरकार को इन किसानों से नए सिरे से बातचीत करनी चाहिए. वरुण गांधी के इस ट्वीट को उनकी मां और सुल्तानपुर से बीजेपी सांसद मेनका गांधी ने भी समर्थन करते हुए री ट्वीट किया. मेनका गांधी साल 2014 में पीलीभीत से ही सांसद थीं और पीलीभीत भी किसान आंदोलन का एक प्रमुख केंद्र है.

यूपी की बात करें तो किसान आंदोलन का प्रभाव ख़ासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफ़ी दिख रहा है. इसकी कई वजहें हैं. एक तो इस इलाक़े में ज़्यादातर गन्ना किसान हैं और वो तीन कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन में शुरू से ही शामिल रहे हैं. दूसरे, आंदोलन का नेतृत्व करने वाली भारतीय किसान यूनियन इसी इलाक़े में ज़्यादा प्रभावी है और वही इस वक़्त किसान आंदोलन का नेतृत्व भी कर रही है.

बीजेपी की उल्टी गिनती?

हालांकि पंचायत चुनाव से पहले भारतीय किसान यूनियन के नेताओं नरेश टिकैत और राकेश टिकैत ने पूरे यूपी का दौरा किया और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान वहां भी गए.

अगले साल जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, यूनियन का कहना है कि उन सभी जगहों पर महापंचायत के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और बीजेपी के ख़िलाफ़ लोगों से वोट करने की अपील की जाएगी. नौ और दस सितंबर को लखनऊ में कई किसान संगठनों के नेताओं की बैठक भी हुई है.

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "पश्चिम यूपी से ही बीजेपी का यूपी में झंडा बुलंद हुआ था और यहीं से इनकी उल्टी गिनती भी शुरू होगी. किसानों ने ही बीजेपी की केंद्र और यूपी में सरकार बनवाई लेकिन अब सरकार इन्हीं किसानों की बात नहीं सुन रही है. किसान वोट देकर सत्ता दिला सकता है तो वोट की चोट करके गद्दी से उतार भी सकता है. बीजेपी ने पंचायत चुनावों में इसका स्वाद अच्छे से चखा है लेकिन वो दिखा रही है कि इन सबसे बेफ़िक्र है."

पिछले तीन चुनावों में यानी साल 2014 और साल 2019 के लोकसभा चुनाव और साल 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को यहां से बड़ी जीत मिली लेकिन किसान आंदोलन की वजह से अब स्थितियां कुछ बदल गई हैं. किसान आंदोलन शुरू होने के बाद पहला अहम चुनाव यूपी में पंचायत चुनाव हुए और सीधे मतदाताओं की ओर से चुने जाने वाले ज़िला पंचायत सदस्यों में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल को अच्छी ख़ासी जीत मिली.

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जज़्बातों की डोर से बंधे किसान परिवार की कहानी

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भारतीय किसान यूनियन का राष्ट्रीय लोकदल को समर्थन हासिल था. दूसरे, किसान आंदोलन से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक समीकरण भी काफ़ी बदल गए हैं. साल 2013 में हुए मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद छिन्न-भिन्न हुई जाट और मुस्लिम एकता को किसान आंदोलन ने एक बार फिर मज़बूत कर दिया है.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि किसान आंदोलन का नुक़सान बीजेपी को ज़रूर होगा लेकिन सिर्फ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में. उनके मुताबिक, इस आंदोलन का यूपी के अन्य हिस्सों में न तो प्रभाव है और न ही कृषि क़ानून कोई मुद्दा. जानकारों के मुताबिक, सौ से ज़्यादा विधानसभा सीटों की क्षमता वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी के पास इस वक़्त अस्सी से ज़्यादा सीटें हैं लेकिन यह स्थिति तब बनी थी जब किसानों और ख़ासकर जाट समुदाय ने बीजेपी का भरपूर समर्थन किया था.

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिमी यूपी की 110 में से केवल 38 सीटें हासिल की थीं और साल 2017 में उसकी सीटों की संख्या बढ़कर 88 तक पहुंच गई थी. इसकी एक बहुत बड़ी वजह साल 2013 के बाद जाटों का बीजेपी की तरफ़ झुकाव रहा.

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कर्ज़ तले दबे हैं खेतों में काम करनेवाले मज़दूर

किसानों का असर केवल जाट लैंड में?

वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, "जाट समुदाय न सिर्फ़ यहां संख्या में ज़्यादा हैं बल्कि चुनावी माहौल तय करने में भी उनका बड़ा योगदान है. जाटों की नाराज़गी का तोड़ बीजेपी अन्य जातियों को लुभाने की कोशिश करके निकालेगी लेकिन यदि बहुसंख्यक जाट बीजेपी के ख़िलाफ़ चला गया तो बीजेपी को बड़ा नुक़सान होने की पूरी संभावना हैड."

न सिर्फ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बल्कि भारतीय किसान यूनियन और किसानों का संयुक्त मोर्चा अब पूरे उत्तर प्रदेश में पंचायत और सभाएं करने की तैयारी कर रहा है. यही नहीं, मध्य यूपी और पूर्वांचल के किसान संगठनों का भी इस मुहिम में साथ लिया जा रहा है.

राष्ट्रवादी किसान क्रांति मोर्चा के अध्यक्ष अमरेश मिश्र कहते हैं कि अवध क्षेत्र के क़रीब दस ज़िलों के किसान पिछले नौ महीने से ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर चल रहे धरने में शामिल हो रहे हैं. अमरेश मिश्र के मुताबिक, "अवध क्षेत्र में किसानों की नाराज़गी उतनी संगठित भले ही न दिख रही हो लेकिन यह कम क़तई नहीं है. हज़ारों की संख्या में किसानों ने हर दिन इन इलाक़ों से कूच किया है और आज भी बड़ी संख्या में यहां के किसान धरने में शामिल हैं."

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसान आंदोलन का जितना प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है, उतना अन्य हिस्सों में नहीं है. इसकी एक वजह यह भी है कि यहां किसान जातीय समीकरणों में ज़्यादा बँटे हैं और उनकी तय राजनीतिक निष्ठा पश्चिम की तुलना में कहीं ज़्यादा स्पष्ट होती है.

राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों की नाराज़गी बीजेपी से ज़रूर है लेकिन वो अभी इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि उनका वोट बीजेपी की बजाय किधर जाएगा.

सिद्धार्थ कलहंस इसका जवाब देते हैं, "राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी का गठबंधन लगभग तय है और इस इलाक़े में मुख्य भूमिका रालोद की ही होगी. रालोद को ही किसानों का पूरा समर्थन भी रहेगा और जाट-मुस्लिम गठजोड़ की जो क़वायद चल रही है, साल 2013 से पहले राष्ट्रीय लोकदल की मज़बूती की वजह भी यही रही है. ऐसे में इस बात को लेकर ज़्यादा अनिश्चितता नहीं रहनी चाहिए कि बीजेपी से नाराज़ किसान पश्चिम में किसे वोट देगा."

वहीं जानकारों का यह भी कहना है कि महापंचायत में भले ही बड़ी संख्या में किसानों ने शिरकत की और सरकार से उनकी नाराज़गी भी बरक़रार है लेकिन यह कहना भी जल्दबाज़ी होगी कि इस वजह से बीजेपी चुनाव हार जाएगी. इसकी एक वजह यह भी बताई जा रही है कि चुनाव में सिर्फ़ किसान आंदोलन ही एकमात्र मुद्दा नहीं रहेगा बल्कि और भी कुछ मुद्दे प्रभावी हो सकते हैं.

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"तो शायद किसानों का गुस्सा कम हो जाए..."

वरिष्ठ पत्रकार और लंबे समय से किसान राजनीति को कवर कर रहे डॉक्टर अनिल चौधरी कहते हैं कि सरकार किसानों की कुछ मांगें यदि मान लेती है तो शायद किसानों का ग़ुस्सा कुछ कम हो जाए.

अनिल चौधरी कहते हैं, "जहां तक मुझे लगता है कि ज़्यादा नहीं यदि गन्ने का दाम सरकार पचास रुपये तक बढ़ा दे, चीनी मिलों पर उनके बकाया पैसे का भुगतान करा दे और बिजली में कुछ छूट मिल जाए तो किसानों की नाराज़गी काफ़ी हद तक दूर हो जाएगी और यही किसान सरकार की वाहवाही करने लग जाएंगे. लेकिन यदि सरकार ऐसा नहीं करती है तो यूपी और उत्तराखंड दोनों ही जगहों पर विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नुक़सान उठाना पड़ सकता है."

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