कन्यादान सिर्फ़ लड़कियों का क्यों? भारतीय परंपराओं को चुनौती देते विज्ञापन

  • सुशीला सिंह
  • बीबीसी संवाददाता
मान्यवर मोहे का विज्ञापन

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इन दिनों टेलीविज़न और सोशल मीडिया पर दो विज्ञापन छाए हुए हैं, जिनमें एक है 'मान्यवर मोहे' का विज्ञापन, जिसमें फ़िल्म अभिनेत्री आलिया भट्ट एक दुल्हन बनी नज़र आ रही हैं.

दूसरा विज्ञापन है कैडबरी चॉकलेट का, जिसमें चेन्नई की तैराक और अभिनेत्री काव्या रमाचंद्रन क्रिकेटर की भूमिका में है.

एक विज्ञापन भारतीय समाज में चली आ रही परंपराओं और रीति-रिवाज पर सवाल उठाता है, तो दूसरा जेंडर स्टीरियोटाइप या लैंगिक रूढ़िवादिता को तोड़ता दिखता है.

मान्यवर मोहे कपड़ों का ब्रैंड है और इसके विज्ञापन में दुल्हन की भूमिका में नज़र आ रही आलिया भट्ट मंडप में बैठी हैं और रीति-रिवाजों और परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ दी गई लड़की के ज़हन में आने वाले सवाल को उठा रही हैं.

बेटी पराया धन क्यों है? क्यों सिर्फ़ उसका कन्यादान होता है? इस विज्ञापन के अंत में देखा जा सकता है कि लड़के के माता-पिता अपने बेटे का हाथ आगे बढ़ाते हैं और आलिया कहती हैं - नया आइडिया कन्या मान.

विज्ञापन पर प्रतिक्रिया

इस विज्ञापन की सोशल मीडिया पर जहाँ प्रशंसा हो रही है, वहीं आलोचना भी. @Anupama_Rathee #kanyamaan not #kanyadaan पर लिखती हैं कि ये प्रगतिशील संदेश समानता को बढ़ावा देता है. क्यों बेटियों को ही दे दिया जाता है?

@Themohitverma नाराज़गी में लिखते हैं कि ये विज्ञापन हिंदुओं की भावनाओं के विरुद्ध है. पहले कन्यादान का मतलब समझिए. हिंदुओं और उनकी रस्मों के ख़िलाफ़ होना बंद कीजिए.

इस विज्ञापन पर सोशल मीडिया पर ऐसी ही मिलीजुली प्रतिक्रिया दी जा रही हैं.

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डॉ ए एल शारदा

समाजशास्त्री डॉ एएल शारदा बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि इस विज्ञापन के ज़रिए एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की गई है.

उनके अनुसार, ''भारतीय समाज में बेटी के लिए पराई हो या पराया धन जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है, जो किसी भी लड़की के लिए काफ़ी दुखी और बेइज़्ज़ती करने वाले होते हैं. वहीं ये माता-पिता के आचरण को भी प्रभावित करता है. हालाँकि वो उसे प्यार करते हैं, लेकिन उनमें भी कहीं ना कहीं बेटी को लेकर वैराग्य या डर होता है और वो इसे एक ज़िम्मेदारी की तरह लेते हैं.''

लड़की की पहचान का सवाल

मान्यवर के विज्ञापन को काफ़ी आंदोलनकारी मानने वाली डॉ अशिता अग्रवाल कहती हैं कि ये विज्ञापन भारतीय समाज में गहराई से रची बसी मान्यता को चुनौती देता है कि कन्यादान की सकंल्पना ही क्या है. क्या आप कन्या को 'ओन' करते हैं या उसके स्वामी हैं कि उसको दान कर सके और दूसरा कि दान का मतलब एक वस्तु को एक स्वामी दूसरे स्वामी को दे देता है तो आप इस रिवाज़ को निभा कर लड़की की पहचान को ही कम कर रहे हैं.

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डॉ अशिता अग्रवाल

बीबीसी से बातचीत में वे कहती हैं कि उन्होंने अपने पिता को शादी में कन्यादान की रीति निभाने से इनकार कर दिया था.

SPJIMR में मार्केटिंग प्रोफ़ेसर डॉ अशिता कन्ज़्यूमर इनसाइट कंसलटेंट भी हैं. उनके अनुसार कोई भी चीज़ ट्रोल तब होती है, जब वो लोगों के दिल पर लगती है. जब उन्हें गिल्ट या अपराध बोध होता है या वे उसका औचित्य साबित करना चाहते हैं.

वे बताती हैं, ''जब लिंक्डइन पर उन्होंने इन दोनों विज्ञापन पर लिखा, तो कई पढ़े लिखे लोगों ने मान्यवर मोहे विज्ञापन को महिलाओं की सुरक्षा से जोड़ा और कहा कि एक पिता अपनी बेटी की सुरक्षा दूसरे के हाथ में सौंप रहा है. लेकिन यहाँ सुरक्षा का अर्थ क्या है. महिलाएँ ख़ुद आर्थिक रूप से भी सक्षम बन रही हैं और समाज में भी अपनी पहचान बना रही हैं. महिलाएँ आज की तारीख़ में अपने बच्चों और परिवार की ज़िम्मेदारी ले रही हैं, वहीं आप उसके जेंडर को नीचे दिखा रहे हैं.''

वहीं इसी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ शारदा कहती हैं कि कई लोग होते हैं, जो ऐसी हर उस चीज़ को लेकर टची होते हैं, जो उनके मुताबिक़ संस्कृति और धार्मिक परंपराओं पर सवाल खड़ा कर रही हैं या चुनौती दे रही हैं.

महिलाओं की भूमिका बदली

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पीएन वसंती

'द एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड कॉउंसिल ऑफ़ इंडिया' (एएससीआई) की कन्ज़्यूमर कंपलेंट कॉउंसिल (सीसीसी) की सदस्य पीएन वसंती कहती है कि विज्ञापन जगत ने लंबा सफ़र तय किया है और उसमें महिलाओं की भूमिका भी बदली है.

वो कहती हैं, ''एक समय में महिलाओं का ओब्जेक्टिफ़िकेशन होता था यानी पेन हो या टायर का विज्ञापन हो, वहाँ एक सुंदर लड़की अर्ध नग्नता के साथ दिखाई जाती थी. ये समय के साथ बदला है.''

हाल ही में भारतीय आभूषण ब्रैंड तनिष्क का एक विज्ञापन आया था. ये विज्ञापन अलग-अलग समुदाय के शादीशुदा जोड़े से जुड़ा था और इसमें एक मुस्लिम परिवार में हिंदू बहू की गोद भराई की रस्म को दिखाया गया था. जो काफ़ी विवादास्पद रहा और उसे हटाना पड़ा था.

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तनिष्क के हटा लिए गए विज्ञापन का एक दृश्य

वहीं कई ऐसे ब्रैंड के विज्ञापन हैं, जो एक तरह से भारतीय समाज की उस संरचना को तोड़ते नज़र आते हैं, जहाँ घर में पिता, पति या भाई के पास फ़ैसले लेने का अधिकार है और वो ही घर का मुखिया कहलाए जाते हैं. जहाँ वो घर की आर्थिक ज़िम्मेदारी निभा भी रही हो, लेकिन घर का काम उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल कर दिया जाता है.

विज्ञापन और सोच

इसमें सभ्यता ब्रैंड का विज्ञापन एक है, जहाँ सास अपनी ही बहू के साथ मिलकर अपने बेटे से काम करवाती है.

डॉ अशिता अग्रवाल कहती हैं कि पिछले 10 से 12 सालों में काफ़ी बदलाव आए हैं और विज्ञापनों को दो भागों में बाँटा जा सकता है- आंदोलकारी और विकासवादी. विज्ञापनों में महिलाओं की पहचान की बात हो रही है और यहाँ वे कैडबरी विज्ञापन का उदाहरण देते हुए उसे विकासवादी श्रेणी में डालती हैं.

कैडबरी का ताज़ा विज्ञापन दरअसल क़रीब 27 साल पहले आए विज्ञापन का रिवर्सल या उलट है. इस विज्ञापन की काफ़ी प्रशंसा हो रही है और ये कहा जा रहा है कि लोग पुरानी यादों को फिर जीने जैसा अनुभव कर रहे हैं.

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कैडबरी विज्ञापन का एक दृश्य

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ये एक सकारात्मक सोच को दर्शाता है, जहाँ एक महिला क्रिकेट मैच में छक्का लगाती है और इस उपलब्धि को बेफ़िक्री के साथ एक भावुक पुरुष खुलकर सेलिब्रेट कर रहा है. जो आमतौर पर देखा नहीं जाता है. बल्कि एक महिला की जीत या उपलब्धि को ईष्या या हीनता के साथ जोड़ कर देखा जाता है. ये विज्ञापन #GoodLuckGirls से ख़त्म होता है.

पद्मश्री से सम्मानित और ओग्लवी एजेंसी में चीफ़ क्रिएटिव ऑफ़िसर (वर्ल्डवाइड) पीयूष पांडे कहते हैं कि साल 1994 में भी लोग ये सोच नहीं सकते थे कि एक लड़की सार्वजनिक तौर पर फ़ील्ड में आकर ख़ुश हो कर ऐसे डांस कर सकती है और खुलकर अभिवयक्त कर सकती हैं.

उनके अनुसार, ''हमारा इरादा लड़कों को नए रोल में दिखाना नहीं था, बल्कि लड़कियाँ जिस तरह से प्रगति कर रही हैं उसे सलाम करना और उत्साह बढ़ाना था. और #GoodLuckGirls के पीछे इरादा उन सभी लड़कियों को प्रोत्साहित करना है, जो कुछ कर रहीं हैं. वो और बेहतर करें लेकिन इसका टाइमिंग एक बोनस हो गया. और मैं इस विज्ञापन की लंबी उम्र देखता हूँ.''

वीमेन क्रिकेट वर्ल्ड कप साल 2022 में खेला जाना है और कैडबरी के विज्ञापन को महिला क्रिकेटरों को प्रोत्साहन देने और पिछले कुछ सालों में उनके बेहतरीन प्रदर्शन को दर्शाता हुआ नज़र आता है. साथ ही उनके ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन की तस्वीर भी बयाँ करता है.

डॉ शारदा कहती हैं कि हालाँकि आज की पीढ़ी की बात करें, तो वो पूछते हैं इस विज्ञापन में ऐसा क्या है?

इस सवाल पर पीयुष पांडे कहते हैं, ''कोई भी किसी आइकॉनिक चीज़ को हाथ लगाने से डरता हैं लेकिन हमने इसमें रिवर्स किया. क्योंकि इस विज्ञापन की एक हैरिटेज़ है और ये सभी उम्र के लोगों को पसंद आ रहा है.और अब जब लड़कियाँ इतना बेहतरीन खेल रही हैं तो क्यों नहीं रोल रिवर्सल हो सकता और ये कहीं ना कहीं बदलती सामाजिक परिस्थितियों को ही दर्शाता है.''

महिलाएँ तो मुकाम हासिल कर रही हैं, लेकिन कई महिलाएँ सामाजिक बंदिशों के कारण वो सब हासिल नहीं कर पाई जो वो कर सकती थीं और पुरुषों को अपनी भावनाओं को खुलकर दर्शाते कम ही देखा जाता है. ऐसे में ये विज्ञापन कई वर्जनाओं को तोड़ता हुआ नज़र आता है, जो पहले नहीं दिखता था.

लेकिन इन विज्ञापनों का समाज पर कितना असर होता है और क्या ये महिलाओं को सशक्त करता है, इस पर ये सभी विशेषज्ञ मानते हैं आज की पीढ़ी ऐसे विज्ञापनों से प्रभावित होगी लेकिन इन विषयों पर स्कूलों, यूनिवर्सिटी या घरों में बातचीत शुरू करनी होगी.

डॉ अशिता अग्रवाल कहती हैं कि छोटे शहरों और कस्बों में अभी भी महिलाएँ ये मानती हैं कि पुरुष उनकी रक्षा करते हैं और वे सुरक्षित महसूस करती हैं. लेकिन जहाँ शहरों में इस सोच को बदलने में क़रीब 10 साल लगेंगे तो गाँवों या कस्बों में दो दशक लेकिन अगली पीढ़ी बदलाव ज़रूर लाएगी.

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