मोदी अफ़ग़ानिस्तान पर चाहेंगे चर्चा पर बाइडन चीन को लेकर चिंतित, क्या होगा बैठक में?

  • ज़ुबैर अहमद
  • बीबीसी संवाददाता
नरेंद्र मोदी, जो बाइडन

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अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री जॉन कैरी, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन

कोविड महामारी के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल मार्च में बांग्लादेश की एक संक्षिप्त यात्रा के बाद अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए अमेरिका रवाना हो गए हैं. वे 26 सितंबर को दिल्ली लौटेंगे. सभी की निगाहें 24 सितंबर को नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन की बैठक पर होगी.

अमेरिका क्यों जा रहे हैं मोदी?

1. राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ द्विपक्षीय बैठक में भाग लेना

2. जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के नेताओं के साथ क्वाड शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेना

3. संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करना

यह क्वाड की पहली ऐसी बैठक है, जिसमें सरकार के प्रमुख व्यक्तिगत रूप से आमने-सामने होंगे.

भारतीय ख़ेमे को राष्ट्रपति बाइडन के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाक़ात का बेसब्री से इंतज़ार है. राष्ट्रपति बाइडन के जनवरी में पद संभालने के बाद से यह भारत और अमेरिका के बीच पहला द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन है. माना जाता है कि मोदी के राष्ट्रपति बराक ओबामा और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ व्यक्तिगत और अच्छे संबंध थे. लेकिन राष्ट्रपति बाइडन ने अभी तक उनके प्रति बहुत गर्मजोशी नहीं दिखाई है.

मोदी अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से भी अलग से मुलाक़ात कर रहे हैं. उपराष्ट्रपति की माँ का संबंध तमिलनाडु से है. ये दोनों नेताओं की पहली औपचारिक मुलाक़ात होगी

द्विपक्षीय बैठक में मुख्य एजेंडा क्या है?

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दोनों नेताओं के बीच कई द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मुद्दों पर चर्चा होनी है.

भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने बताया कि दोनों नेता मज़बूत और बहुआयामी द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा करेंगे. दोनों पक्ष द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संबंधों को मज़बूत करने, रक्षा और सुरक्षा सहयोग को मज़बूत करने, रणनीतिक स्वच्छ ऊर्जा साझेदारी को बढ़ावा देने, नई और उभरती तकनीकों का पता लगाने और अफ़ग़ानिस्तान संकट पर चर्चा करने के लिए 24 सितंबर को व्हाइट हाउस में मिलेंगे.

हालाँकि, 50 मिनट की बैठक में अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा अधिकांश मामलों पर हावी होने की संभावना है.

विदेश सचिव श्रृंगला भारतीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं. उन्होंने स्वीकार किया कि अफ़ग़ानिस्तान में उभरती स्थिति दोनों नेताओं का ध्यान आकर्षित करेगी.

उन्होंने कहा, "अफ़ग़ानिस्तान में हाल के घटनाक्रमों के बाद द्विपक्षीय बैठक में वर्तमान क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति पर भी बातचीत होगी. एक पड़ोसी के रूप में हमारा और अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के बीच रिश्ता बहुत पुराना और दृढ़ है. इस संदर्भ में हम निस्संदेह कट्टरवाद, उग्रवाद, सीमा पार आतंकवाद और वैश्विक आतंकवादी नेटवर्क को ख़त्म करने की आवश्यकता पर चर्चा करेंगे."

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पीएम मोदी ने ख़ुद हाल के दिनों में अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे को गंभीर बताया है.

कुछ दिन पहले शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) सम्मेलन में अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, "अफ़ग़ानिस्तान में हाल की घटनाओं का हमारे जैसे पड़ोसी देशों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा और इसलिए इस मुद्दे पर एक क्षेत्रीय फ़ोकस और सहयोग बनाना आवश्यक है."

चीन और पाकिस्तान भी एससीओ का हिस्सा हैं. मोदी ने तालिबान के अधीन अफ़ग़ानिस्तान के साथ चार समस्याएँ बताईं, उनमें से एक अस्थिरता और कट्टरवाद की दृढ़ता थी, जो उनके अनुसार "दुनिया भर में आतंकवादी और चरमपंथी विचारधाराओं" को प्रोत्साहित करेगी. साथ ही अन्य चरमपंथी समूह भी हिंसा का सहारा लेकर सत्ता में आने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं.

लेकिन पिछले महीने अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों की वापसी के बाद से अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में कम दिलचस्पी दिखा रहा है. विशेषज्ञों के साथ बातचीत से जो बात समझ में आती है, वह यह है कि अमेरिका में जनता की अफ़ग़ानिस्तान में कोई दिलचस्पी नहीं है और न ही बाइडन प्रशासन को चिंता है.

इसके विपरीत, अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद, भारत को तालिबान शासन के तहत वास्तविक सुरक्षा संबंधी चिंताएँ हैं. इसलिए अफ़ग़ानिस्तान में अधिक रुचि रखने के लिए इसके जायज़ कारण हैं.

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क्या मोदी बाइडन को अफ़ग़ानिस्तान पर राज़ी कर पाएँगे?

कैलिफ़ोर्निया में सैन डियागो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अहमत कुरु इस्लाम में विशेषज्ञता रखते हैं. उनका मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ अपनी बैठक के दौरान, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका से अफ़ग़ानिस्तान पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह कर सकते हैं ताकि इसे अंतरराष्ट्रीय कट्टरवाद और आतंकवाद का केंद्र बनने से रोका जा सके.

लेकिन उनके विचार में अब बहुत देर हो चुकी है. वे कहते हैं, "अमेरिका ने पहले ही अफ़ग़ानिस्तान से पूरी तरह से अलग होने का फ़ैसला कर लिया है. अमेरिकी जनता की राय अफ़ग़ानिस्तान के साथ किसी भी प्रकार के फिर से जुड़ाव का विरोध करती है. अमेरिका को अब और अधिक गंभीर मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना है, जिनमें चीन और उप-सहारा अफ़्रीका में बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथी जैसी भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है."

शिकागो विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर टॉम गिन्सबर्ग एक राजनीतिक वैज्ञानिक हैं. उनका कहना है कि भारत जानता था कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका की वापसी तय थी.

वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि भारत और अमेरिका इस समय प्राथमिकताओं में कुछ मतभेदों के बावजूद एक स्वाभाविक सहयोगी हैं. बड़ा मुद्दा चीनी शक्ति है, जबकि अफ़ग़ानिस्तान से वापसी ज़रूरी थी. हालाँकि भारत अधिक असुरक्षित महसूस करता है, मुझे नहीं लगता कि यह अप्रत्याशित था."

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा था कि बाइडन प्रशासन देश पर कड़ी नज़र रखेगा और अफ़ग़ानिस्तान को आतंकवादी संगठनों का अड्डा नहीं बनने देगा.

कुछ लोगों का तर्क है कि चीन भारत के लिए एक बड़ा सुरक्षा खतरा बना हुआ है, ख़ासकर पिछले साल गलवान घाटी की झड़पों के बाद. उनका तर्क है कि चीन का मुक़ाबला करने के लिए अमेरिका से हाथ मिलाना भारत के लिए भी उतना ही ज़रूरी है.

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अमेरिका चीन से निपटने के लिए अपनी वैश्विक नेतृत्व की भूमिका को फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. अमेरिका के वैश्विक नेतृत्व की स्थिति को त्यागने का राष्ट्रपति ट्रंप का निर्णय था.

लेकिन राष्ट्रपति बाइडन ने जनवरी में सत्ता में आते ही उस निर्णय को पलट दिया और घोषणा की कि "अमेरिका वापस आ गया है". उन्होंने जलवायु परिवर्तन, वैक्सीन वितरण और चीन के मुद्दे पर नेतृत्व करने के लिए बार-बार विश्व मंच पर अपने इस दावे को दोहराया.

संयुक्त राष्ट्र में बाइडन ने मंगलवार के भाषण में चीन के ख़तरों की ओर इशारा किया और अमेरिका के भागीदारों को आश्वासन दिया कि वह नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए तैयार है. पिछले हफ्ते अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ तीन-तरफा पनडुब्बी समझौता, जिसे AUKUS कहा जाता है, उस दिशा में एक ठोस क़दम है.

लेकिन अगर ऐसा है, तो ये भी प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में हो सकता है. अमेरिका को चीन के ख़िलाफ़ भारत की ज़रूरत पड़ेगी. जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में एप्लाइड इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर और प्रसिद्ध विश्लेषक स्टीव हैंके कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व को फिर से स्थापित करने की अपनी खोज में पिछले सप्ताह ही बाइडन ने चीन को चुनौती देने के उद्देश्य से ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन को AUKUS गठबंधन को तैयार किया. गठबंधन को प्रभावी ढंग से काम करने के लिए, बाइडन को भारत की स्वीकृति की आवश्यकता होगी."

'अगर भारत अपने पत्ते अच्छे से खेलता है, तो यह एक बड़ा खिलाड़ी होगा'

भले ही पीएम मोदी और राष्ट्रपति बाइडन के बीच कोई व्यक्तिगत केमिस्ट्री नहीं है, लेकिन दोनों देशों के रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं.

प्रोफ़ेसर लता वरदाराजन सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और संघर्ष समाधान संस्था की निदेशक हैं. उनका मानना है कि पीएम मोदी को व्हाइट हाउस में सुना जाएगा.

वे कहती हैं, "विशेष रूप से एशिया की धुरी और बाइडन प्रशासन की ओर से चीन को सबसे बड़े सुरक्षा ख़तरे के रूप में उजागर करना एक आधार है, जिसके चारों ओर वार्ता का नया सेट आगे बढ़ेगा. अपने सुरक्षा समझौते को नए सिरे से लागू करने और एशिया पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अमेरिका की प्रतिबद्धता AUKUS समझौते से पहले ही स्पष्ट कर दी गई है और इस मायने में, मोदी का व्हाइट हाउस में काफ़ी स्वागत होगा."

प्रोफेसर हैंके कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका की बुरी हार के बाद, राष्ट्रपति बाइडन को अमेरिका के वैश्विक नेतृत्व पर ज़ोर देने की ज़रूरत है. यहाँ भारत के लिए एक अवसर है, जैसा कि प्रो. हैंके का तर्क है, "यह मेरे लिए स्पष्ट है कि दुनिया के गठबंधन नए सिरे से बन रहे हैं. अगर भारत अपने पत्ते अच्छी तरह से खेलता है, तो यह एक बड़ा खिलाड़ी होगा."

स्विट्जरलैंड में जिनेवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ जियोपॉलिटिकल स्टडीज़ के अकादमिक निदेशक प्रोफ़ेसर अलेक्जेंड्रे लैम्बर्ट का भी मानना है कि भारत में एक मज़बूत वैश्विक खिलाड़ी बनने की क्षमता है. लेकिन उन्हें नहीं लगता कि भारत ख़ुद को अमेरिका के साथ जोड़कर अपनी क्षमता को पूरा कर सकता है. अफ़ग़ानिस्तान में भारत 20 साल तक अमेरिका पर निर्भर करता रहा. अंत में उसे बहुत कम लाभ हुआ.

भारत अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे से निपटने के लिए अन्य साझेदारी विकल्पों पर विचार करे?

प्रोफ़ेसर अलेक्जेंड्रे लैम्बर्ट का तर्क है कि भारत को अन्य विकल्पों का पता लगाना चाहिए.

वे कहते हैं, "यक़ीनन, भारत को अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान के साथ चीज़ों को ठीक करने के लिए चीन और रूस की आवश्यकता होगी, न कि अमेरिका की. निश्चित रूप से यूरोप की तो बिल्कुल नहीं. और उसे पाकिस्तान की ज़रूरत है, भले ही यह दिल्ली में कितना भी अजीब लगे. उदाहरण के लिए, किसी भी रणनीतिक महाद्वीपीय प्राकृतिक गैस पाइपलाइन परियोजनाओं को लें, अगर भारत और पाकिस्तान बुनियादी राजनयिक मानकों पर सहमत नहीं होंगे, तो ये परियोजनाएँ शायद ही पूरी हों. मेरे विचार में, इस स्तर पर, चीन के उदय को लेकर सुरक्षा चिंता का कोई ठोस कारण नहीं है."

जानकारों का मानना है कि बाइडन के साथ मोदी की पहली व्यक्तिगत द्विपक्षीय वार्ता की सफलता काफ़ी हद तक एक बात पर निर्भर करेगी- राष्ट्रपति बाइडन को अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दों से जोड़े रखना, जैसा कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी से पहले था.

मोदी अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके बाइडन को अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दों पर टिके रहने के लिए राज़ी कर सकते हैं, अगर वे राष्ट्रपति के साथ व्यक्तिगत संबंध बना सकने में कामयाब हों. ठीक उसी तरह जिस तरह उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति ओबामा के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाए थे.

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अफ़ग़ान महिलाएं

प्रो. लता वरदराजन का मानना है कि पीएम मोदी का व्हाइट हाउस में गर्मजोशी से स्वागत किया जाएगा. वे कहती हैं, "बाइडन प्रशासन कम से कम सतह पर उसी तरह की व्यक्तिगत निकटता साझा नहीं करता है, जो ट्रंप प्रशासन की मोदी के साथ थी, मुझे लगता है कि अमेरिका के राजनीतिक हित भारत के साथ मिले हुए हैं और वो इस विशेष संबंध को जारी रखने में सक्षम होंगे और इस अर्थ में प्रधानमंत्री मोदी का व्हाइट हाउस में स्वागत किया जाएगा."

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन की आर्थिक सलाहकार परिषद में रहे प्रो. स्टीव हैंके का तर्क है कि दोनों देशों को एक दूसरे की ज़रूरत है और इसलिए दोनों नेताओं के बीच अच्छे संबंध विकसित हो सकते हैं. वह कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी के हिंदू राष्ट्रवाद के प्रति बाइडन की नापसंदगी के बावजूद, भारत उनके लिए आवश्यक है. जहाँ तक मोदी का सवाल है, उन्हें अमेरिका के समर्थन की ज़रूरत है, क्योंकि पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ भारत की पुरानी समस्याएँ अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की जीत से और बढ़ गई हैं."

राष्ट्रपति बाइडन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस दोनों पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान मोदी सरकार के मानवाधिकार रिकॉर्ड के आलोचक थे. लेकिन सत्ता में आने के बाद दोनों ने मोदी या उनकी सरकार की आलोचना करने से परहेज़ किया है.

वास्तव में, प्रधानमंत्री मोदी की मेज़बानी जो बाइडन ने अतीत में की है, जब वह अमेरिकी उपराष्ट्रपति थे. दोनों नेताओं ने हाल के महीनों में कई बार फ़ोन पर एक-दूसरे से बात की है और वर्चुअल कॉन्फ्रेंस में भाग लिया है.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पीएम मोदी एक ऐसे राष्ट्रपति से मिल रहे हैं, जिनका पूरा ध्यान चीन की बढ़ती ताक़त को रोके जाने पर है. लेकिन जैसा कि एक पूर्व भारतीय राजनयिक कहते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री के पास अमेरिकी राष्ट्रपति को जीतने के लिए पर्याप्त व्यक्तिगत गुण हैं.

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