असमः शांति समझौतों के बाद भी समूचा असम 'अशांत क्षेत्र' कैसे?

  • दिलीप कुमार शर्मा
  • गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
भारत सरकार के साथ असम अलगाववादी संगठनों का शांति समझौता

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भारत सरकार के साथ असम अलगाववादी संगठनों का शांति समझौता

बीजेपी की केंद्रीय सरकार ने बीते डेढ़ साल में असम के चरमपंथी संगठनों और कई समूहों के साथ दो बड़े शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए है. पिछले साल 20 फरवरी को असम के बोडो चरमपंथी संगठनों के साथ एक शांति समझौता किया गया था. जबकि दूसरा शांति समझौता 4 सितंबर को नई दिल्ली में कार्बी आंगलोंग ज़िले के चरमपंथी गुटों के साथ किया गया है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इन विद्रोही संगठनों के साथ हुए शांति समझौते के बाद कहा था कि उनकी सरकार ने पूर्वोत्तर क्षेत्र को स्थिरता के साथ अशांति से बाहर लाने का काम किया है.

असम सरकार भी यह दावा कर रही है कि 2016 में प्रदेश में बीजेपी का शासन आने के बाद अलग-अलग चरमपंथी संगठनों के तीन हज़ार से भी अधिक चरमपंथियों ने हथियार डाल दिए है. इन सरकारी दावों में यह भी कहा गया कि असम तथा पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद की घटनाओं में लगातार कमी आई है.

बावजूद इसके असम सरकार ने सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (आफस्पा) की धारा 3 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए 28 अगस्त से अगले छह महीने तक पूरे असम राज्य को "अशांत क्षेत्र" घोषित कर दिया है. ऐसे में ये दोनों बातें अर्थात असम में शांति स्थापित हुई है और प्रदेश को "अशांत क्षेत्र" घोषित करना विरोधाभासी लगती हैं.

दरअसल आफस्पा क़ानून के तहत असम पर बीते 31 वर्षों से "अशांत क्षेत्र" का टैग लगा हुआ है. जानकारों का कहना है कि इस क़ानून के कारण प्रदेश की छवि को जो नुकसान पहुंचा है अभी उसको सुधारने की आवश्यकता है. वरना राज्य के बाहर से "अशांत क्षेत्र" में निवेश करने कोई आना नहीं चाहेगा.

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फ़रवरी 2021 में गुवाहाटी में तत्कालीन मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवालके समक्ष आत्मसमपर्ण करते अलगाववादी लड़ाके

असम में इस क़ानून को पहली बार नवंबर 1990 में लागू किया था. यह वो साल था जब भारत सरकार ने असम के प्रमुख अलगाववादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम यानी उल्फ़ा को एक आतंकवादी संगठन घोषित करते हुए उस पर प्रतिबंध लगा दिया था.

नब्बे के दशक में असम में चरमपंथियों के शस्त्र संघर्ष के कारण हुई हिंसा और ख़ून ख़राबे में सैकड़ों नागरिकों, सुरक्षा बलों और स्वयं विद्रोहियों को अपनी जान गवानी पड़ी थी लेकिन आज प्रदेश में हालात काफ़ी हद तक सामान्य हैं.

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने 12 जुलाई को विधानसभा के अंदर कहा था कि 2016 के बाद से अबतक राज्य में 3439 चरमपंथियों ने आत्मसमर्पण किया है. साल 2016 में पहली बार बीजेपी असम की सत्ता में आई थी. सरकार ख़ुद बता रही है कि असम में पहले के मुकाबले चरमपंथी घटनाओं में कमी आई है.

मुख्यमंत्री सरमा ने यह भी जानकारी दी थी कि उनकी सरकार वर्तमान में अल्फ़ा (प्रो-टॉक), कुकी रिवोल्यूशनरी आर्मी, यूनाइटेड कुकीगाम डिफेंस आर्मी, हमार पीपुल्स कन्वेंशन- डेमोक्रेटिक सहित 11 चरमपंथी संगठनों के साथ शांति वार्ता कर रही है. लेकिन अलगाववाद की समस्या से निपट रही असम सरकार की नीतियां और शांति समझौते के लिए आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों के पुनर्वास को लेकर सवाल उठते रहें है. इन सवालों का एक बड़ा कारण राज्य को "अशांत क्षेत्र" की श्रेणी में रखना बताया जा रहा है.

शांति समझौते के बाद चरमपंथियों के पुनर्वास पर सवाल

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2015 में आत्मसपर्ण करने वाले लड़ाकों के हथियारों के साथ तस्वीर खिंचवाता भारतीय सैनिक

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असम के डिमा हसाउ ज़िले में डिमासा जनजाति के लिए डिमाराजी नाम से एक अलग राज्य गठन करने की मांग पर करीब दो दशक तक सशस्त्र संघर्ष करने वाले डिमा हलाम दाओगाह (डीएचडी-एन) नामक चरमपंथी संगठन ने साल 2013 में अपने करीब 3600 कैडरों के साथ हथियार डाल दिए थे. लेकिन इन पूर्व चरमपंथी नेताओं का आरोप है कि सरकार ने उनके कैडरों के पुनर्वास के लिए शांति-समझौते के तहत जो वादे किए थे उन्हें अबतक पूरा नहीं किया गया.

डीएचडी- एन के चेयरमैन रहे पूर्व चरमपंथी नेता दिलीप नूनिसा ने बीबीसी से कहा, "साल 2012 में भारत सरकार और असम सरकार के साथ नई दिल्ली में हमारे संगठन का त्रिपक्षीय शांति समझौता हुआ था. लेकिन अबतक हमारे कैडरों के पुनर्वास के लिए जो वादे किए गए थे उन्हें पूरा नहीं किया गया. सरकार ने हमारे ख़िलाफ़ दर्ज हुए मामलों को भी वापस नहीं लिया है. हमने अपने कैडरों को ख़ुद से पुनर्वास करने के लिए डिमासा डेयरी सहकारी समिति का गठन किया है लेकिन सरकार की तरफ से अभी इस प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं मिली है."

पूर्व चरमपंथी नेता नूनिसा कहते है, "हथियार डालने के बाद कैडरों को किसी न किसी काम में लगाना बेहद जरूरी है. वरना स्थाई शांति स्थापित करना संभव नहीं है. कुछ कैडरों को सरकार की पुनर्वास योजना के तहत डेढ़ लाख रुपए की एकमुश्त सहायता मिली थी लेकिन इतनी कम रकम में आज के दौर में कोई काम शुरू करना संभव नहीं है. हमारे संगठन के आर्मी विंग और सिविल विंग को मिलाकर 3600 कैडरों ने आत्मसमर्पण किया था. लेकिन बीते 8 सालों में कैडरों के पुनर्वास के लिए कोई खास क़दम नहीं उठाए गए. यही कारण है कि आत्मसमर्पण करने के बाद भी कई लड़के वापस उसी रास्ते पर चले जाते है."

कार्बी जनजाति के चरमपंथी गुटों के साथ शांति समझौते का विरोध

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इस बीच कार्बी-आंगलोंग ज़िले में कुछ संगठनों ने चार सितंबर को हुए कार्बी शांति समझौते को लेकर अपनी नाराज़गी व्यक्त की है. असम सरकार ने इसी महीने नई दिल्ली में पहाड़ी ज़िले कार्बी-आंगलोंग के पांच चरमपंथी गुटों के साथ शांति समझौता किया है. पिछली 25 फरवरी को गुवाहाटी में हुए एक कार्यक्रम के दौरान इन पांच अलगाववादी समूहों के कुल 1,040 चरमपंथियों ने अपने हथियारों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया था.

कार्बी लोंगरी एनसी हिल्स लिबरेशन फ़्रंट, पीपुल्स डेमोक्रेटिक काउंसिल ऑफ़ कार्बी लोंगरी, कुकी लिबरेशन फ़्रंट, यूनाइटेड पीपुल्स लिबरेशन आर्मी और कार्बी पीपुल्स लिबरेशन टाइगर नामक इन चरमपंथी गुटों के साथ चार सितंबर को नई दिल्ली में हुए कार्बी आंगलोंग शांति समझौता के बाद गृह मंत्री शाह ने कहा था, "यह समझौता असम और कार्बी क्षेत्र के इतिहास में सुनहरे शब्दों में लिखा जाएगा क्योंकि पांच अलग-अलग संगठनों के एक हज़ार से अधिक कैडरों ने मुख्यधारा में शामिल होने के लिए अपने हथियार डाल दिए हैं. केंद्र सरकार और असम सरकार दोनों उनके पुनर्वास के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं."

इस कार्बी शांति समझौते में मुख्य रूप से अगले पांच वर्षों में कार्बी आंगलोंग क्षेत्र के विकास के लिए असम सरकार ने एक हज़ार करोड़ रुपए का निवेश करने का वादा भी किया गया है. लेकिन पहाड़ी ज़िले में इस शांति समझौते को कुछ स्थानीय संगठन घोर अन्याय बता रहें है.

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क्षेत्र के राजनीतिक और गैर-राजनीतिक कुल 24 संगठनों को मिलाकर बनाए गए ऑल पार्टी हिल्स लीडर्स कांफ्रेंस नामक मंच के अध्यक्ष जोंस इंगती कथार ने इस समझौते को एक छलावा बताया है. उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "हम कार्बी लोग एक बहुत छोटी जनजाति से हैं. हमारी जनसंख्या केवल साढ़े चार लाख है और हमारे लोग काफ़ी ग़रीब है. संविधान की छठी अनुसूची का दर्जा हमारी जनजाति की सुरक्षा के लिए दिया गया था. ताकि हमारी ज़मीन, संस्कृति और भाषा सुरक्षित रहे. लेकिन नए शांति समझौते में केंद्र सरकार ने स्वायत्तशासी परिषद की 10 सीटों को गैर जनजाति समुदाय के लिए छोड़ दिया है. हमारा सवाल है कि उन लोगों को छठी अनुसूची के तहत क्यों सुरक्षा मिलनी चाहिए. वे तो बाहर से आकर यहां बसे हुए लोग है."

पूर्व आईएएस अधिकारी कथार की मानें तो केंद्र ने शांति समझौते के नाम पर चरमपंथियों को भी कुछ नहीं दिया है. वह कहते है, "ज़िले में अबतक जितने भी चरमपंथी संगठन बने है उन सभी की प्रमुख मांग कार्बी लोगों के लिए एक अलग स्वायत्तशासी राज्य गठन करने की थी. लेकिन संविधान के अनुच्छेद -244 (ए) के प्रावधान के तहत स्वायत्त राज्य की मांग समझौते में अमल ही नहीं की गई. सरकार और वार्ताकारों ने समझौते को अंतिम रूप देने से पहले इस मुद्दे पर चर्चा तक नहीं की."

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आल पार्टी हिल्स लीडर्स कांफ्रेंस के नेता कहते है कि उनका संगठन एक अलग स्वायत्त राज्य गठन की मांग पर एक नया आंदोलन शुरू करेगा.

कार्बी शांति समझौते की नई शर्तों के अनुसार कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद की मौजूदा 30 सीटों को बढ़ाकर 50 सीट किया गया है जिसमें से 10 सीटें अनारक्षित रखने का फैसला लिया गया है. हालांकि इन अनारक्षित सीटों पर कार्बी जनजाति के लोग भी चुनाव लड़ सकेंगे.

असम के काज़ीरंगा नेशनल पार्क से सटे कार्बी-आंगलोंग जिले में कार्बी जनजाति के विद्रोही गुटों की सक्रियता का एक लंबा इतिहास रहा है. 1980 के दशक के बाद से यह इलाक़ा हत्या, जातीय हिंसा, अपहरण और जबरन वसुली के कारण डर का केंद्र बन गया था. कार्बी जनजाति के लोगों के लिए एक अलग राज्य के गठन की मांग को लेकर क्षेत्र में कई चरमपंथी गुट बनाए गए. साल 1996 में भारत सरकार और असम सरकार के साथ ऑटोनोमस स्टेट डिमांड कमेटी समेत पांच जनजाति संगठनों के समझौते पर हस्ताक्षर के बाद कार्बी आंगलोंग ज़िले को संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत स्वायत्तशासी परिषद का दर्जा मिला.

इससे पहले भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली में भारत सरकार, असम सरकार और बोडो विद्रोही समूह के बीच हुए शांति समझौते के बाद यह दावा किया था कि 50 साल से अधिक पुरानी बोडो जनजाति का संकट अब खत्म हो गया है. लेकिन पिछले शनिवार को कोकराझार में असम पुलिस के साथ हुई एक मुठभेड़ में नवगठित चरमपंथी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन ऑफ बोडोलैंड के दो कैडरों की मौत से बोडो बहुल इलाक़े में शांति कायम होने के इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए है. इस नए चरमपंथी संगठन ने अलग बोडोलैंड राज्य की मांग को लेकर हाल ही में मीडिया के लिए एक वीडियो बयान जारी किया था.

असम में शांति कायम करने के लिए किए जा रहे प्रयास और प्रदेश को "अशांत क्षेत्र" घोषित करने के सवाल पर असम पुलिस की विशेष शाखा के पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक पल्लव भट्टाचार्य कहते है,"विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के क़ानून-व्यवस्था की समीक्षा करने के बाद "अशांत क्षेत्र" की घोषणा करने का निर्णय लिया जाता है. लेकिन 1990 की तुलना में वर्तमान असम की क़ानून-व्यवस्था बहुत अच्छी है और सरकार के लिए इस क़ानून को वापस लेने का यह सही समय है. आफस्पा क़ानून को हटाने के साथ ही सेना को वापस उनकी मूल जिम्मेदारी पर भेजने की जरूरत है."

पूर्व पुलिस अधिकारी आगे कहते है," जिस तरह चरमपंथी संगठनों के कैडर हथियार डालकर मुख्यधारा में लौट रहें है और शांति समझौते किए जा रहे है, उस हिसाब से अब धीरे-धीरे आफस्पा कानून को असम से वापस लेना बहुत जरूरी हो गया है. इससे राज्य की छवि को काफ़ी नुकसान पहुंचा है. त्रिपुरा, मिजोरम जैसे राज्यों से यह क़ानून उठा लिया गया है. इसके लिए सरकार को पूरी निगरानी में आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों का उचित रूप से पुनर्वास करना होगा. क्योंकि शांति समझौते की शर्तों को लागू करने में ही सारी दिक्कतें होती है."

पूर्वोत्तर राज्यों में आफस्पा क़ानून के ख़िलाफ़ लगातार तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है, भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इसकी संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है. भारत सरकार बीते कुछ सालों में असम तथा पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद की घटनाओं में कमी आने का दावा करती है लेकिन फिर भी सरकार असम समेत नागालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों को अबतक "अशांत क्षेत्र" की श्रेणी से बाहर नहीं निकाल पाई है.

मणिपुर में आफस्पा क़ानून के चलते सामने आए मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों पर काम कर रहे ह्यूमन राइट्स अलर्ट के कार्यकारी निदेशक बबलू लोइतांगबम कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में अपने एक फ़ैसले में कहा था किसी विकट स्थिति में ही "अशांत क्षेत्र" घोषित करने की जरूरत होती है. लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में सरकार को इस क़ानून के सहारे काम करने की एक आदत पड़ गई है. मणिपुर में भी पहले के मुक़ाबले क़ानून- व्यवस्था की स्थिति में काफ़ी सुधार हुआ है और मणिपुर मानवाधिकार आयोग ने पिछले महीने राज्य सरकार से अपनी सिफ़ारिश में कहा है कि यहां अब आफस्पा क़ानून की आवश्यकता नहीं है. साल 2004 में जिस तरह सात विधानसभा क्षेत्र से इस क़ानून को हटाया गया था वैसे ही अब समूचे राज्य से इस क़ानून को हटाने का समय आ गया है. असल में "अशांत क्षेत्र में सरकारी कामकाज की जांच बहुत कम होती है. जैसे की आरटीआई का कामकाज ठीक से नहीं होता है. इसके अलावा भ्रष्टाचार के मामलों में पारदर्शिता इतनी ज्यादा नहीं रहती."

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि जब किसी इलाक़े को "अशांत क्षेत्र" घोषित किया जाता है तो वहां सेना की नियुक्ति से जुड़े ख़र्च के लिए भारत सरकार सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई) के तहत अच्छा खासा फंड देती है. एसआरई मद के तहत ख़र्च की जाने वाली राशि का कई बार हिसाब नहीं रखा जाता. लिहाजा एसआरई फंड में धांधली करने के आरोप उठते रहते हैं.

"अशांत क्षेत्र" और चरमपंथियों के पुनर्वास पर सत्तारूढ़ बीजेपी का जवाब

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असम मेघालय सीमा पर ताज़ा तनाव के बाद तैनात सुरक्षाकर्मी

सत्तारूढ़ बीजेपी के वरिष्ठ नेता प्रमोद स्वामी कहते हैं, "असम में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से राज्य में चरमपंथी समस्या को पूरी तरह ख़त्म करने के प्रयास के तहत ही शांति वार्ता की जा रही है. इन प्रयासों का ही नतीजा है कि सालों से संघर्ष कर रहे बोडो चरमपंथी गुट आज मुख्यधारा में लौट आए है. कार्बी-आंगलोंग ज़िले में चरमपंथी गुटों के साथ शांति समझौता हो गया है. उल्फा के परेश बरुआ गुट ने भी सकारात्मक संकेत दिए है. अभी कुछ चरमपंथी गुट वार्ता में शामिल नहीं हुए है लिहाजा सुरक्षा एजेंसियों की समीक्षा के बाद ही "अशांत क्षेत्र" घोषित करने का फैसला लिया जाता है. सरकार ने एहतियात के तौर पर यह क़दम उठाया है. अफगानिस्तान में जो अभी तालिबानी शासन आया है उससे भी कहीं यहां जिहादी गतिविधियों को बढ़ावा नहीं मिल जाए उस पर एहतियात के तौर नजर रखी जा रही है. क्योंकि कुछ जिहादी मानसिकता वाले लोग भी यहा है, इसलिए इन तमाम तरह की बातों को ध्य़ान में रखते हुए ही और ख़ुफ़िया रिपोर्टों के आधार पर यह निर्णय लिया है."

लेकिन शांति समझौते के तहत जिन कैडरों ने आत्मसमर्पण किया था उन लोगों के पुनर्वास को लेकर आरोप लग रहे है. इस सवाल का जवाब देते हुए स्वामी कहते है, "शांति समझौते की शर्तों को लागू करने की एक प्रक्रिया होती है उसके अनुसार ही सरकार को आगे काम करना होता है. मुख्यधारा में लौटने वाले चरमपंथियों को आर्थिक मदद देने के साथ ही उनके पुनर्वास के लिए कई सारी योजनाओं पर काम किए जा रहे है. अलगाववाद की समस्या के स्थाई समाधान के लिए ही केंद्र सरकार और राज्य सरकार लंबी बातचीत के बाद शांति समझौते करती है और उसी अनुसार पुनर्वास प्रक्रिया का काम किया जाता है."

फिलहाल प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम - इंडिपेंडेंट (अल्फ़ा-आई) ने कोविड-19 महामारी की स्थिति को देखते हुए इस साल मई से एकतरफ़ा युद्ध विराम घोषित कर रखा है.

इसके अलावा डिमासा नेशनल लिबरेशन आर्मी नामक अलगाववादी संगठन ने भी 7 सितंबर को अगले छह महीने के लिए एकतरफ़ा युद्ध विराम घोषित किया है. इस संगठन ने हाल ही में पहाड़ी जिले डिमा हसाउ में पांच ट्रक चालकों की हत्या कर दी थी.

सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून (आफस्पा) क्या है?

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पूर्वोत्तर में बढ़ते अलगाववाद की समस्या को देखते हुए और सेना को कार्रवाई में मदद के लिए 11 सितंबर 1958 को सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून अर्थात आफस्पा पारित किया गया था.

बाद में आतंकवाद से निपटने के लिए 1990 में इस क़ानून को जम्मू-कश्मीर में लागू किया गया. आफस्पा क़ानून कहीं भी तब लगाया जाता है जब वो क्षेत्र वहां की सरकार अशांत घोषित कर देती है.

इसके लिए संविधान में प्रावधान किया गया है और अशांत क्षेत्र क़ानून यानी डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट मौजूद है जिसके अंतर्गत किसी क्षेत्र को अशांत घोषित किया जाता है.

जिस क्षेत्र को अशांत घोषित कर दिया जाता है वहां पर ही आफस्पा क़ानून लगाया जाता है और इस क़ानून के लागू होने के बाद ही वहां सेना या सशस्त्र बल भेजे जाते हैं.

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