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उत्तराखंड: सवर्ण छात्रों ने दलित महिला के हाथों का खाना खाने से किया इनकार, क्या है पूरा मामला- ग्राउंड रिपोर्ट
इमेज स्रोत, Rajesh Dobriyall/BBC
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, चंपावत के सूखीढांग से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड के चंपावत ज़िले के एक सरकारी स्कूल में सवर्ण परिवारों के बच्चों ने दलित भोजन माता के हाथ का खाना खाने से इनक़ार कर दिया था.
इस मामले के सामने आने के बाद प्रशासन ने न सिर्फ़ उस भोजन माता को काम से हटा दिया बल्कि इस पद पर नए सिरे से नियुक्ति करने का भी एलान कर दिया.
स्थानीय मीडिया में कहा जा रहा है कि इसके साथ ही इस मामले का पटापेक्ष हो गया है.
लेकिन बीबीसी हिंदी की ज़मीनी पड़ताल में यह सामने आया कि यह मामला अभी और उलझने जा रहा है.
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क्रोनोलॉजी समझिए
चंपावत के सूखीढांग इंटर कॉलेज के कुल 230 छात्र-छात्राओं में से छठी से आठवीं तक के 66 छात्र-छात्राओं के लिए मिड-डे-मील बनता है.
इसके लिए यहां भोजन माता के दो पद हैं. 11 अक्टूबर तक यहां भोजन माता के रूप में शकुंतला देवी और विमलेश उप्रेती काम कर रही थीं.
शकुंतला देवी की आयु 60 वर्ष से अधिक हो जाने के कारण उन्हें हटा दिया गया. उनकी जगह दूसरी भोजन माता को रखने की प्रक्रिया अक्टूबर में शुरू हुई और 28 अक्टूबर को इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल प्रेम सिंह ने नई भोजन माता की नियुक्ति के लिए एक विज्ञप्ति बनाकर उसे प्रचलित माध्यमों (वाट्सऐप ग्रुप्स और स्थानीय बाज़ार में विज्ञप्ति चिपकाकर, बच्चों से माता-पिता के लिए संदेश भिजवाकर) पर उसे जारी कर दिया.
इसके जवाब में 6 आवेदन आए थे जिनमें एक अनुसूचित जाति और 5 सामान्य वर्ग के थे. कुछ एसएमसी (विद्यालय प्रबंधन कमेटी) और कुछ पीटीए (शिक्षक-अभिभावक संघ) सदस्यों ने इनमें से पुष्पा भट्ट के नाम का प्रस्ताव किया. सभी आवेदक एपीएल श्रेणी की थीं, इसलिए एसएमसी के सचिव स्कूल के प्रिसिंपल ने इसे मानकों के अनुसार न मानकर प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए.
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इसके बाद 12 नवंबर को एक और विज्ञप्ति जारी की गई. इसमें पुरानी विज्ञप्ति के अलावा यह भी उल्लेख किया गया कि नियुक्ति में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति की महिला को प्राथमिकता दी जाएगी.
दूसरी विज्ञप्ति के बाद कुल 11 आवेदन आए जिनमें से एक को निरस्त कर दिया गया था. बाकी बची 10 महिलाओं में से 5 सवर्ण और 5 अनुसूचित जाति की थीं.
इसके बाद स्कूल के प्रिंसिपल ने रसायन के लेक्चरर चंद्रमोहन मिश्रा की अध्यक्षता में 4 शिक्षकों की एक समिति बनाई, जिसने इन आवेदनों की जांच की और दलित महिला सुनीता देवी के नाम की संस्तुति की, जो बीपीएल श्रेणी की हैं.
25 नवंबर को इन आवेदनों पर चर्चा के लिए बैठक बुलाई गई जिसमें आवेदनकर्ताओं के अलावा पीटीए अध्यक्ष नरेंद्र जोशी, एसएमसी अध्यक्ष स्वरूप राम, बीडीसी मेंबर दीपा जोशी, ग्राम प्रधान जौल दीपक कुमार, ग्राम प्रधान सियाला जगदीश प्रसाद और प्रिंसिपल (जो उस दिन काम से बाहर गए हुए थे) के प्रतिनधि के रूप में प्रभारी प्रधानाचार्य चंद्रमोहन मिश्रा शामिल हुए.
इस बैठक में सवर्ण प्रतिनिधियों ने पुष्पा भट्ट के नाम का प्रस्ताव दिया और दलित समुदाय के लोग सुनीता देवी के पक्ष में खड़े हो गए. बैठक में वाद-विवाद और तू-तू मैं-मैं के बाद दलित समुदाय के लोग बैठक छोड़कर चले गए. सवर्ण वर्ग ने पुष्पा भट्ट के नाम का प्रस्ताव बनाकर उसे बहुमत से पास कर लिया.
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प्रभारी प्रधानाचार्य चंद्रमोहन मिश्रा ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया. पीटीए अध्यक्ष नरेंद्र जोशी, दीपा जोशी और अन्य इस प्रस्ताव को लेकर प्रिंसिपल से मिले तो उन्होंने सर्वसम्मति बनाने की बात कही.
इसके बाद प्रिंसिपल प्रेम सिंह ने 4 दिसंबर को एक और बैठक बुलाई. इस बैठक में सवर्ण वर्ग के प्रतिनिधि शामिल नहीं हुए और सुनीता देवी के नाम के प्रस्ताव पर मुहर लग गई.
प्रिंसिपल प्रेम सिंह ने सुनीता देवी को कहा कि वह 13 दिसंबर से काम करने लगें लेकिन जब तक नियमानुसार खंड शिक्षा अधिकारी की ओर से अनुमति न मिल जाए, वह इसे नौकरी न मानें. सुनीता देवी की यह अनाधिकारिक सरकारी नौकरी 20 तारीख तक ही चली, कुल 8 दिन.
मामले के सुर्खियों में आने के बाद शिक्षा विभाग ने किसी भी तरह की नियुक्ति पर रोक लगा दी और खंड शिक्षा अधिकारी को मामले की जांच सौंप दी.
न सुनीता देवी को और न ही पुष्पा भट्ट को कोई नियुक्ति पत्र मिला था.
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पहले दिन से ही छोड़ा खाना
सुनीता देवी के भोजन माता के काम करने के साथ ही उत्तराखंड के समाज में बहुत भीतर तक पांव जमा चुका जातिवाद बाहर आ गया.
उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया कि पहले ही दिन 7 बच्चों ने उनके हाथ का बना खाना खाने से इनकार कर दिया. दूसरे दिन 23, तीसरे दिन 18 बच्चों ने खाया और आख़िरी दिन 16 बच्चों ने खाया. आख़िरी दिन सुनीता देवी के हाथ का खाने वाले बच्चों की संख्या 16 थी और ये सभी दलित समुदाय के थे.
पीटीए अध्यक्ष नरेंद्र जोशी ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में दावा किया कि इस मामले में जाति का कोई मामला नहीं है. यह सभी निराधार बातें हैं. वह और उनके साथ मौजूद कुछ लोगों ने यह भी कहा कि यह बच्चों का अपना फ़ैसला था, वह चाहें तो खाना खा सकते थे. अभिभावकों को कोई एतराज़ नहीं था.
वह यह भी कहते हैं कि इस पद पर पुष्पा देवी का दावा मजबूत है क्योंकि वह बेहद ग़रीब है, परित्यकता है और बहुत मुश्किल से समय काट रही है.
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बैठक में मौजूद रहीं बीडीसी मेंबर दीपा जोशी भी उनकी बात का समर्थन करती हैं. सियाला ग्राम पंचायत के प्रधान जगदीश प्रसाद इसके ठीक विपरीत बात कहते हैं.
वह कहते हैं 25 तारीख़ की बैठक में जैसे ही पता चला कि स्कूल की कमेटी ने सुनीता देवी के नाम को फ़इनल किया है, नरेंद्र जोशी ने साफ़ शब्दों में कह दिया कि फिर तो कोई खाना नहीं खाएगा. स्कूल में सवर्ण बच्चों की संख्या अधिक है तो भोजन माता भी सवर्ण होनी चाहिए.
पुष्पा भट्ट का दावा मज़बूत होने की बात पर जगदीश कहते हैं कि नियमानुसार तो सुनीता देवी का ही दावा सही था और उसकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति पुष्पा भट्ट के मुकाबले बहुत खराब है.
बच्चों ने बीबीसी हिंदी को जो बताया उससे भी ऐसा ही लगता है कि यह पहले से तय था कि दलित भोजन माता के हाथ का खाना नहीं खाना है.
सवर्ण वर्ग के जिन बच्चों ने सुनीता देवी के हाथ का खाना नहीं खाया उनके अनुसार उनके परिजनों ने उन्हें मिड-डे-मील खाने से मना किया था क्योंकि उसे एक एससी महिला बना रही थी. इसके लिए बच्चों को यह भी तर्क दिया गया क्योंकि घर में सब पूजा-पाठ वाले हैं, इसलिए ऐसा नहीं कर सकते.
अपने साथियों की देखा-देखी धीरे-धीरे अन्य बच्चों ने भी खाना छोड़ दिया.
सवर्ण बच्चों के अभिभावकों ने स्कूल में पहुंचकर हंगामा भी किया और आरोप लगाया कि उनके बच्चों को डांट-मार कर मिड-डे-मील खिलाया जा रहा है. हालांकि स्कूल के शिक्षकों ने इससे इनकार किया.
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जांच अभी बाकी हैं
'सरकारी नौकरी' से छुट्टी होने के बाद सुनीता देवी ने नरेंद्र जोशी, दीपा जोशी समेत कुछ लोगों पर जातिसूचक शब्द कहने और अपमान करने का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत कर दी.
उनका कहना है कि स्कूल में आते-जाते समय उन पर फ़ब्तियां कसी जाती थीं और इसकी वजह से स्कूल में पढ़ने वाले उनके बच्चों को भी अपमान झेलना पड़ा है.
हालांकि नरेंद्र जोशी और दीपा जोशी इसे लेकर बहुत चिंतित नहीं दिखते. वह कहते हैं कि जांच में सच सामने आ ही जाएगा.
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इस मामले की जांच चल्थी के चौकी इंचार्ज देवेंद्र सिंह बिष्ट को सौंपी गई है.
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा कि जांच शुरू कर दी गई है और तथ्यों के आधार पर वह अपनी रिपोर्ट फ़ाइल करेंगे. हां अभी एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई है.
कब तक? इस सवाल का वह जवाब नहीं देते.
इस विवाद के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने भी खंड शिक्षा अधिकारी को मामले की जांच सौंपी है.
चंपावत के मुख्य शिक्षा अधिकारी आरसी पुरोहित ने बीबीसी हिंदी को कहा कि जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की जाएगी. अगर प्रिंसिपल की गलती पाई गई तो नियमानुसार कार्रवाई भी की जाएगी.
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बहुत गहरी हैं जातिवाद की जड़ें
बीडीसी मेंबर दीपा जोशी ने भी इस मामले पर वही कहा, जो नरेंद्र जोशी ने कहा था.
उन्होंने कहा कि वह जातिभेद नहीं करतीं और बच्चे चाहें तो किसी के भी हाथ का मिड-डे-मील खा सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि सुनीता देवी के भोजन माता बनने के बाद दलित समुदाय के लोग उनके घर पर आकर तंज कसते थे.
लेकिन अगर फिर होने वाली नियुक्ति में फिर से सुनीता देवी या किसी और दलित महिला को ही फिर से भोजन माता चुन लिया गया तो?
जोशी कहती हैं कि फिर गांव के बच्चे खाना नहीं खाएंगे. अगर ज़बरदस्ती की गई तो वह अपने सभी बच्चों को स्कूल से निकाल लेंगे.
यह कोरी धमकी नहीं है. सूखीढांग इंटर कॉलेज के ठीक सामने कांडा का सरकारी प्राइमरी स्कूल है. सियाला के प्रधान जगदीश प्रसाद कहते हैं कि अब उस स्कूल में सिर्फ़ दलित समुदाय के बच्चे ही पढ़ते हैं. चार-पांच साल पहले वहां भी भोजन माता एक दलित महिला को बनाया गया था. उसके बाद सवर्णों ने अपने बच्चों को वहां से निकाल लिया. अब उस स्कूल को दलितों का स्कूल ही कहा जाता है.
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दुख और शर्म
सुनीता देवी इस सारे प्रकरण के बाद बेहद क्षुब्ध नज़र आती हैं. लेकिन क्या उनके साथ भेदभाव पहले नहीं होता था? अब क्या बदल गया है?
वह कहती हैं कि इससे उनका सिर नीचा हुआ है, बदनामी हुई है. सभी लोगों (सवर्ण अभिभावकों) ने हंगामा किया, अपशब्द बोले. वह इस बात से बहुत दुखी दिखती हैं कि उनके हाथ का खाना खाने से बच्चों ने इनकार कर दिया.
वह कहती हैं कि अब तक अपने बच्चों को जैसे पाल रही थी, वैसे ही पाल लेती... लेकिन यह सरकारी नौकरी है, कोई दिहाड़ी मज़दूरी नहीं.
सियाला प्रधान जगदीश प्रसाद कहते हैं कि पहली बार इस स्कूल में किसी एससी महिला को भोजन माता बनाने का प्रयास किया गया था लेकिन उसकी वजह से हमें भी बहुत अपमान झेलना पड़ा है. बच्चों से भी ख़राब बर्ताव किया जा रहा है, उनका मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा है.
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वह कहते हैं कि जब विद्या के मंदिर में ही इतनी हीन भावना बच्चों में भर दी जाएगी तो वह बड़े होकर क्या करेंगे.
हिंदी प्रवक्ता, हरिओम पारखी इस पूरे प्रकरण को बेहद दुखद और शर्मनाक बताते हैं. वह कहते हैं कि इस प्रकरण से स्कूल की बदनामी हुई है.
वह कहते हैं कि ख़बरों में पढ़कर दूर-दूर से उनके जानने वाले उन्हें फ़ोन कर पूछते हैं कि यह क्या मामला है? यह सब बहुत ख़राब लगता है.
हरिओम पारखी स्कूल में एनएसएस के इंचार्ज भी हैं.
वह कहते हैं "एनएसएस में तो सभी वर्गों के बच्चे मिलकर काम करते हैं, उनमें कोई विभेद नहीं दिखा. लेकिन इस मामले के बाद अब बच्चों में भी जातिवाद की भावना घर कर गई है."
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अभी खत्म नहीं, शुरू हुई है यह कहानी
स्थानीय मीडिया में भोजन माता की 'नियुक्ति' रद्द किए जाने को इस मामले का पटापेक्ष बताया गया. हालांकि दोनों पक्षों के रुख़ को देखकर लगता नहीं कि ऐसा है. पुलिस या विभाग की जांच में क्या निकलेगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन दोनों पक्ष अपनी तरफ़ से तैयारी कर रहे हैं.
स्कूल प्रिंसिपल प्रेम सिंह ने इस मामले पर तो कोई टिप्पणी नहीं की कि क्या हुआ था. उन्होंने बस इतना कहा कि जांच चल रही है, मेरा बोलना ठीक नहीं. 2010 से इस इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल प्रेम सिंह इस बात पर व्यथित नज़र आते हैं कि कार्यकाल पूरा होने से 2 साल पहले वह इस विवाद में फंस गए.
अब उन्हें यह आशंका सता रही है कि इस विवाद के सामने आने के कारण उन्हें सज़ा स्वरूप दूर-दराज में कहीं ट्रांसफ़र किया जा सकता है. वह कहते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो वह कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे.
सुनीता देवी भी अब इस लड़ाई को छोड़ने को तैयार नहीं हैं. वह कहती हैं कि जब नए सिरे से नियुक्ति प्रक्रिया शुरू होगी तो वह फिर आवेदन करेंगी.
वह कहती हैं कि चाहे उन्हें अनशन करना पड़े वह अपना दावा नहीं छोड़ेंगी.
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नियमानुसार भोजन माता के पद पर अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी की प्रत्याशी को प्राथमिकता दी जानी है. इसलिए अगर सुनीता देवी या कोई अन्य दलित महिला इस पद के लिए आवेदन करती है तो उसे नौकरी मिलनी लगभग तय है.
ऐसे में क्या सवर्ण वर्ग के लोग सूखीढांग इंटर कॉलेज से भी कांडा के प्राइमरी की तरह बच्चों को निकाल लेंगे?
चंपावत के मुख्य शिक्षा अधिकारी आरसी पुरोहित कहते हैं कि सभी अभिभावकों से मिलकर उन्हें यह समझाने का प्रयास किया जाएगा कि वह सामाजिक समरसता को बढ़ावा दें और कोई विवाद न करें.
हालांकि इसका कितना असर होगा, इसे लेकर वह भी आश्वस्त नज़र नहीं आते.
पर शिक्षा विभाग के सामने एक चुनौती और है. स्कूल में पढ़ रहे सुनीता देवी के दो बच्चों समेत कई बच्चे अब मिड-डे मील नहीं खा रहे हैं. वह घर से टिफ़िन लेकर आ रहे हैं. सुनीता देवी का कहना है कि जब उनके हाथ से सवर्णों ने नहीं खाया तो उनके बच्चे क्यों सवर्णों के हाथ का खाएं?
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