नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का दूसरा पहलू

नरेंद्र मोदी

गुजरात के मुख्यमंत्री और भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा के भविष्य के रूप में देखे जा रहे नरेंद्र मोदी मौजूदा भारतीय राजनीति के शायद सबसे ज़्यादा चर्चित और सबसे विवादित राजनेता हैं.

लेकिन हम उनसे बातचीत करने गए थे एक ऐसे कार्यक्रम (बीबीसी- एक मुलाक़ात) के लिए जिसमें एजेंडा विवादों से परे होता है और प्रयास होता है कि सार्वजनिक व्यक्तित्व के पीछे छिपे हुए निजी इंसान को श्रोताओं और पाठकों के समक्ष पेश किया जाए.

इसबार उनसे मिलने से पहले दिमाग में कई बातें थीं. मीडिया ने ज़्यादातर मोदी का रौद्र रूप ही देखा है.

मोदी जी इस कार्यक्रम के लिए तैयार तो बिना किसी ख़ास हील-हुज्जत के हो गए थे पर शंका थी कि मुख्यमंत्री हैं, लोगों का कहना है कि मिज़ाज भी कुछ तीखा है, पता नहीं कैसा मूड हो और बीबीसी एक मुलाक़ात की कुछ चुलबुली, बेतकल्लुफ़ और ग़ैर परंपरागत शैली से उखड़ न जाएं

थोड़ा इंतज़ार उन्होंने ज़रूर करवाया पर जब बातचीत शुरू हुई तो बहुत खुलकर की. मसलन, बचपन के बारे में, अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए हिमालय की गोद में बिताए गए 3-4 वर्षों के बारे में और कई बार भीड़ में भी अकेलेपन के एहसास के बारे में.

अपने मन के बालक की भी मोदी ने चर्चा की. जीवनसाथी के बारे में सोच की भी और अपने अनुशासन, मेहनती जीवन में भी कैसे उन्हें कुछ करीने से और कुछ जंचकर रहने का शौक है, इसकी भी बात की.

"मेरी आधी बाहों का मोदी कुर्ता भी अब एक ब्रांड बन चुका है और दुनिया के कई शहरों में बिकता है." मोदी का हंसते-हंसते कहना था.

जीवन में आगे की योजना और रोडमैप के बारे में उनका बार बार कहना था कि वो बहुत योजना बनाकर नहीं चलते. हर पल को जीते हैं, हर पल को स्वीकार करते हैं.

इर्द-गिर्द सुलगते सवाल

पर हम यह तो जानते ही हैं कि वो भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी यानी भाजपा के अघोषित भविष्य हैं और हिंदुत्व की राजनीति के केंद्रबिंदु भी. हम तो उनके राजनीतिक भविष्य का विश्लेषण कर ही सकते हैं.

ध्रुवीकरण की राजनीति में मोदी का कोई सानी नहीं है. या तो लोग उनके कट्टर विरोधी हैं या फिर प्रबल समर्थक.

विरोधियों के लिए नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता के सबसे ख़तरनाक स्वरूप हैं. वो उन्हें भाजपा और संघ परिवार के सबसे प्रभावी, दक्षिणपंथी और शक्तिशाली मुस्लिम-विरोधी चेहरे के रूप में देखते हैं.

नरेंद्र मोदी के विरोधियों के लिए मोदी पर हर बहस, चर्चा और विश्लेषण का आरंभ और अंत गुजरात दंगों के साथ ही होता है लेकिन नरेंद्र मोदी की शख़्सियत का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे उनके विरोधी चाह कर भी नकार नहीं सकते.

मोदी विरोधियों का ही नहीं ज़्यादातर स्वतंत्र प्रेक्षकों का भी यही मानना है कि गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी सरकार, ख़ासकर गुजरात पुलिस की भूमिका 'रक्षक ही भक्षक बन गए' की तर्ज़ पर थी.

मोदी समर्थक उनके सादे जीवन, आडंबररहित एवं प्रभावी प्रशासन शैली और गुजरात में उनके शासनकाल में चौतरफ़ा विकास के भी उतने ही कायल हैं जितने कि उनके हिंदुत्व नारों और उनकी करिश्माई भाषण शैली के.

नरेंद्र मोदी में कुछ और भी गुण हैं. जो उन्हें आम भारतीय राजनेता से अलग करते हैं. उनके विरोधी भी उन्हें एक ईमानदार राजनेता मानते हैं. फिर मोदी अब तक स्वयं को चमचों और चाटुकारों की भीड़ से भी अलग रखने में कामयाब रहे हैं.

मोदी के आलोचक भी ये मानते हैं कि वे स्वयं को एक अलग तरह के राजनेता के रूप में स्थापित करने में कामयाब हुए हैं जो विकास को मुद्दा बनाकर भी चुनाव जीत सकता है. कहीं न कहीं मोदी ने मध्यमवर्गीय भारत की राजनीति के प्रति उदासीनता को अपने प्रति भुनाया है, स्वयं को भीड़ से अलग रखकर, दिखाकर और काम कर.

भ्रष्ट और चमचों की भीड़ से घिरे भारतीय राजनेता की जो वितृष्णा से भर देने वाली छवि है, उससे अलग नरेंद्र मोदी उस वर्ग को एक ताज़गी का अहसास देते हैं, जिनका मोदी-आकलन गुजरात दंगों में उनकी और उनकी सरकार की भूमिका तक ही सीमित नहीं है.

राजनीति की बिसात पर

उनके समर्थकों को सिर्फ़ हिंदुत्व और सांप्रदायिक बनाम धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पैमाने पर ही जाँचना भी शायद सही नहीं होगा.

और यही कारण है कि कम से कम गुजरात में नरेंद्र मोदी को जितना गुजरात दंगों की तोप से मारने की कोशिश होती है और गुजरात के हिटलर या हत्यारे की संज्ञा दी जाती है, उतना ही उसका राजनीतिक लाभ उन्हें मिल जाता है.

पर क्या गुजरात का नुस्खा राष्ट्रीय स्तर पर भी मोदी को लाभ पहुँचा सकता है. क्योंकि ज़्यादातर प्रेक्षकों का मानना है कि आडवाणी के उत्तराधिकारी नरेंद्र मोदी ही हैं और उनके बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ही होंगे.

भारतीय चुनावों के संदर्भ में भविष्यवाणी करने की नासमझी और बड़बोलापन मेरी कमियों की फ़ेहरिस्त में अभी तक नहीं है. लेकिन एक राजनीतिक प्रेक्षक की तरह अगर मैं सिर्फ़ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के संदर्भ में संभावनाओं का आकलन करूँ तो मैं नहीं समझता कि गुजरात का फ़ार्मूला राष्ट्रीय मंच पर आसानी से लागू होगा.

मोदी की उम्मीदवारी तगड़ी होगी और वह बदलाव के वादे के साथ स्वयं को एक ईमानदार एवं सशक्त राजनीतिज्ञ के रूप में पेश करेंगे.

बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि वह स्वयं को कितना एक एंटी- पॉलिटिश्यन या ये कहिए कि एक नए तरह के राजनेता के रूप में पेश कर पाते हैं.

पसंद का पैमाना

मतलब यह कि मध्यम वर्गीय भारतीयों की नज़र में जो आज राजनेताओं को हिकारत की नज़र से देखा जाता है, उससे हटकर मोदी ने अपनी सम्मानयोग्य, जुझारू और ईमानदार नेता के रूप में पहचान बनाई है जो विकास और 'काम कर पाने' के एजेंडा पर खरा उतरता हो.

मोदी के आलोचकों को भी ये मानना पड़ेगा कि 2007 में उनकी जीत में विकास और एक आम राजनेता से अलग उनकी छवि की भी एक निश्चित भूमिका थी.

पर फिर भी मेरा मानना है कि मोदी की राष्ट्रीय मुहिम के दौरान गुजरात दंगों का भूत शायद उन्हें पहली बार वह चुनौती देगा, जो उन्हें अब तक गुजरात में नहीं मिल पाई है.

मुझे नहीं लगता कि अपनी आक्रामक, मुसलमान विरोधी छवि में कुछ नरमी लाए बग़ैर और मुसलमानों को कहीं न कहीं अपने साथ जोड़े बग़ैर मोदी उस मिशन को पूरा कर पाएंगे जो बक़ौल उनके 'स्वयं भगवान ने उन्हें सौंपा है.'

ख़ुद को अनुशासित और बहुत ही 'फ़ोकस्ड' बताने वाले नरेंद्र मोदी ने एक से ज़्यादा बार मुझे दिए साक्षात्कार में कहा कि उनमें हर वह कमज़ोरी है जो किसी भी आम व्यक्ति में होती है.

यह जुमला एक चतुर राजनीतिज्ञ का बयान भी हो सकता है. पर उनसे मुलाक़ात के दौरान मुझे एक बार भी उनका वह घमंडी स्वरूप नज़र नहीं आया और न ही उस दर्प और अहम की झलक दिखी जिसके कारण उनकी कई बार आलोचना होती है.

तो अगर वह सच में यह मानते हैं कि उनमें आम आदमी की हर दुर्बलता या कमज़ोरी मौजूद है, तो इस विनम्रता की इस कड़ी में और सार्वजनिक जीवन में एक उदाहरण पेश करने के लिए 2002 दंगों के लिए भी उन्हें कुछ पश्चाताप अवश्य करना चाहिए.

नरेंद्र मोदी अगर कभी इस दिशा में सोचेंगे तो वह आडवाणी के ही नहीं शायद अपने प्रथम आदर्श सरदार वल्लभभाई पटेल के उत्तराधिकारी बनने में भी कामयाब हों.

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