अयोध्या विवाद: अहम काग़ज़ात ग़ायब

बाबरी मस्जिद
Image caption बाबरी मस्जिद का विवादित ढाँचा ढहाए जाने से पहले

इन दिनों उत्तर प्रदेश सचिवालय में अयोध्या के राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित सात पुराने कागज़ात ढूँढने के लिए हड़कंप मचा हुआ है.

इस मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सख़्त लहजे में आदेश दिया है कि इन कागज़ों को खोजकर जल्द से जल्द अदालत के सामने पेश किया जाए.

ये कागज़ात दिसंबर 1949 में विवादित मस्जिद परिसर में श्रीराम की मूर्तियाँ रखने के तुंरत बाद राज्य सरकार और ज़िला प्रशासन के बीच हुए पत्राचार और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ओर से भेजे गए तार से संबंधित हैं.

हाईकोर्ट की विशेष पीठ ने पिछले दिनों राज्य के मुख्यसचिव अतुल गुप्त और प्रमुख गृहसचिव कुंवर फ़तेहबहादुर को इस मामले में व्यक्तिगत तौर पर तलब किया था.

नाराज़ है अदालत

अदालत ने सुनवाई में इस बात पर नाराज़गी जताई कि राज्य सरकार पिछले पांच साल से इस मसले में हीलाहवाली कर रही है.

बहस के दौरान अदालत ने कहा कि लगता है सरकार इस मामले में जल्दी फ़ैसला नहीं चाहती और मामले को लटकाए रखना चाहती है. अदालत ने कहा कि चूंकि यह प्रकरण अभी चल रहा है इसलिए संबंधित फ़ाइलें नष्ट नहीं की जा सकती हैं.

अदालत ने चेतावनी दी कि यदि ये कागज़ात पेश न किए गए तो अदालत की अवमानना के आरोप में राज्य के मुख्य सचिव और गृह सचिव के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया जा सकता है. इसमें जेल की सज़ा और प्रतिकूल टिप्पणी भी शामिल है.

अदालत के इस सख़्त रुख़ ने प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों के होश उड़ा दिए हैं.

अब प्रमुख सचिव गृह कुंवर फ़तेहबहादुर ने सभी संबंधित विभागों और अधिकारियों को दोबारा सभी पुरानी फ़ाइलें खंगालने को कहा है.

एक अधिकारी के मुताबिक़ ग़ायब कागज़ात तलाश करने में अब तक क़रीब एक हज़ार घंटे ख़र्च हो चुके हैं.

फ़ैज़ाबाद के ज़िलाधिकारी और कमिश्नर कार्यालयों में भी इन कागज़ात की तलाश की गई लेकिन उनका पता नहीं चल पाया है.

अब गृह और सामान्य प्रशासन विभाग की पुरानी गार्ड फ़ाइलें भी खंगाली जा रही हैं कि शायद उनमें कही इन मूल पत्रों और टेलीग्राम की कॉपी लगी हो.

सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने वर्ष 2002 में इन कागज़ात को सबूत के तौर पर पेश करने की पेशकश की थी. अदालत ने 2004 में राज्य सरकार को इन कागज़ात की मूलप्रति पेश करने को कहा.

कागज़ात की फ़ोटोकॉपी

उस समय सरकारी वकील ने अदालत से कहा की कागज़ात सरकार के पास हैं और पेश कर दिए जाएँगे. बाद में सरकार ने दो दस्तावेज़ों की फ़ोटोकॉपी अदालत में पेश की जो मान्य नहीं है.

Image caption उग्र हिंदू कारसेवकों ने छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया था

सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने जो कागज़ात माँगे हैं इनमें चार पत्र 20 जुलाई 1949 और तीन सितंबर 1949 को राज्य सरकार की ओर से ज़िलाधिकारी और कमिश्नर फ़ैज़ाबाद को भेजे गए थे.

दो पत्र फ़ैज़ाबाद के ज़िलाधिकारी की ओर से 26 और 27 दिसंबर 1949 को राज्य के मुख्य सचिव को भेजे गए थे.

सातवाँ कागज़ तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की ओर से राज्य सरकार को भेजा गया टेलीग्राम है.

इनमें से कुछ पहले भी अयोध्या से संबंधित मामलों में अदालत में पेश हो चुके हैं, लेकिन राज्य सरकार ने उन्हें चुनौती नहीं दी. अयोध्या विवाद से संबंधित पुस्तकों में भी इनका उल्लेख है.

इन पत्रों से यह पता चलता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने विवादित मस्जिद में 22-23 दिसंबर 1949 की रात में मूर्तियाँ रखे जाने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत से नाराज़गी जताई थी और उनसे मूर्तियाँ हटवाने के लिए कहा था.

ज़िलाधिकारी की भूमिका

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश भी दिए लेकिन उस समय के जिलाधिकारी केके नैयर ने यह कहकर मूर्तियाँ हटाने से इनकार कर दिया कि ऐसा करने से ख़ूनख़राबा हो सकता है. हालांकि उन्होंने माना था कि मूर्तियाँ ग़लत तरीक़े से रखी गई थीं.

ज़िला प्रशासन ने विवादित मस्जिद परिसर को कुर्क कर पुलिस का पहरा बैठा दिया था.

नैयर के बारे में आम धारणा थी कि वे कट्टर हिंदू थे. यह भी कहा जाता है कि मूर्तियाँ रखवाने में उनकी पत्नी शकुंतला नैयर की सक्रिय भूमिका थी.

बाद में केके नैयर और उनकी पत्नी जनसंघ में शामिल हो गए. शकुंतला नैयर 1952, 1967 और 1971 में कैसरगंज से सांसद भी चुनी गईं जबकि केके नैयर 1967 में बहराइच से सांसद चुने गए.

इस मामले में 1949 से मुक़दमा चल रहा है कि वास्तव में उस विवादित स्थान पर किसका हक़ है.

इस बीच विवादित मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को हिंदू कारसेवकों ने तोड़ दिया.

सुन्नी वक्फ़ बोर्ड अपना पक्ष मज़बूत करने के लिए इन कागज़ात को सबूत के तौर पर पेश कराना चाहता है जबकि हिंदुओं की ओर से विवादित स्थान पर दावा करने वाले निर्मोही अखाड़ा का कहना है कि ये कागज़ात साक्ष्य अधिनियम के मुताबिक़ सबूत के तौर पर पेश नहीं किए जा सकते हैं.

सरकार ने इस संबंध में जो शपथपत्र अदालत में पेश किया है उसे अदालत ने अस्पष्ट माना है .

राज्य सरकार के अनुरोध पर अदालत ने उसे कुछ हफ़्तों की मोहलत दी है. अब इस मामले में अगली सुनवाई छह जुलाई को होगी.

प्रदेश के अधिकारियों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि तब तक कागज़ात न मिले तो अदालत का रुख़ क्या होगा.