उत्तर भारत में सूखे के आसार

किसान
Image caption भारत के किसानों को कई हफ्तों से मानसून की बारिश का इंतज़ार है.

उत्तर भारत के लिए ये खबर अच्छी नहीं है क्योंकि अगर खुद मौसम वैज्ञानिकों की मानी जाए तो कई उत्तर भारतीय राज्यों में मानसून उम्मीद से भी कम रह सकता है और कम बारिश के चलते सूखा पड़ने की संभावनाएं भी बढ़ जाती है.

कुछ ही दिन पहले उत्तर भारतीय राज्यों में मानसून से पहले की बारिश हुई थी. भले ही ये बारिश ज्यादा दिनों तक नहीं हुई, पर लोगों में और खासतौर पर किसानों में खासी उम्मीद ज़रूर जता गई थी. लेकिन इसे विडम्बना ही करार दिया जायेगा की हुआ इस उम्मीद के बिलकुल विपरीत.

अभी भी उत्तर भारत के राज्यों, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश समेत राजस्थान में किसानों को मानसूनी बारिश का इंतज़ार है.

अब तो वरिष्ठ मौसम वैज्ञानिकों की बातों से भी यही लगता है की उनको सूखा पड़ने का डर सता रहा है. पुणे स्थित राष्ट्रीय मौसम केंद्र के निदेशक डॉक्टर दी एस पाई कहते हैं, " कल तक की निगरानी के हिसाब से मानसून अभी तक सामान्य का सैतीस प्रतिशत ही रहा है. और इस कमी की असल वजह यही है की जून के महीने में बारिश कम हुई है. हमने जो उम्मीद की थी उससे तो ये कम ही है". खुद मौसम वैज्ञानिक अब इस बात से इंकर नहीं कर रहे हैं कि सम्पूर्ण उत्तर भारत में बारिश सामान्य से कहीं कम हुई है और यही सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है.

हिमाचल प्रदेश में मक्के और सेब की खेती पर संकट गहरा गया है तो वहीँ उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब में धान की फसल प्रभावित हो सकती है. गौरतलब ये भी है उत्तर भारत ही देश का वो हिस्सा है जहाँ करीब पैसठ फीसदी खरीफ फसल यानी धान, तिलहन और दलहन, अच्छी पैदावार के लिए पूर्णतया बारिश पर ही निर्भर रहती हैं.

वैज्ञानिक भी चिंतित

Image caption उत्तर भारत के तकरीबन सभी राज्य पानी की कमी से परेशान हैं.

देहरादून स्थित भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के निदेशक आनंद कुमार शर्मा भी इस बात से सहमत हैं," चिंता की बात खासतौर पर उन क्षेत्रों के लिए है जिन इलाकों में सिंचाई के पर्याप्त साधन नहीं हैं. क्योंकि जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं वहां तो आप ये कह सकते हैं की बारिश की कमी पूरी हो जाएगी. पर बीच में हालत ऐसी भी थी जहाँ प्राकृतिक जलाशयों के स्तर काफी नीचे आ गए थे. और इन्ही सब चीज़ों को ध्यान में रख कर देखते हुए मुझे ऐसा लगता है की चिंता अभी भी बनी हुई है". किसानों और उनकी फसलों पर मंडरा रहे संकट के बादलों के साथ साथ मानसून में देरी हो जाने से उत्तर भारत के लगभग हर राज्य को बिजली की मार झेलनी पड़ रही है.

चाहे वो पंजाब और हरियाणा के किसान हों जो खेती के लिए पूरी तरह से बिजली पर निर्भर रहते हैं, या फिर उत्तर प्रदेश जैसा राज्य हो जो जिनके यहाँ कम बारिश के चलते बिजली उत्पादन में भारी कमी आ गई है और पडोसी प्रदेशों को भी बिजली नहीं जा पा रही है. हर तरफ मायूसी है है और हालात सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे हैं.

आखिर कब तक मंडरा सकते हैं सूखा पड़ने के डर वाले बदल संपूर्ण उत्तर भारत पर? आनंद शर्मा कहते हैं, "झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के ऊपर एक ऐसा दबाव बन रहा था जिसको देखते हुए परसों हमने पूर्वानुमान दिया था. जो पूर्वोत्तर हवाएं आती हैं उनमे नमी होने के कारण स्थिति बेहतर हो जाएगी क्योंकि वो बारिश ला सकती हैं. मगर जो दूसरे क्षेत्र हैं जैसे पंजाब, हरियाणा और मैदानी इलाकों में वहां इस तरह का हवा का दबाव नहीं बन सकता है और इसी को देखते हुए स्थिति और भी बदतर हो सकती है. " पर एक तरफ जहाँ हलके होते जा रहे मानसून ने किसानों की नींद उड़ा रखी है तो दूसरी तरफ सरकार के लिए भी ये बढती चिंता का विषय होता जा रहा है. अगर भरपूर बारिश नहीं हुई तो तो फसल पर असर पड़ने से रोज़ मर्रा इस्तेमाल होने वाले अनाज के दाम आसमान छूने लगेंगे. अपर ये तो आगे की बात है ! फिलहाल तो उत्तर भारत में हर कोई आसमान की तरफ इस आस में ही टाक लगाये है की इन्द्रदेव अब मेहरबान हुए, तब हुए !

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