नक्सलियों के ख़िलाफ़ नई सोच चाहिए

  • 13 जुलाई 2009
फ़ाइल फ़ोटो
Image caption नक्सलवाद को खत्म करने के लिए नई सोच की ज़रूरत

राजनांदगांव की घटना पर जब मुख्य मंत्री रमन सिंह ने बयान दिया कि नक्सलियों के खिलाफ अब निर्णायक लडाई का वक़्त आ गया है तो विपक्षी कांग्रेस का कहना था कि पिछले लगभग चार सालों से हर ऐसी घटना के बाद मुख्य मंत्री निर्णायक और आर पार की लडाई की बात दुहराते हैं.

इस बीच पुलिसकर्मी लगातार नक्सली हिंसा का शिकार हो रहे हैं और अब तो एक पुलिस अधीक्षक भी इस हिंसा की चपेट में आ गए हैं.

पुलिस महानिरीक्षक मुकेश गुप्ता भी इस नक्सली घेराबंदी में आ गए थे लेकिन बाल बाल बच गए.

उन्होनें बयान दिया है कि नक्सलियों से निपटने के लिए घटनास्थल पर उनके पास पर्याप्त बल की कमी थी.

दिल्ली स्थित नक्सल मामलों के जानकार पी वी रमन्ना का कहना है कि सवाल सिर्फ बल का नहीं है बल्कि रणनीति और दूरदर्शिता का है जिसकी कमी की वजह से छत्तीसगढ़ और देश के अन्य राज्यों के पुलिसकर्मी भी माओवादियों का आसान शिकार बन रहे है.

उनका कहना है कि ऐसे हमलों के समय किस तरह की प्रतिक्रिया होनी चाहिए इसके लिए पुलिस के पास एक ठोस कार्ययोजना है जिसे पुलिसकर्मी अक्सर अपनाने से चूक रहे हैं.

राजनांदगांव की घटना में सुबह-सुबह नक्सलियों ने मदंवाडा पुलिस चौकी से नित्यक्रिया के लिए जंगल को गए पांच पुलिसवालों में से दो को मार दिया.

उनका कहना है कि अधिकारियों को उसी वक्त सोचना चाहिए था की जब पाँचों के पाँचों पुलिसकर्मियों को गोलियों का शिकार बनाया जा सकता था तो दो को ही क्यों मारा गया?

बाद में अलग अलग पुलिस पार्टियां चौकी की मदद को गयीं और माओवादियों की चाल का शिकार बनी और आधिकारिक सूचना के अनुसार एक पुलिस अधीक्षक सहित २९ पुलिस वालों ने अपनी जान गंवाई.

आंध्र प्रदेश में विशेष तौर पर तैयार की गयी नक्सल विरोधी पुलिस, ग्रे-हाउंड, की नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन को हाल के मुहिमों में सबसे सफल माना जाता है.

इस दस्ते ने विद्रोहियों द्वारा बार-बार पुलिस वाहनों पर किये जाने वाले हमलों के बाद पहले मोटरसाईकिल और फिर गश्त और हमलों के लिए पैदल जाना शुरू कर दिया.

रुचिर गर्ग, जिन्होनें मध्य भारत में इस समस्या पर पैनी नज़र रखी है; का कहना है पुलिस को छापामार युद्घ करने वालों के अंदाज़ में सोचना होगा और अपनी इस मुहिम को पारंपरिक आपरेशन से अलग ढंग से चलाने की कोशिश करनी होगी.

छत्तीसगढ़ में कई ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिसमें पुलिस के जवान पैदल जाने की बजाए जीप किराये पर लेकर सफ़र करते हैं या फिर एंटीलैंडमाइन वाहन में जगह से ज्यादा लोग सवार हो जाते हैं. नक्सलियों ने उसे बारूदी सुरंग लगाकर उड़ा दिया है.

कई बार तो लाशों के पास बिछाई बारूद से पुलिस वालों को भारी क्षति पहुंची है.

अविभाजित मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़ पहले मध्य प्रदेश का ही अंग था) के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक ऐ एन सिंह राज्य में बढ़ रही नक्सली गतिविधियों और पुलिस का हिंसा के चपेट में आ जाने को नेतृत्व की कमी मानते है.

उनका कहना है, "बड़े अधिकारियों को आपरेशन के समय और उसके पहले भी जंगलों में जाकर जवानों के साथ समय बिताना होगा तभी फोर्स के भीतर नेता से जुड़े होने की भावना पैदा होगी."

वो छत्तीसगढ़ और दुसरे नक्सल प्रभावित राज्यों के पुलिस कर्मियों को जंगल में युद्घ लड़ने और गुरिल्ला पद्धति यानी छापामार युद्घ में प्रशिक्षित किये जाने की सलाह देते हैं.

उनका कहना है कि इसके लिए बेहतर होगा कि माओवादी प्रभावित इलाकों से ही कम उम्र के लड़कों को लाकर उन्हें शिक्षा और फिर पुलिस ट्रेनिंग दी जाये.

पी वी रमन्ना कहते हैं कि नक्सलियों की तेज़ हुई गतिविधि को माओवादियों की नई रणनीति के तौर पर भी देखे जाने की ज़रुरत है.

उनका कहना है, ''इसके तहत वो यह जताना चाह रहे हैं कि भारत सरकार ने भले ही हमारे संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को प्रतिबंधित कर दिया हो लेकिन हम अपनी इच्छाशक्ति से जब चाहें किसी पर, कहीं भी हमले कर सकते हैं.''

मध्य प्रदेश पुलिस के एक उच्च अधिकारी का इसी से जुड़े एक पहलू पर कहना है कि इस समस्या से लड़ने में अभी भी समन्वय की कमी है और सब राज्य अपनी लडाई अलग लड़ रहे हैं.

भोपाल में नक्सलियों की एक हथियार बनाने वाली एक फैक्ट्री के मामले का उदाहरण देते हुए उन्होनें कहा कि जब गुजरात प्रशासन को इसकी खबर दी गयी कि हथियार बनाने वाले मशीन की सप्लाई सूरत और आसपास के इलाके से हुई है तो उन्होंने ये कहकर आगे की कारर्वाई करने से इंकार कर दिया कि उनके यहां नक्सलवाद की समस्या नहीं है.

यह तो सभी मानते हैं कि नक्सलवाद जैसी समस्या का हल पुलिस कार्रवाई नहीं बल्कि एक सामाजिक और राजनितिक प्रक्रिया से ही संभव है.

लेकिन छत्तीसगढ़ के हालात कुछ ऐसे हैं कि कल जब वहां हमला हुआ तो राज्य के गृह मंत्री ने बयान दिया के उन्हें इस मामले की ज़्यादा जानकारी नहीं है.

बल्कि उन्होंने यहां तक कहा, ''जब क्षेत्र में नक्सली इस घटना की योजना बना रहे होंगे तब पुलिस महानिदेशक साहित्य सम्मलेन में व्यस्त थे.''

उनके इस बयान से हंगामा तो ख़ासा मचा है लेकिन गृह मंत्री और पुलिस महानिदेशक के बीच की ये दूरी काफ़ी कुछ कह जाती है.

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