संयुक्त बयान की परछाइयां

मनमोहन गिलानी मुलाक़ात

मुंबई हमलो के बाद भारत पाकिस्तान के बीच तल्खी ऐसी बढ़ी थी की लोगों को कारगिल की याद आ गई थी.

वो दनदनाती तोपें, वो मरने-मारने की बातें.... माहौल ग़दर फ़िल्म के डायलॉगों पर वाहवाही लूटने का था और वीरज़ारा की बातें करने का मन किसी का नहीं था.

मनमोहन सरकार ने भी सीना चौड़ा कर कहा कि मुंबई के मुल्ज़िमों को पाकिस्तान पकड़े, नहीं तो भूल जाए किसी तरह की बातचीत के बारे में. फिर रोज़ शुरू हुई बयानों की झडी.

बात तो दूर दोनों देशों के नेता अगर साथ भी दिख जाएं तो ये ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती. भारत ने दस्तावेज़ सौंपे, पत्र लिखे, कई देशों का समर्थन जुटाने के लिए मनमोहन सरकार ने कूटनीति का इस्तेमाल किया. सबकुछ पाकिस्तान के ख़िलाफ़ या यूं कहें कि पाकिस्तान स्थित उन ताकतों के खिलाफ़ जिनपर भारत में आतंकवाद फैलाने का आरोप था.

भारत की विदेश नीति की भूरि भूरि प्रशंसा भी हुई, भारत को समर्थन भी मिला, फिर कुछ समय बाद अमरीका को इस बात की चिंता सताने लगी कि अगर भारत से पाकिस्तान जूझता रहेगा तो अफ़गा़न सीमा पर क्या होगा.... और फिर शुरू हुई बात, बात करने के लिए दबाव की.

बात ज़रुरी है...बातों से बातें बनती है, ग़िले शिकवे दूर होते हैं. बात में दम होता है, जो बाज़ुओं के दम से ज़्यादा असरदार होता है पर बात दोनों देशों को तभी क्यों समझ आई जब कि अमरीका की विदेश मंत्री के भारत आगमन का समय नज़दीक आ गया.

खैर, भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री न केवल मिस्र में मिले, उन्होंने एक साझा वक्तव्य भी जारी किया कि बातचीत सौहार्द्रपूर्ण हुई. रज़ामंदी हुई कि आतंकवाद दोनों देशों के सामने बड़ी समस्या है.

पर मुद्दे की सबसे बड़ी बात ये थी कि आतंकवाद को समग्र वार्ता प्रक्रिया से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. बात तो पते की है.. अक़्ल तो यही कहती है कि आतंकवादी घटना हो भी जाए तो इसकी पहले जांच हो और फिर पड़ोसी देश पर उंगली उठाई जाए.... पर राजनीति में सोच जनता से भी बनती है, पब्लिक सेंटीमेंट भी कोई चीज़ है.. वोट तो वहीं से आते हैं. इसलिए ग़दर टाइप बातें करनी पड़ती है.

जब चुनाव जीत चुके हों और अमरीका का आदेश या गुहार हो की निपटाओ आपसी झगड़े, तो कुछ करना भी ज़रूरी है इसीलिए कश्मीर मुद्दे पर न पाकिस्तान की सांस अटके और न आतंकवाद पर भारत अपने भौंहें सिकोड़े, ऐसे फार्मूले को तैयार किया गया.

अब सोचिए इसका एक फायदा अमरीका को भी है. एलओसी की चिंता अगर पाकिस्तान को न हो तो अफ़ग़ानिस्तान में वो अमरीका की दिल से मदद कर सकता है. फिर पाकिस्तान भी कहां कहां ध्यान दे... स्वात में मामला गरम है तो भारत की नरमी सुहानी लगती है.

वहीं भारत को भी बलूचिस्तान में हिंसा की याद दिला पाकिस्तान ने कुछ अपनी भड़ास भी निकाली.... यानी कहा जा सकता है की शर्म अल शेख में दोनों नेता अब अपने अपने अवाम को कह सकते हैं.....देखिए बातचीत शुरू हो गई और मेरी बात रह गई.

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