'रिश्तों में कोई फ़र्क नहीं आया है'

करगिल युद्ध के 10 साल बीत जाने के बाद अगर भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों की बात की जाए तो मुझे लगता है कि कोई बहुत फ़र्क नहीं पड़ा है.

Image caption करगिल युद्ध को 10 साल पूरे हो गए हैं

हाँ, कोई लड़ाई जैसी स्थिति तो नहीं आई लेकिन संबंध सामान्य नहीं हैं. भारत की ओर से कहा जाता रहा है कि पाकिस्तान अपने यहाँ चल रहे आतंकवाद के ढांचे को नष्ट करे और पाकिस्तान की ओर से ऐसा करने के आश्वासन भी बार- बार मिलते रहे हैं लेकिन वास्तव में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है.

ज़ाहिर है पाकिस्तान के ऐसे व्यवहार से भारत को निराशा हुई है. और अभी तो भारत में बहुत गर्मागर्मी इस बात को लेकर है कि शर्म अल शेख़ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संयुक्त बयान में जो सहमति दिखाई है कि आतंकवाद को बातचीत की प्रक्रिया से अलग कर दिया जाए तो इसे लेकर उनकी काफी आलोचना हो रही है.

उनके ऊपर आरोप लग रहा है कि उन्होंने पाकिस्तान के आगे समर्पण कर दिया. पाकिस्तान में तो ये ख़बर आम है कि इस संयुक्त वक्तव्य में कश्मीर का कोई ज़िक्र नहीं है.

संवेदनशीलता

दरअसल दोनों देशों में इतनी संवेदनशीलता है कि इसे देखते हुए तो यही लग रहा है कि संबंधों में उठापटक का दौर फ़िलहाल ऐसे ही चलता रहेगा.

इन 10 वर्षों में पाकिस्तान की राजनीति में आए बदलाव का मुख्य असर ये रहा कि पहले वो आतंकवाद को दो खाके में देखते थे. एक वो जिन्हें पाकिस्तान ख़ुद भी आतंकवादी मानता था और जिससे वो ख़ुद प्रभावित था और दूसरे वो जिन्हें पाकिस्तान सरकार फ्रीडम फाइटर कहती थी यानी उसकी नज़र में अच्छा और ख़राब दो तरह का आतंकवाद था.

पिछले कुछ दिनों में पाकिस्तान में भी आतंकवाद इतना बढ़ गया है कि उन्हें लगता है कि अब ये पाकिस्तान को ही अस्थिर कर रहा है तो अब वो इसके प्रति थोड़े गंभीर ज़रूर दिख रहे हैं.

बावजूद इसके लगातार पाकिस्तान या पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की ओर से कश्मीर में जो अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की जा रही है और जिस तरह से लश्कर जैसे संगठनों के ख़िलाफ़ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है उससे आतंकवाद से लड़ने में पाकिस्तान की गंभीरता पर संदेह पैदा होता है.

जहाँ तक करगिल युद्ध से सबक लेने का सवाल है तो मेरे ख़्याल से पाकिस्तान को अब ये मालूम पड़ गया है कि कश्मीर समस्या का हल युद्ध के ज़रिए नहीं बल्कि बातचीत और राजनीतिक प्रक्रिया के ज़रिए ही सुलझाया जा सकता है.

पहले ऐसा नहीं था. पहले उसे लगता था कि लड़ाई या करगिल जैसी घुसपैठ से कश्मीर को हासिल किया जा सकता है. पाकिस्तान की राजनीतिक सोच में ये एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है इन 10 सालों में.

(समीरात्मज मिश्र के साथ बातचीत पर आधारित)

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