घुसपैठियों को बंकर बनाते देखा..

  • 26 जुलाई 2009
Image caption करगिल की लड़ाई में पाँच सौ से ज़्यादा भारतीय सैनिक मारे गए

दो मई (1999) की बात है. मैंने सुबह-सुबह अपने याक को घर के बाहर चारा खाने के लिए खुला छोड़ दिया था. दोपहर में मन हुआ कि देखें याक कहां है. वह नहीं दिखा.

मेरा गाँव (गरकौन) सीमा से एक किलोमीटर पर ही है लेकिन कभी मैंने उस पार पाकिस्तानी सेना को नहीं देखा तो मुझे डर नहीं था और मैं याक की खोज में आगे बढ़ा.

आगे बढ़ने पर मुझे बर्फ़ में पैरों के निशान दिखाई दिए. इसे देख कर लगा कि कुछ लोग ऊपर की ओर गए होंगे. मैंने सोचा हो सकता है कि गांव के कुछ लोग किसी काम से गए होंगे.

(ताषी नामग्याल करगिल में गरकौन गाँव के रहने वाले हैं जो भारत-पाकिस्तान सीमा से बिल्कुल सटा हुआ है. उन्होंने ही सबसे पहले घुसपैठियों को बंकर बनाते देखा था और इसकी सूचना सेना को दी थी जिसके बाद लड़ाई शुरु हुई. उनसे बातचीत की बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार ने.)

मेरे मन तो याक की ही ख़याल था. संयोग ही कहिए कि मैं पैरों की निशान वाले रास्ते पर ही याक ढूंढ़ने आगे बढ़ा. कुछ दूर चलने पर मुझे कुछ आवाज़े सुनाई दी.

ये आवाज़ हथौड़ा चलाने जैसा था. जब मैंने आँखें ऊपर की और पहाड़ी की ओर देखा तो मेरे होश उड़ गए.

मैंने छह लोगों को देखा. वे बंकर बना रहे थे. उनकी हरकतों को देख कर मुझे अचरज हुआ. वे मेरे गाँव के लोग नहीं थे, ये तो तय था क्योंकि उनके हाथों में हथियार भी थे.

सेना को दी सूचना

मुझे डर लगा और मैं याक को भूल कर नीचे वापस अपने घर आया. होश संभाला और बीस किलोमीटर दूर सेना के कैंप की ओर चल पड़ा.

वहां पहुँचा तो हवलदार बलविंदर सिंह से मुलाक़ात हुई. मैंने उन्हें पूरा किस्सा सुनाया. वे चौंक पड़े और कहा, तुम मेरे साथ चलो और वो जगह दिखाओ.

मैं उन्हें लेकर उस पहाड़ी के नीचे उस जगह पर पहुँचा जहां से वे लोग दिखाई दे रहे थे. मैं समझ सकता था कि हवलदार बलविंदर सिंह की हालत क्या हुई.

वो वापस आ गए. मेरे घर पर रुके और अपने कैंप की ओर चल दिए लेकिन जाने से पहले उन्होंने कहा कि मुझे तीन मई को कैंप में आना है.

मैं अगले दिन सुबह-सुबह फिर सेना के कैंप में पहुँचा. हवलदार बलविंदर सिंह ने इस बीच सेना के बड़े अधिकारियों को इसकी जानकारी दे दी थी.

जेसीओ साहब और एक मेजर साहब ने मुझे पूरी कहानी फिर से कहने को कहा. मैंने विस्तार से सब बताया. वे पूछ रहे थे कि इस तरह के लोग कब से दिखाई दे रहे थे. मैंने उन्हें बताया कि एक महीने पहले उधर गया था तो ऐसा कुछ भी नहीं था.

ओर गोले बरसने लगे..

फिर फौज के 25-30 जवानों के साथ मैं फिर उसी पहाड़ी के नीचे पहुँचा. सेना के लोगों ने दूरबीन से उस तरफ़ देखा पर कुछ भी नहीं किया. जेसीओ साहब ने मुझसे कहा, "ताषी जो मुझे लग रहा है, अगर वही मामला है तो तुम्हें अंदाज़ नहीं है कि क्या होने वाला है. तुमने इस देश की बड़ी सेवा की है."

Image caption करगिल का ये इलाक़ा अब शांत है

ये तो मैं सुनता रहता था कि सीमा के पार से आतंकवादी घुसते हैं लेकिन इतनी ठंड में इस रास्ते से वे कैसे आए होंगे, ये सोच कर मुझे भी हैरानी हो रही थी.

पर जब कुछ दिनों के बाद ही तोपों के गोले गरजने लगे और लड़ाई शुरु हो गई तब मुझे लगा कि मैंने जो देखा था वो कोई साधारण घटना नहीं थी.

करगिल की लड़ाई के बाद मुझे कई मौकों पर सेना वालों ने बुलाया और सम्मानित किया. कल ही (शुक्रवार) को मुझे वे लोग द्रास लेकर आए जहां लड़ाई के दस साल पूरे होने पर बड़ा आयोजन किया गया.

लेकिन सरकार से मेरी कुछ माँग है जो इन दस वर्षों में पूरी नहीं हुई. मेरे गाँव में न बिजली है, टेलीफ़ोन और न मोबाइल सुविधा. कोई रास्ता भी नहीं. गांव के लोग बीमार पड़ जाएँ तो डॉक्टर के पास ले जाने के लिए कंधे का सहारा देना पड़ता है.

सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए.

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