सूखाग्रस्त ज़मीन पर राजनीति की खेती

किसान

सावन का महीना अपने आखिरी दौर में है मगर देश के एक बड़े भूभाग में मानसून फ़ेल होने से ताल-तलैया नहीं भरे और नदियों में भी बहुत कम पानी है.

बारिश की कमी से उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, नागालैंड, तमिलनाडु और कर्नाटक के अधिकाँश इलाकों में खेती पर संकट पैदा हो गया है.

राज्य सरकारें अपने स्तर से प्रभावित जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर केंद्र से वित्तीय सहायता की मांग कर रही हैं. मगर जमीन पर किसान को ज़रूरी सहायता नहीं मिल रही है और वे इंद्र देवता को मनाने के लिए तरह तरह की प्रार्थनाएं या टोटके कर रहे हैं ताकि फसल न सूखे और खेत खाली न रहें.

केन्द्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने भरोसा दिलाया है कि, ''सूखे जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं, लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है. हमारे पास आपदा राहत के उपाय हैं.''

उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार ने अब तक राज्य की कुल 47 यानी दो तिहाई क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है.

राज्य के राहत आयुक्त एसएन शुक्ल का कहना है कि बारिश में कमी और खेती को हुए नुकसान के बारे में अन्य जिलों से भी सूचनाएं आ रही हैं. एसएन शुक्ल ने बताया कि आगे चलकर और भी जिले सूखाग्रस्त घोषित हो सकते हैं.

सूखा केवल किसान और उपभोक्ता का मुद्दा और चिंता भर नहीं है. चिंता सरकार को है. विपक्ष को है. राजनीति की फसल सूखे में अंकुरित होने लगी है.

सूखे पर भी राजनीति

राज्य में विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया है कि ज़िलों को सूखाग्रस्त घोषित करने में राजनीति हो रही है, जिसके चलते इटावा को सूखाग्रस्त नहीं किया गया. इसी तरह और भी कई ज़िले छुट गए हैं जबकि वहाँ बारिश कम हुई है.

अधिकारियों का कहना है कि सूखा घोषित करने के लिए बारिश में कमी के अलावा यह भी देखा जाता है कि फसल को कितना नुकसान हुआ इसीलिए जहाँ किसानों ने नहरों या नलकूपों से सिंचाई करके फसल बो ली है, वहाँ अभी सूखा घोषित नहीं किया गया पर कई लोग सरकारी आंकड़ों को भी संदिग्ध मानते हैं.

किसानों की नज़र में तो मौसम वैज्ञानिक भी कम दोषी नहीं हैं क्योंकि बरसात का सही पूर्वानुमान न बताने से बड़ी तादाद में किसान खेतों में बीज डालकर अपनी पूँजी और बीज भी फंसा देते हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार ने जिन 47 ज़िलों में अभी तक सूखा घोषित किया है, वहाँ मुख्य रूप से सरकारी कर्जों की वसूली स्थगित हुई है. सरकार ने यह भी निर्देश दिया है कि बैंक ऋणों और दूसरे कर्जों की वसूली में सख्ती न की जाए.

सरकार ने नहरों में पानी और 10 घंटे बिजली देने की बात कही है. यह भी कहा गया है कि ग़रीबों को सस्ता गल्ला उपलब्ध कराया जाएगा और पीने के पानी के लिए हैण्डपम्प लगाए जाएंगे.

मुख्यमंत्री मायावती ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उनसे बुंदेलखंड और पूर्वांचल के लिए विशेष आर्थिक सहायता मांगी है.

केंद्र बनाम राज्य

राज्य में विपक्षी कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि मुख्यमंत्री मायावती नींद से तब जागी हैं जब कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी के नेतृत्व में इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से मिलकर ज्ञापन देने का ऐलान किया.

कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश के प्रभारी दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया कि मायावती सरकार सूखे पर राजनीति कर रही हैं. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को राजनीतिक बयानबाज़ी के बजाय ठोस काम करना चाहिए.

लेकिन मायावती पर दिग्विजय सिंह से भी ज़्यादा चोट केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने की है.

पवार ने कहा कि भीषण सूखे के बावजूद राज्य सरकार कान बंद किए बैठी है. कृषि मंत्री के अनुसार राज्य सरकार ने सूखे के संबन्ध में केंद्र को कोई सूचना नहीं भेजी और राज्य की मुखिया से संपर्क करना असंभव है.

शरद पवार ने मायावती की दुखती रग पर हाथ रख दिया है, चूँकि यह हकीकत है कि मायावती न तो जनता से मिलती हैं, न ही जन प्रतिनिधियों से. ऐसे में वह हकीक़त से दूर रहती हैं. उनके अधिकारी भी कहते हैं कि हर समस्या के लिए केंद्र को पत्र लिखना हास्यास्पद है.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने बीबीसी को बताया कि उनके अंदाज़े के मुताबिक 57-58 ज़िले सूखाग्रस्त हो चुके है क्योंकि उन इलाकों में 50 फीसदी से भी कम बारिश हुई है लेकिन सबसे दुखद बात ये है कि अभी तक मुख्यमंत्री का कहीं भी दौरा नहीं हुआ है और उन्होंने सूखे की बात तब की है जब कृषि मंत्री शरद पवार ने संसद में कहा कि सभी राज्यों ने अपनी मांगें भेज दी हैं लेकिन उत्तर प्रदेश से अभी तक कोई मांग नहीं आई है.

रोज़गार का विकल्प

उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (ग्राम्य विकास) रोहित नंदन ने एक बातचीत में कहा कि सूखे की स्थिति में सबसे बड़ी ज़रूरत ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार उपलब्ध कराने की है. इसे देखते हुए निर्देश दिए गए हैं कि इस साल डेढ़ गुना लोगों को रोज़गार गारंटी योजना के तहत काम उपलब्ध कराया जाएगा.

पिछले साल 7400 करोड़ रुपयों से 43 लाख परिवारों को रोज़गार गारंटी क़ानून के तहत रोज़गार मिला था. इस साल 12 हज़ार करोड़ रुपयों से लगभग 65 लाख लोगों को रोज़गार देने का लक्ष्य है.

रोहित नंदन के अनुसार नरेगा में मुख्य रूप से जल संरक्षण की योजनाएं चलाई जाएंगी. क़रीब एक लाख किसानों के खेतों में निजी तालाब भी खोदे जाएंगे.

पर राज्य सरकार की इस घोषणा से अलग केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री प्रदीप जैन ने बाराबंकी ज़िले का दौरा करने की बाद आरोप लगाया कि राज्य सरकार का काम संतोषजनक नही है. उन्होंने कहा कि अभी तक नरेगा का सामाजिक अंकेक्षण होता था लेकिन अब इस योजना का तकनीकी अंकेक्षण भी कराया जाएगा.

राज्य विधान सभा का मानसून सत्र 31 जुलाई से शुरू हो रहा है. भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी तीनों इस मुद्दे पर राज्य सरकार को घेरने कि योजना बना रहे हैं. विपक्षी दल पूरे प्रदेश को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग कर रहे हैं.

विधान सभा में विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव इस मुद्दे पर सभी विपक्षी दलों की बैठक बुला रहे हैं. उनका आरोप है कि न तो नहरें ठीक से चल रही हैं और न ही किसानों को बिजली मिल रही है. उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री केवल पत्थर के काम में व्यस्त हैं.

उनका यह भी आरोप है कि सरकार ने बड़े पैमाने पर पेड़ कटवाकर पर्यावरण असंतुलन पैदा किया है जिसका असर बारिश पर पड़ा है. विपक्ष के तेवर से साफ़ है कि अगला विधान सभा सत्र हंगामेदार होगा.

अहम सवालों पर ग्रहण

लेकिन इस हंगामे में मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं.

पहला सवाल यह है कि भारत का मौसम विभाग अभी तक इतना सक्षम क्यों नहीं बनाया गया कि वह बरसात का सही पूर्वानुमान किसानों को बता सके ताकि कम से कम वह अपना बीज और श्रम बचा सकें और उसका उपयोग सही समय पर करें.

दूसरा सवाल यह है कि सरकार फसल न बो पाने या क्षतिग्रस्त होने का इंतज़ार क्यों कराती है. यानी पहले से सिंचाई के लिए नहर, बिजली या डीजल आदि का इंतज़ाम क्यों नहीं करती.

सूखे की स्थिति में भी ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादक कार्यों के लिए बिजली या डीजल की सप्लाई प्राथमिकता के आधार पर क्यों नहीं की जाती.

सूखे की स्थिति में रोज़गार क़ानून एक वरदान है लेकिन उसे ठीक से चलवाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में ज़रूरी स्टाफ़ नहीं है. इसके अलावा नरेगा में एक परिवार के केवल एक व्यक्ति को साल में अधिकतम 100 दिन काम मिल सकता है, जबकि सूखे के दौरान खेती में काम न मिलने से ज़्यादा लोगों को और ज़्यादा दिन काम देने की ज़रूरत है वरना ग़रीब लोग दुकानों में अनाज भरा होने पर भी खरीद नही पाएंगे.

अभी तो लोगों के पास रबी का अनाज है लेकिन खरीफ बर्बाद होने से जाड़े के दिनों में खाद्यान्न का संकट हो जाता है.

सूखे की स्थिति में शारीरिक दृष्टि से सक्षम लोग, विशेषकर पुरुष रोज़गार के लिए शहरों को पलायन कर जाते हैं और बूढे, बीमार या कमजोर लोग गाँवों में रह जाते हैं. इनके लिए भरण पोषण एक बड़ा मुद्दा होता है. कई बार यही लोग कुपोषण या भुखमरी का शिकार होते हैं.

केंद्र सरकार के आपदा राहत नियमों में इस बात की व्यवस्था है कि आधी से अधिक फसल नष्ट होने पर ही राहत मिलती है, लेकिन जो लोग फसल बो ही नही पाते वह राहत के हकदार नहीं.

उत्तर प्रदश के राहत आयुक्त एसएन शुक्ल का कहना है कि नियमों में बदलाव का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है और इस पर कार्यवाही केंद्र को ही करनी है.

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