संसद में उछला जाति पंचायत का मुद्दा

  • 28 जुलाई 2009
भारतीय संसद

भारत के कई राज्यों में ऐसी कई जाति पंचायतें अस्तित्व में हैं जिनकी कोई क़ानूनी वैधता नहीं है मगर जिनके फ़रमानों को नज़रअंदाज़ करने वालों के ख़िलाफ़ जाति, गांव से बेदखल करने से लेकर हत्या तक के फ़ैसले सुनाए जाते हैं. सैंकड़ों लोग इसका शिकार होते हैं.

हाल में हरियाणा के एक गांव में एक ही गोत्र में शादी करने के मुद्दे पर एक युवा की हत्या ने मामले को फिर संसद में पहुंचाया.

राज्यसभा में इस मुद्दे पर बहस में परिवार की इज़्ज़त के नाम पर की जानी वाली हत्या के लिए विशेष क़ानून बनाए जाने की मांग के साथ अन्य सुझाव भी आए.

परिवार की इज्जत के नाम पर होने वाली हत्याएं और दूसरे अत्याचारों के मामले सिर्फ़ हरियाणा पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार ही नहीं बल्कि देश के कई राज्यों में सामने आते रहे हैं.

राज्यसभा में एक ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर बहस में यह बात लगभग सभी सांसदों ने कही.

चिंता की बात यह है कि क़ानून का यह खुलेआम उल्लंघन सिर्फ़ किसी एक धर्म की जाति पंचायतें नहीं करतीं. सुप्रीम कोर्ट सरकार से यह सवाल भी पूछ चूकी है कि समानांतर न्याय की दुकान चलाने वाली इन जाति पंचायतों की वैधता क्या है.

ऐसे दर्जनों मामले हैं जहां जाति पंचायतों की शह पर, अपने परिवार की इज्ज़त के नाम पर लोगों ने उनकी ह्त्याएं की हैं जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से शादी की या बिरादरी की कथित नैतिक सीमाओं को लांघा.

कुछ मामलों में शादियां रद्द करने के फ़ैसले सुनाए गए और एक मामले में एक ऐसी महिला जिसका उसके ससुर ने बलात्कार किया, उसे अपने ही पति की मां करार दे दिया.

राज्यसभा की बहस में बोलने वाले सभी वक्ताओं ने इस पर अंकुश लगाने के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम करने की बात की, और इज्ज़त के नाम पर होने वाली हत्याओं के लिए ठीक उसी तरह एक अलग क़ानून बनाने का सुझाव दिया जैसा सती प्रचलन को रोकने के लिए लाया गया था.

भारतीय मार्क्सवादी पार्टी की सांसद वृंदा कराट ने कहा कि समस्या यह है कि इज़्ज़त के नाम पर होने वाली हत्याओं को क़ानून में परिभाषित ही नहीं किया गया है. सरकार इससे निपटने के लिए अलग से ऐसा का़नून नहीं लाना चाहती जैसा सती प्रचलन को रोकने के लिए लाया गया था.

वृंदा कराट का कहना था कि जाति पंचायतें जातिगत राजनीति का ही परिणाम हैं. वहीं समाजवादी पार्टी के सांसद रामगोपाल यादव ने कहा कि यह जाति पंचायतें देश को आदिम काल में ले जाने की कोशिश हैं और इनके आदेश पर चलने वालों को ही नहीं बल्कि इनमें शामिल होने वालों को भी अपराध का अभियुक्त बनाया जाना चाहिए.

रामगोपाल यादव ने गृहमंत्री से पूछा कि क्या जाति पंचायतों के भय से मुक्त करने के लिए वो ऐसा कानून लाएंगे.

कई तरह के सुझाव

कुछ सांसदों ने विवाह संबंधी विशेष कानून में संशोधन करके अंतरजातीय विवाह को और आसान बनाने के सुझाव दिए. भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ सांसद नजमा हेपतुल्ला का कहना था कि सिर्फ़ का़नून से ही यह मसला नहीं सुलझेगा बल्कि जाति पंचायतों का शिकार होने वाले लोगों के लिए शिकायतों की जगह बनाना, उनकी सहायता करना भी सरकार की ज़िम्मेदारी है.

Image caption भारत में जाति पंचायतों का प्रभुत्व देखने को मिलता रहा है

उनका कहना था कि सूचना प्रसारण मंत्रालय लोगों को जागरूक करके यह बता सकता है कि अगर जाति पंचायतें उनका उत्पीड़न करती हैं तो वो कहां जाए, कहां से सहायता पाएं.

गृहमंत्री पी चिदंबरम ने अंत में इन सुझावों पर बोलते हुए कहा कि वो नहीं समझते कि भारतीय न्याय प्रणाली में अभियुक्त पर शुरू से ही अपने आप को निरपराध करने का भार होता है लेकिन किसी स्तर पर यह परिवर्तन जरूरी है.

उन्होंने कहा वो सबूतों संबंधी का़नून और विवाह संबंधी विशेष का़नून में संशोधन पर भी सोचेंगे लेकिन यह समस्या तभी रूकेगी जब अपराधियों को ऐसी सज़ा मिले जो औरों के लिए सबक बने.

पी चिदंबरम ने कहा, 'मैं राज्य सरकारों से कहूंगा कि जाति पंचायतों से जु़ड़े आपराधिक मामलों को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया जाए ताकि फ़ैसले जल्दी आएँ और अपराधियों को ऐसी कड़ी सज़ा मिले जो औरों के लिए सबक साबित हो.'

मगर उन्होंने यह दलील भी दी कि समस्या का सबसे स्थाई समाधान शिक्षा के प्रसार और शहरीकरण से होगा. अब विडंबना की बात यह है कि हाल के कुछ दिनों में जाति पंचायतों से जु़डे मामले हरियाणा जैसे उन्नत राज्य के भी उन इलाकों में हुए हैं जो दिल्ली से महज सौ किलोमीटर के दायरे में हैं.

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