धुल गए दावे- दिल्ली

  • 29 जुलाई 2009
बारिश

चार्टर्ड एकाउंटेंट कंपनी में काम करने वाले अरविंद श्रीवास्तव को सोमवार के दिन दिल्ली में मुसलाधार बारिश के बाद पश्चिमी दिल्ली के अपने दफ्तर से घर पहुँचने में तीन घंटे लग गए थे.

वहां पहुँचने पर उन्हें पाया कि उनके घर में पानी घुस गया है और आसपास की कई इमारतें धंस गई हैं.

दिल्ली में हुई बारिश का प्रकोप झेलने वाले अरविंद श्रीवास्तव अकेले व्यक्ति नहीं थे.

गलियों और सड़कों पर कमर तक जमा हो गए पानी ने मोटर साइकिलों, ऑटो रिक्शा, मोटरकारों और यहाँ तक कि बसों को डुबो दिया.

कई पुलिया डूब गईं, सड़कें धंसीं और चारों तरफ से पानी से घिर गईं पूरानी इमारतों ने दम तोड़ दिया.

हर साल की तरह इस साल भी दिल्ली सरकार ने दावा किया था कि मानसून के पहले पानी के निकासी के रास्तों की सफाई करवाई गई है और इस बार सड़कों और कालोनियों में पानी जमा नहीं होगा.

मगर पिछले दो दिनों के दौरान शासन के भीतर आने वाली दो एजेंसियों ने इस मामले में अपना ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ा है.

कॉमनवेल्थ से पहले

यह सब हो रहा है उस शहर में जहाँ अगले साल कामन वेल्थ खेलों का आयोजन होना है.

हालात कुछ ऐसे बने हैं कि एक समाचार पत्र ने दिल्ली को 'आर्फ़न सिटी' यानी अनाथ शहर क़रार दे दिया जिसकी ज़िम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं.

सोमवार को पैदा हुई स्थिति के बारे में शहरी योजना विशेषज्ञ वीके धर कहते हैं कि इसके लिए आपदा प्रबंधन प्रणाली में यह व्यवस्था करनी होगी कि उनके लोग ऐसे समय पर आकर पूरा निजाम अपने हाथों में लें, लोगों की मदद करें.

वो कहते हैं की शहरों के लिए प्लानिंग भविष्य को ध्यान में रखते हुए न करके आकस्मिक ज़रूरतों के आधार पर की जा रही है. जब तक वह योजना कारगर होती है तबतक आबादी और ज़रुरत कई गुना बढ़ चुकी होती है.

ज़ाहिर है दिल्ली की 60 साल पुरानी पानी निकासी की व्यवस्था आज के अधिभार को नहीं झेल पा रही है. इसे सुधारने की ज़रूरत है. और लोगों को सुधार होने का इंतज़ार...

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