राजमाता गायत्री देवी का निधन

  • 29 जुलाई 2009
गायत्री देवी
Image caption गायत्री देवी कूच बिहार की राजकुमारी थी जिनका ब्याह जयपुर राजघराने में हुआ.

शाही शानोशौकत की जीवंत प्रतीक रही जयपुर की पूर्व राजमाता गायत्री देवी का निधन हो गया.वे 90 वर्ष की थी. भारतीय संसद की सदस्य रही गायत्री देवी ने बुधवार को जयपुर के एक निजी अस्पताल में आखिरी साँस ली.वो पिछले कई दिनों से बीमार थी. उनके निधन की खबर से पूर्व राजघरानों और आम लोगो में दुःख का माहौल है.

कूच बिहार के पूर्व राजवंश की राजकुमारी गायत्री देवी ने जयपुर रियासत के आखिरी राजा मान सिंह से विवाह किया और वो तत्कालीन राजा मान सिंह की तीसरी महारानी के रूप में जयपुर आई और फिर यहीं की होकर रह गई.उनके इकलौते पुत्र जगत सिंह का पहले ही निधन हो चुका था. जगत सिंह ने थाईलैंड की एक राजकुमारी से विवाह किया था.

गायत्री देवी का पार्थिव शारीर जनानी ड्योढी में रखा गया है.पूर्व राजमाता के देहावसान की खबर सुनकर शोकाकुल लोगो का वहां पहुंचना शुरु हो गया है.गायत्री देवी को दुनिया भर में जाना जाता था और कई बार यूरोपीय देशो के राजघरानों के लोग भी उनसे मिलने आते थे.

सामाजिक कार्य

राजस्थान की पर्यटन मंत्री बीना काक ने दुख के साथ कहा, ''ये एक युग का अवसान है.गायत्री देवी राजस्थान की एक तरह से प्रतीक बन गई थी.उन्होंने खेल, महिलाओं की शिक्षा और पर्यटन के लिए बहुत काम किया था.हमारे लिए ये बहुत दुःख घडी है.''

वो जयपुर रियासत में इतनी लोकप्रिय थी की 1962 में लोक सभा का चुनाव लड़ा और रिकॉर्ड वोटो से अपनी जीत दर्ज कराई.

Image caption गायत्री देवी को अपने बेबाक विचारों के लिए आपातकाल के दौरान जेल भी भेजा गया.

गिनीज़ बुक ने भी उनकी जीत को शान से दर्ज किया था.गायत्री देवी ने ज़िन्दगी में बहुत उतार चढाव देखे. उन्होंने शाही दौर देखा, फिर आज़ाद भारत को देखा और एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें अपने विचारों की खातिर आपातकाल में जेल भेज दिया गया.

गायत्री देवी ने अपने पति मान सिंह के निधन पर बिछोह का दर्द देखा और फिर बेटे के मौत ने भी उन्हें बहुत दुखी किया.मगर गवात्री देवी ने सार्वजानिक जीवन से कभी किनारा नहीं किया.

पिछले साल जब कुछ लोगों ने गायत्री देवी के समक्ष उन्हें जमीन से बेदखल करने का दर्द बयां किया तो वे उनके साथ धरने पर बैठ गई. गायत्री देवी को राजस्थान में पहला पब्लिक स्कूल शुरु करने का श्रेय दिया जाता है. उन्होंने औरत को परदे से बाहर निकलने का रास्ता दिखाया और खुद मर्दों के बीच टेनिस खेलने भी निकली.

ये वो दौर था जब औरत या तो किसी तस्वीर की लकीरों में कैद थी या परदे में बंद थी. मगर गायत्री देवी ने औरत के खुलेपन की राह हमवार की. वो अपने पति की तरह पोलो खेल को बहुत पसंद करती थी और जयपुर को पोलो के ज़रिये दुनिया भर में एक पहचान दी. उन्हें घुड़सवारी करते भी देखा जा सकता था.

उनके निधन पर लोगो का यही कहना था कि शाही युग और आधुनिक भारत को जोड़ने वाला एक अध्याय पूरा हो गया है. उनके निवास लीलिपूल महल ने कूच बिहार की राजकुमारी से महारानी और फिर राजमाता तक का सफ़र अपनी यादों में सहेज रखा है लेकिन लीलिपूल ने अब जैसे गम की चादर ओढ़ ली हो क्योंकि वो शख्सियत जो इस महल को अपनी मौज़ूदगी से रोशन करती थी,वो एक ऐसे सफ़र पर चली गई,जहाँ से कोई भी वापस लौट कर नहीं आता.