रुक गया वक़्त घंटाघर के लिए

  • 30 जुलाई 2009
घंटाघर
Image caption इस घंटाघर की घड़ी के कलपुर्जे चोरी हो चुके हैं और नए कलपुर्जे मिल नहीं रहे हैं.

वक़्त कभी नहीं रुकता लेकिन लखनऊ के हुसैनाबाद के घड़ी मीनार (क्लॉक टावर) के लिए मानो वक़्त 1970 के बाद से रुक सा गया है और लखनऊ वासियों को समय बताने वाली ये घड़ी अब खुद समय की मार का शिकार होकर बंद पड़ी है.

1887 में बनकर तैयार हुआ यह घंटाघर भारत का सबसे बड़ा घंटाघर है. लाल ईंट से बने इस घंटाघर की ख़ास बात कुतुबशाही शैली में बना इसका गुम्बद और ईंटो की चुनाई है. हवा का रुख बताने के लिए इसके ऊपर एक पीतल का पंक्षी भी बना हुआ है .

अपने निर्माण के सौ साल से भी ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी इसकी ईंटों पर न तो काई जमी है और न ही दो ईंटों के बीच कोई दरार पडी है लेकिन फिर भी पुराने लखनऊ में गोमती नदी के किनारे बना ये घंटा घर आज बदहाल है.

इतिहास के आईने में

इस घंटाघर का निर्माण अवध के तीसरे बादशाह मोहम्मद अली शाह द्वारा स्थापित हुसैनाबाद ट्रस्ट की संपत्ति के ब्याज से अवध के संयुक्त प्रान्त के प्रथम गवर्नर सर जॉर्ज कूपर को सम्मानित करने के लिए किया गया था.

लगभग 68 मीटर ऊंचे इस मीनार की डिजाईन को कोलकाता के आर.बाइन ने तैयार किया था घड़ी को लुइ गेट हिल लन्दन से मंगवाया गया था जिसे जेडबल्यू बेंसन ने बनाया था.

घंटा घर के चारो तरफ 13 फ़ुट व्यास वाली चार घड़ियां लगी हैं रात के वक्त घड़ी के भीतर रोशनी के लिए आठ बड़े लालटेन लगाए गए थे. ये घड़ी अपने गज़र की मीठी आवाज़ के लिए भी मशहूर थी जो हर घंटे, आधे घंटे सवा और पौने घंटे पर बजा करते थे.

लखनऊ शहर की पुरातात्त्विक इमारतों के विशेषज्ञ डॉ. योगेश प्रवीण बताते हैं कि इस घंटा घर के सभी कलपुर्जे गन मेटल के बने हैं घड़ी का प्रधान चक्र 1.5 इंच मोटा है और उसका व्यास 24 इंच है. गौरतलब है कि वेस्टमिनिस्टर (ब्रिटेन ) के विश्वप्रसिद्ध घंटाघर की घड़ी का मुख्य चक्र केवल 18 इंच व्यास का ही है.

मदद का इंतज़ार

ऑल इंडिया एक्स रॉयल फैमिली एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और अवध के नवाबी खानदान से ताल्लुक रखने वाले नवाब मीर जाफर अब्दुल्ला कहते हैं कि इस घंटा घर की घड़ियों को उस घड़ी का इंतज़ार है जब ये दोबारा वक्त के साथ कदम ताल कर सकेंगी.

वो कहते हैं, ''हम अपनी धरोहरों को संभालने के बारे में ज़िम्मेदार कब बनेंगे वे यूरोप को देखिए.उन्होंने अपनी विरासत को किस खूबसूरती से बचाया है.''

समय की गर्द ने इस घंटाघर को काफी नुकसान पहुँचाया है आवश्यक सुरक्षा प्रबंध न होने के कारण इसके काफी कलपुर्जे चोरी हो चुके हैं.

Image caption मीर जाफ़र घंटाघर के ख़राब हो जाने से अत्यंत मायूस है और चाहते हैं कि कोई इसकी मरम्मत कराए.

घंटा घर का रख रखाव करने वाली संस्था हुसैनाबाद ट्रस्ट के सचिव अपर जिलाधिकारी (ट्रांस गोमती) ओ पी पाठक कहते हैं कि इस घड़ी की मरम्मत के प्रयास तो हुए लेकिन घड़ी बहुत पुरानी होने के कारण इसके कलपुर्जे नहीं मिल पाते हैं.

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीक्षण पुरातत्वविद आईडी दिवेदी कहते हैं, ''यह घंटा घर विभाग के उन मानकों को नहीं पूरा करता है जिनके अनुरूप इसे संरक्षित स्मारक का दर्जा दिया जाए. कभी बागों का शहर रहा लखनऊ आज पार्कों के शहर में तब्दील हो रहा है समय के इस फेर में फंसा ये घंटाघर बस इंतज़ार कर रहा है कि कोई इसका हाल पूछे तो वो सही समय दिखा सके.

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